<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-33768350</id><updated>2011-11-10T23:40:13.246-08:00</updated><title type='text'>ललित निबंध संचयन</title><subtitle type='html'>हिंदी के महत्वपूर्ण ललितनिबंधकारों की रचनाएँ</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://lalitnibandha1.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/33768350/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lalitnibandha1.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>जयप्रकाश मानस</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>17</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-33768350.post-115843498200878110</id><published>2006-09-16T12:25:00.000-07:00</published><updated>2006-09-16T12:29:42.146-07:00</updated><title type='text'>17. ललित निबंध का स्थापत्य</title><content type='html'>&lt;a href="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/1600/lalit.jpg"&gt;&lt;img style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/320/lalit.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt;&lt;br /&gt;ललित निबंध यह अभिधा या विधा समीक्षकों के बीच विवाद का विषय रहा हा – व्यंग्य विधा की तरह। बहरबाल इस विवादक से बचते हुए ललित निबंधों के बीच से उभरे मूल्यों और उनकी बनावट-बुनावट के संबंध में एक संवाद स्थापित कनरे का यह एक विनम्र प्रयास है। पहले भाषा बनती है। उसका बहुशः प्रयोग होता है। बाद में उसका व्याकरण बनता है। उसका मानक रूप बनता है। ठीक इसी तरह पहले रचनाएँ जन्म लेदी हैं, उनकी प्रवृत्तियों व शैली-शिल्पों को देखकर ही उनका स्थापत्य या शास्त्र बनता है, जो हमेशा विकासशील रहता है – सभ्यता संस्कृति की तरह। ललित निबंध को इसी परिप्रेक्ष्य में तरह-तरह से परिभाषित करने का प्रयास किया गया – अन्य विधाओं के सदृश। परिभाषाएँ कम पड़ती गईं तो ऐसा है, वैसा नहीं, नेति नेति कहकर छोड़ दिया जाता है – ब्रह्म की तरह। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;व्यक्ति व्यंजक निबंध, रम्य निबंध, आत्मव्यंजक निबंध, ललित निबंध, पर्सनल एस्से, अदि अदि नामों से प्रचलित यह साहितय रूप अपने स्वरूप का संकेत दे देता है। लल् धातु से क्त प्रत्य और इट् आगम से बना ललित शब्द इस विधा का नाम है, मूल्य और विधान भी, जैसे आदरणीय क्षेमेन्द्र ने औचित्य को स्थिर काव्य का जीवन कहा है – औचित्यं स्थिर काव्यस्य जीवन, वैसे ही लालित्य को इस विधा का जीवन कहा जा सकता है – लालित्यं ललित निबंधस्य जीवनम् (इति से मतिः) ऐसा मेरा मानना है। इस विधा के पुरोधा आदरणीय हजारी प्रसाद द्विवेदी ने ललित शब्द की बड़ी व्यापक व्याख्या की है। मतलब य कि इन रचनाओं के भीतर चाहे संस्कृति गान हो, लोक गाथा हो, भावना-कल्पना की उड़ान हो, विचार-चिंतन हो, आत्मकथा हो, बीती व्यथा हो, यथार्थ हो, व्यंग्य – सब कुछ ल्लित्य से लिपटे होते हैं, मधुमिश्रित होते हैं। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;कोश के अनुसार – “अनाचार्योपदिष्टं स्याल्ललितम्”, अर्थात जो आचार्यों या उनके शास्त्रों से उपदिष्ट न हो, हर प्रकार की जकड़बंदी से मुक्त हो, ऐसी बनावट और बुनावट वाली रचना या कला ललित है। साहित्य दर्पण के अनुसार जिस रचना के अंग-विन्यास में सुकुमारता हो, वह ललित है – “सुकुमारतयाङगानाम विन्यासो ललितं भवेत्।” इस परिभाषा का प्रयोग देखना हो तो आदरणीय हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबंध ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’, ‘अशोक के फूल’ तथा अन्य प्रतिष्ठित निबंधकारों की रचनाएँ पढ़ सकते हैं। नाखून जैसी नाचीज़ को भी चीज़ बना देना, पाठ्य बना देना, अशोक के फूल जैसे निर्गन्ध फूलों को भी स्मृति गंध का विषय बना देना इस लालित्य का प्रताप है। समस्त साहित्य लालित्य या रमणीयता का ही प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप है। “रमणीयार्थ प्रतिपादकः शब्दः काव्यम्” यह काव्य लक्षण इसी तथ्य का संकेत है।&lt;br /&gt;ललित निबंध विधा अविचारित रमणीय का रूप है, इसलिए वह रम्य निबंध भी कहा जाता है। अविचारित रमणीयता का आशय रहाँ यह कतई नहीं है कि इसमें विचार को अनर्गल समझा जाता है। तर्क और यथार्थ से यहाँ परहेज किया जाता है। यहाँ यथार्थ से पलायन नहीं है। रम्य पूर में सब स्वीकार है। डॉ. परमानन्द श्रीवास्तव, परसाई जीने के ललित निबंधों की चर्चा करते हुए ठीक ही कहा है कि “परसाई के गद्य की पठनीयता इसी वृहत्तर लालित्य की धारणा से प्रभावित है जिसमें व्यंग्य-विनोद, क्रोध, तनाव सबके लिए जगह है। परसाई के ललित निबंधों में व्यक्ति और आत्म का जो स्पर्श है, वह निरंतर गहरी सामाजिकता में रचा-बसा है।” – ललित निबंध; सं. अष्टभुजा शुक्ल, पृष्ठ 25&lt;br /&gt;जाहिर है अविचारित रमणीय का आशय अनर्गल या निरर्थक रमणीयता से नहीं है। “बुध विश्राम सकलजनरंजनि” रमणीयता ही काम्य है। इस काम्य उद्देश्य को अनदेखा कर अथवा समझने की शिद्दत न उठाकर कुछ समीक्षक इसके स्थापत्य पर ‘नास्टेल्जिया’ या उन्मानद का पंक प्रक्षेप करते पाये जाते हैं। अतीत जीविता का आरोप लगाया जाता है। स्मृति का प्रलाप इसे मानने की भ्राँति पाली जाती है। मानने और पालने की अपनी-अपनी रुचि है, दृष्टि है, कोई क्या कर सकता है। ललित निबंध की प्रासंगिकता पर ऊँगली उठाते हुए श्री राजेन्द्र यादव का कहना है कि “हिन्दी में ललित निबंध की मूल चेतना नास्टेल्जिया है।... छूटे हुए अतीत को हाय हाय भाव से याद करना, चूँकि यहाँ रचनाकार अतीत में स्थित होता है, इसलिए वर्तमान को भी रुमानीया धिक्कार भाव से देखता है।” &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;– ललित निबंध; सं. अष्टभुजा शुक्ल, पृष्ठ 31&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;यथार्थवादियों का ऐसा अभियोग वस्तुतः भ्राँति मात्र है या नकार की प्रवृत्ति की सूचना। ललित निबंधों का सच इसके विपरीत साक्ष्य देता है। वस्तुतः यह विधा न वर्तमान या यथार्थ से पलायन को उकसाती है न अतीत के प्रति अतिरिक्त मोह को प्रश्रय देती है। अतिरिक्त मोह किसी भी विधा के लिएदोष है – अनोचित्य दोष की तरह। यथार्थ से साक्षात्कार सभी रचनाकार अपने-अपने संवेदन तंत्र से करते हैं और उसे अपने-अपने ढंग से व्यक्त करते हैं। प्रोफेसर रमेशचन्द्र शाह का मन्तव्य है कि “यथार्थ आत्मतः आविष्कृत करते चलने की प्रक्रिया साहित्य में गहरी मौलिकता को जन्म देती है। निबंध की समस्या आत्म को आत्म से और आत्मसे ही परात्म और अनात्म को पकड़ने की है।” &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;– शैतान के बहाने, पृष्ठ 4 भूमिका&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;बात साफ है, न अतीतजीवी होना गुण है न निखालिस वर्तमान में जीना। अपने समय से साक्षात्कार करने वाले प्रभाष जोशी ने कहा है “यथार्थवादी वर्तमानवादी होते हैं। वर्तमान में सिर्फ पशु ही जीते हैं, क्योंकि उसका कोई अतीत नहीं होता।... आदमी आदमी हुआ तो इसलिए कि उसके स्मृति मिली और वह भविष्य के सपने देखने लगा। वर्तमान यथार्थ हो सकता है, परन्तु यथार्थ सत्य नहीं हो सकता। सत्य को यथार्थ केआर-पार देखकर ही आप पा सकते हैं।” &lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;– जनसत्ता में छपे लेख से&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;दरअसल अतीत से कटे लोग कटी पतंग की तरह होते हैं। छने हुए ्तीत या परम्परा का स्मरण या गान गौरव गान है। भूमि वंदना का विधान है। संस्कृति का अभइनंदन है। इसी गान के द्वारा क्या भारतेन्दु और मैथिलीशरण गुप्त ने सुप्त भारतीयता को जगाने का प्रयास अतीत गान द्वारा नहीं किया था। क्या गांधी, आज़ाद, भगत सिंह, राणाप्रताप,शिवाजी जैसों की याद अतीत स्मरण नहीं है ? क्यायह स्मरण राष्ट्रीयता-जागरण काविधान-सा नहीं है ? हमारी परम्परा ‘स्मृति’ को देवी के रूप में स्मरण करती है,जो सभी प्राणियों के भीतर व्यक्त-अव्यक्त रूप से विद्यमान है – कदाचित इसलिए नमन करती है। यह देवी हमें वह ताकत देती है। क्रूर वर्तमान की मार सहने की शक्ति देती है। टूटने से बचाती है। भारतीयसोच के बारे में एग्स विल्सन ने ठीक ही कहा है कि “भारत एक भौगेलिक वास्तविकता से कहीं अधिक परम्परा तथा एक बौद्धिक आध्यात्मिक ढाँचा है।” ललित निबंध भौतिक वास्तविकता का यथोचित आदर करता है, पर अपनी शर्त पर। वह भौगोलिक या भौतिक वास्तविकता से अधिक भारत की आत्मा जिन परम्पराओं, आध्यात्मिकता और संस्कृति में निवास करती है उनकी आराधना करता है। एक घड़ी-आधी घड़ी की नास्टेल्जिया या अतीत की आह-ओह भाव से भरा गान यदि जीवन को, नहला जाये तो क्या बुरा है ? प्रसाद जी ने तो मधुआ के हवाले से कह ही दिया है कि ‘मौज-मस्ती की एक घड़ी भी ज्यादा सार्थक होती है एक लम्बी निरर्थक जिंदगी से।’ क्या यथार्थावादी भीतर से रुमानी तबियत के नहीं होते ? फिर रुमान की वास्तविकता से हाय-तौबा क्यों। उन्हें फ्रायड के पास जाकर सच से पिरचित होना चाहिए। फिर क्या यथार्थ बोध केवल करुआ, कषैला, खट्टा, तीता का ही नाम है, उनमें मधु भाव शामिल नहीं ? जीवन का यथार्थ सब का मिश्रण है – मौसम की तरह, आम की खटमिट्ठी की तरह, पनहा (प्रपाषक रस) की तरह। राम और श्याम की लीलाओं में मारण, मोहन, धारण-निवारण – सब कुछ साझा है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;किसी एक लेखक या उसकी या और की कुछेक रचनाओं को पढ़कर किसी विधा के प्रति धारणा बना लेना भ्राँति को आमंत्रित करना है। प्रोफेसर रमेश चन्द्र शाह जैसे स्थापित निबंधकार और समर्थ समीक्षक जब मुझ जैसे नवसिखुये निबंध लेखक की पहली कृति पर ऐसा अभिमत प्रकट करते हैं तो मेरे भीतर का निबंधकार आश्वस्ति से तृप्त होता ही है, ललित निबंध का स्थापत्य भी रेखांकित हो जाता है। बड़ी विनम्रता और संकोच के साथ आप सब की कृति ‘स्मृति गंध’ पर की डॉ. शाह की टिप्पणी मैं प्रस्तुत करना चाहता हूँ – इस क्षमायाचना के साथ कि आप इसे आत्मप्रशंसा न समझेंगे –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;निबंध – विशेषकर वह निबंध जो ‘पर्सनल एस्से’ के नाम से जाना जाता रहा – एक विलक्षण विधा है और हिन्दी खड़ी बोली ने उसे आरंभ से ही बड़ी ललक और सहज सांस्कृतिक आत्मविश्वास केसाथ अपनाया, न केवल अपनाया, बल्कि उसे एक विशिष्ठ भारतीय रंग और स्वर में भी ढाला। यहाँ उसने ललित निबंध के रूप में अपनी अलग ही पहचान स्थापित की।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;शोभाकांत झा को यदि यह विधा रास आई है तो इसका कारण यही है कि उनके स्वभाव तथा संस्कार में वे आधारभूत अर्हताएँ विद्यमान हैं, जिनके बिना कोई भी लेखक इसविधा में प्रवेश करने को प्रेरित नहीं हो सकता। इन अर्हताओं में जहाँ एक ओर मिथिला की रसमयी आँचलिकता से अभिषिक्त उनकी रसात्मक संवेदना की सुस्पष्ट भूमिका कार्यरत देखी जा सकती है, वहीं भारत के हृदय की कुंजी स्वरुप हिन्दी और उसकेसाहित्य के अखिल भारतीय स्वरूप का परिश्रमपूर्वक अर्जित बोध भी (शोभाकांत का सोचने और महसूस करने का अपना स्वाधीन ढंग है। प्रचलित साहित्यिक रुढि़यों (नई-पुरानी) की जकड़बंदी से वे ग्रस्त नहीं, यह उनके लेखों में साफ देखा जा सकता है। इसी से जहाँ एक ओर वे तुलसी के कृतित्व को लेकर वे कुछ काम की बातें कह सकते हैं, वहीं दूसरी ओर वे विद्यापति के प्रति अपनी रीझ-बूझ को पाठक के लिए नये सिरे से, नई सूझ-बूझ के साथ सार्थक और उत्तेजक बना सके हैं। यह लचीलापन-संवेदना तथा रुचि दोनों का – उनके विवेकी साहित्यिक भाव-बोध को दर्शाता है। फिर, जिस खुली संवेदना और भावप्रवणता के साथ वे साहित्य को पढ़ते हैं, उसी खुली संवेदना और सहज भावप्रवणता के साथ अपने जीवनानुभवों को भी। ‘स्मरणं त्वदीयम’ और ‘स्मति गंध’ जैसे ललित निबन्ध इस प्रतीति को बल देते हैं। महज नास्टेल्जिया से अपने को अलगा सकने वाली गुणवत्ता इन निबन्धों में दिखाई गई है। उम्मीद करनी चाहिए का आगे लेखक की साहित्यिक रीझ-बूझ तथा जीवनानुभूति का और भी एकाग्र तथा गाढ़ा मेल उसके निबंधों के जरिए प्रकट होगा।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;ललित निबंध या किसी भी विधा के स्थापत्य के संबंध में बहुत कुछ कहा जा सकता है और कहा जा चुका है। कोई कहना अंतिम नहीं होता क्योंकि स्थापत्य निरंतर सृजन के कारण बदलता रहता है – नये नये वास्तुशास्त्र की तरह। ‘अदबुत अपूर्व स्वप्न’ जिससे विवेच्य विधा और आधुनिक हिन्दी गद्य का आरंभ माना जाता है। तब से लेकर आज तक इसकी निरंतरता बनी हुई है। ललित निबंधों का लेखन कम जरूर हुआ है, पर बंद नहीं। इसकी प्रासंगिकता चुकी नहीं है। आत्म को परात्म का व्यक्ति को समष्टि का पाठ्य बना देने की कला में निपुण यह विधा मरेगी नहीं – गीत काव्यकी तरह, कविता की तरह। यह कविता का गद्य विकल्प है। जरूरत है अष्टभुजा शुक्ल के शब्दों में “अन्य विधाओं के साथ चलने को आज ललित निबंध को नितांत वैयक्तिक हाहाकर, चिन्ता, धुर ग्राम्य प्रेम या संस्कृति के रंगीन कुहासे से बाहर आकर नए भावबोध के साथ सन्दर्भों से टकराना होगा।” &lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;– ललित निबंध; भूमिका पृष्ठ 2&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;अंत में आदरणीय हजारी प्रसाद द्विवेदी के मन्तव्य से बात को समेटना चाहता हूँ – “आचार, रीति-रिवाजों से लेकर धर्म, दर्शन, शिल्प सौन्दर्य तक में सर्वत्र नये सिरे से सोचने कीआवश्यकता है। कोई नैतिक मूल्य अंतिम नहीं; कोई शिल्प विधि सर्वोत्तम नहीं कही जा सकती, कोई अभिव्यक्ति पद्धति सर्वश्रेष्ठ नहीं हो सकती।”&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt; – ललित निबंध; लेख रमेश कुंतल मेघ पृष्ठ 19&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ffcc33;"&gt;0000000&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ffcc33;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ffcc33;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ffcc33;"&gt;प्रस्तुतिः &lt;a href="http://www.srijansamman.com/"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;जयप्रकाश मानस, सृजन-सम्मान&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/33768350-115843498200878110?l=lalitnibandha1.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lalitnibandha1.blogspot.com/feeds/115843498200878110/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=33768350&amp;postID=115843498200878110' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/33768350/posts/default/115843498200878110'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/33768350/posts/default/115843498200878110'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lalitnibandha1.blogspot.com/2006/09/17.html' title='17. ललित निबंध का स्थापत्य'/><author><name>जयप्रकाश मानस</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-33768350.post-115843472327984675</id><published>2006-09-16T12:21:00.000-07:00</published><updated>2006-09-16T12:25:23.853-07:00</updated><title type='text'>16. हरसिंगार</title><content type='html'>&lt;a href="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/1600/gulmohar.jpg"&gt;&lt;img style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/320/gulmohar.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000066;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आंगन का नाम अधर पर आते ही मन ग्राम्यगंधी हो उठता। उसमें भी आंगन के कोने में उगा हरसिंगार और तर करके रख देता है। उसके ऊपर नीचे झरे-बिछे जोगिया रंगी डंठलों वाले खेत पुष्पों की सुगंध से शरदभोर पूरी तर विभोर हो उठती है। इसी भोर की तरह सराबोर मैं उसकी कलियों को चुनने लगता हूँ और मन स्मृति को। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;बचपन के रचे वे पन्ने खुल जाते हैं, जिन पर धीरे-धीरे गोरी होती भोर का उतरना रचा होता। सोनहा बिहान, शबनम की मुसकान और प्रभाती गान के छंद रचे होते। बाबूजी पौ फटने से घंटाभर पहले ही प्रभु को प्रभाती सुनाने लगते थे और हम डलिया लेकर हरसिंगार की कलियाँ चुनने पहुँच जाते थे- &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;रामचन्द्र रघुनाय तुमरों हौं बिनती केहि भाँति करौं।&lt;br /&gt;अघ अनेक अवलोकि आपने, अनघ नाम मनुमानि डरौं।।&lt;br /&gt;पर-दुख दुखी सुखी पर-सुख ते, संत-सील नहि हृदय धरौं।&lt;br /&gt;देख आनकी बिपति परम सुख, सुनिसंपति बिना आगि जरौं।।&lt;br /&gt;नाना वेष बनाय दिवस-निसि, पर बित जेही तेहि जुगति हरौं।&lt;br /&gt;एकौ पल न कपहुँ अलोल चित, हित है पद-सरोज सुमिरौं।।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;उन दिनों सोचहीन वय के कारण बाबूजी के इस प्रभाती गान का अर्थ नहीं लगा पाता था और इन दिनों दिवस-निशि अर्थ दौड़ में दौड़ते रहने के कारणपर-दुख देखकर सुखी और पर-सुख देख दुखी होने वाले आज के अर्थलोलुप मन में ऐसे भजन भाव समा भी कैसे सकते हैं ? इस बहुरूपिए युग को वह रुचि कहाँ कि वह रामरुप मे रम सके। हरसिंगार आगंन में नही होता तो बाबू जी के गाये इस प्रभाती की स्मृति भी शायद ही आती। महादेवी के यह पद भी क्यों याद आते-&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;पुलक-पुलक उर सिहर-सिहर तन&lt;br /&gt;आज नयन क्यों आते भर-भर&lt;br /&gt;शिथिल मधु पवन गिन-गिन मधुकण&lt;br /&gt;हरसिंगार क्यों झरते-झर-झर।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;पुलक का स्वाद पवन की सिहरन, स्मृति की मिठास और हरसिंगार के झरने का अहसास बचपन की उम्र को क्या मालूम। बचपन तो संग-साथ सबको सहजता से भीतर समोना जानता है, ऊभू-चूभ होना जानता है। स्वाद तो बाद की उम्र लेती है। संग-संग रीझने-खीझने, नाचने-गाने, छिपने-छिपाने, उलाहना देने और अभाव में अकुलाने से उपजी प्रीती का आस्वाद गोपियों को तब लगा जब श्याम गोकुल छोऱ गया। और श्याम को भी व्रज छूट जाने पर व्रज लीला की बेशुमार सधियो का स्वाद मेरा भी गोकुल बहुत दूर छूट गया है। दूर होने पर स्मृति और गाढी हो जाती है- प्रीति की तरह, अहसास की तरह। शहर लाख सिर पटक ले जब तक भीतर का आदमी मरा नही है, तब तक उसकी पर्याय स्मृति मर नही सकती। सिंगार का सुगंध सिरा नही सकती, कोयलिया की बोली भुला नही सकती।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;रही बात हरसिंगार क्यों झरता है, तो जो खिलता है क्या झरना उसकी नियति है। फूल अपनी सुगंध फैलाकर और अच्छे अपनी अच्छाई को आचरण देकर दूसरो को खिलने का अवसर देते है। समय रहते ही हट जाते है- जमे नही रहते नेताओ की तरह। धक्का खाकर बाहर होने की आदत अच्छी नही होती। हरसिंगार देवाधि देव महादेव का श्रृंगार है, वह उनका श्रृंगार बनने, उनके संग पाकर कृतार्थ होने, औरों को कृतार्थ करने की मशां से झर जाता है। रुपगुण के फीका पडने से पहले ही वृन्त से हट जाता है- सगे-सनेहियों को कृतार्थ होने का, अपने होने को प्रमाणित करने का मौका देकर सूखने पर तो सभी झर जाते है दयनीय दया का पात्र बनने से पहले ही विकसित हो जाना बेहतर है। रुप-राध इतराने की वस्तु नही, रमने-रमाणे की चीज है, यह कहते हुए हरसिंगार यह भी झरकर कहना चाहता है कि नश्वरता संसार की नियति है, इसलिए अच्छे के लिए अपने को अर्पित कर देना अच्छा है। बहुत सारे आशय झरने मे समोया हुआ है। समझ-सोच के अनुपात से आशय खुलता जाता है।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;हरसिंगार के मनुहार का मौसम प्रकृति के निखार की भी रुत होती है। अवदात अकाश, शरदचन्द्र का आहलादमय हास दिपदिपाते तारे- दिपावली के दीप जैसै। वनश्री सधस्नाता सी लटों से शबनम की बूंदे बच्चो के मन जैसे निर्मल जल, मनुहार के लिए गुहार लगाती रातरानी। शारदीय शक्ति पूजा के लिए आहवान करती नवरात्रा। वर्षा भींगे अलसाये और कृषि कर्म से थके लोक मन को शक्ति आराधना के लिए उत्साहित करता शरद दुर्गोत्सव। दुर्गति से बचाने वाला और दुर्गम विकास-विजय यात्रा को सुगम बनानेवाली दुर्गा की आराधना के लिये भर-भर डलिया हरसिंगार चुन लेने हेतु किशोर-किशोरियों में होऱ सी लग जाती थी, तब के दिनों में। रामू, श्यामू, बाले-बिन्दे, रमेश, महेश, गमकला, उर्मिला, गोदा, भूल्ली पीसी और जागेकाका- गाँव भर के किशोर वय शक्ति भक्ति की औकात के मुताबिक पौ फटने से पूर्व ही- देंखे कौन कितना फूल चुनता है, फूल चुनती थी। कमल मुख मुसकाते तालाब मे सात-सात डुबकी लगाकर तैरकर कमलों को काढते और बालसखा छिन्नमस्ता देवी की आराधना के लिए दुर्गास्थान (उच्चैठ) चल पऱते।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;डुमरा से कोसो भर की दूरी पर उच्चैठ मे दुर्गा देवी राजती है, लोरिका धनौजा दोनो गाँव को पारकर जाना पऱता था। सब बाल सखाओ के हाथों मे फूलो की डलियाँ होती और जेब में ताम्बें के दो-चार पैसे। उन दिनों दो-चार पैसे दो-चार रूपये के बराबर होते। साथ मे चूऱा-गुऱ की पोटली भी। मंदिर परिसर मे पहुँचते ही भीऱ का ठेमल-ठेल और मेले का रेलम-पेल। मंदिर मे प्रवेश पाने के लिए छोटे रेल डब्बे कीसी धक्का-मुक्की देवी के चरण छू लेने की होऱ-सी लग जाती। देवी के उपर चढे फूल जब बाह के अर्पित होते फूलो के हल्के झटके से, या भार से, या अन्य कारणो से या देवी की कृपा से भक्तो की अँजुरी मे और भक्तिनो के आंचल में गिरते तो वे विभोर होकर भगवती की प्रसन्नता को सम्हालकर रख लेते, माथे से निकलते। गिरिजा पूजन के समय सीता के आँचल मे भी देवी के उपर चढी माला प्रसन्नता का प्रतीक बनकर गिरी थी और देवी गिरीजा मुस्कुरा उठी थी- खसी माल मूरति मुस्कानी। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्मल का अंजुरी मे गिरना या आँचल में आ जाना संभवतः उन्हीं स्मृतियो और ज्ञाताज्ञात संस्कारो की स्मृति है।&lt;br /&gt;अष्ठमी के दिन का तो रंग ही दूसरा होता था। भौइद्दी मे बसे पचास गाँवो की श्रध्दा उमऱ पऱती थी- अर्पित होने के लिए, माँ की ममता दया पाने के लिए, सांसारिक सुख और पारलौकिक कृपा पाने के लिए। ‘दुर्गा माता की जय’, ‘दुर्गा महारानी की जय’ की जयकार कोसों दूर से सुनाई पऱती। श्रध्दा मेले का शोर आसपास के दसो गाँव में सुनाई पऱता। मंदिर के भीतर-बाहर ‘दुर्गा सप्तशती’ पाठियों के पाठ से आयतन पावन होता। आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से दशमी तक चलने वाला यह दशमी मेला आज भी स्मृति मे जुऱ आता है-हरसिंगार की कलियों को चुनते हुए। कालिदास,का वह गढ (टीला) आखों के सामने झूल जाता है, जहाँ वे पढे थे। यहीं कालिदास पत्नी की वाक-बाण से बिंध होकर विद्या पाने आये, को कालि की कृपा से मिल गई और वे कालिया से कालिदास बन गये थे। भले ही विद्वानो का बहुमत उज्जैयिनी में कालिदास का होना प्रमाणित करता हो, पर इस किवदंती को एकदम से नकारा भी नही जा सकता, क्योंकि मिथिला विद्वानों से मंडित रही है और वैसे भी विद्वान, संत-महात्मा एक देश-काल के होकर नही रहते।&lt;br /&gt;‘हरसिंगार’ या मैथिली ‘सिंगरहार’ हरश्रृंगार का तद-भव रुप है। तत्सम से तदभव जरा ज्यादा मीठा होता है। लोकभाषा की प्रकृति मे ढला हुआ, काक से ‘कागा’ और पिक से ‘कोईलिया’ की तरह मीठा। यह भले ही उगा हो हर-गौरी के श्रृंगार के लिए, पर इसे अन्य देव-देवियों के लिए, पर इसे अन्य परहेज नहीं। पवन-गगन सब इससे तर होते हैं। आप भी तर हो सकते हैं। यह हर की तरह सबके लिए औढर है और औषधि भी। इसकी कोमल पत्तियों को पीसकर सुबह शाम खाली पेट पी लीजिए, पुराना बुखार उतर जायेगा। भूख जग जायेगी। विश्वास बढ़ाने के लिए मेरी नातिन स्वाति से पूछ लीजिए, जो इसकी पत्ती पीकर अच्छे स्वास्थ्य की मालकिन है। तईभ से वैद्यनारायण की तरह मेरे आंगन में विराजमान है। श्रीखंड जंदन के साथ इसके दो-चार गोरोचन रंगी डंठलों को घिस दिजीए सुगंध में छवि और छवि में सुगंध समा जायेगी और यह गोविन्द के भाल के गोरोचन तिलक बन जायेगा। जब भी हरसिंगार को चुनता रहता हूँ तो दिनकर की ये काव्य पंक्तियां स्मृति द्वार से अधर पर उतर आती हैं और भूले-बिसरे दिन और लोग याद आ जाते हैं –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;पहन शुक्र का कर्णफूल दिशा अभी भी मतवाली।&lt;br /&gt;रहते रात रमणियाँ आई ले-ले फूलों की डाली।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;हरसिंगार की कलियाँ बनकर वधुओं पर झर जाऊँगी।&lt;/span&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#ffcccc;"&gt;000000000&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#ffcccc;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;प्रस्तुतिः &lt;/span&gt;&lt;a href="http://www.srijansamman.com/"&gt;&lt;span style="color:#ffff66;"&gt;जयप्रकाश मानस, सृजन-सम्मान&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/33768350-115843472327984675?l=lalitnibandha1.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lalitnibandha1.blogspot.com/feeds/115843472327984675/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=33768350&amp;postID=115843472327984675' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/33768350/posts/default/115843472327984675'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/33768350/posts/default/115843472327984675'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lalitnibandha1.blogspot.com/2006/09/16.html' title='16. हरसिंगार'/><author><name>जयप्रकाश मानस</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-33768350.post-115843446148969813</id><published>2006-09-16T12:12:00.000-07:00</published><updated>2006-09-16T12:21:04.050-07:00</updated><title type='text'>15. सर्वमंगल भाव और संस्कृत साहित्य</title><content type='html'>&lt;a href="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/1600/nature1.jpg"&gt;&lt;img style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/320/nature1.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000066;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साहित्य सदैव सर्वमंगल भाव को जीता है। उसका आग्रह सबका हित है। हित बाव के बिना साहित्य नहीं रह सकता। जैसे हाथी के पैर के विस्तार में सारे जीवों के पाँ समा जाते हैं, वैसे इस मंगल भाव में सभी प्रकार के हित भाव समा जाते हैं। शिव सुंदर और सत्य होता ही। यह ‘साहित्य’ शब्द, जो शब्द अर्थ के परस्पर प्रतिस्पर्द्धी सौंदर्य से वाणी की उपासना करता है, संस्कृत भाषा का शब्द है। ‘संस्कृत’ शब्द भी अपने आप में संस्कार और सौंदर्य बोधक है। परिष्कृत या संस्कारित भाषा का नाम ‘संस्कृत’ है। संस्कार मंगल मूलक होते हैं। यह मंगल मूला देव भाषा देवताओं को तो भावित करती रही है, हजारों वर्षों से हमारी चोस-समझ को भी संस्कारित करती रही है। जितना दार्शनिक विचारधाराओं का, मानवीय मेघा का चतुर्दिक प्रसार और प्रस्रवण संस्कृत युग में हुआ उतना आधुनिक भारतीय भाषाओं की बात कौन कहे, विश्व भाषाओं में भी कदाचित नहीं हो सका। आधुनिक दर्शन-चिंतन के केन्द्र पाश्चात्य देश जरुर बन गए है, परन्तु प्राचीन काल मे भारत ही केन्द्र रहा है। इस केन्द्रत्व का साक्षी है नालंदा एंव तक्षशिला के विश्व विद्यालयों का इतिहास। सबका श्रेय-प्रेय संस्कृत का सनातन द्दयेय रहा है। दुर्योग या काल योग से सब के शुभाकांक्षी बुद्दद् जैसे दलितों के खासम खास हो गए है, पंथ या सम्प्रदाय के घोर विरोधी कबीर खास पंथ के पिंजरे में कैद हो गए, सूर-तुलसी पर वर्ग विशेष की मुहर लग गई है। ज्यादातर स्वतंत्रता के बाद सत्ता पर काबिज होने अथवा बने रहने के अपवित्र उद्देश्य से भाषावाद, जातिवाद, सम्प्रदायवाद की विष-वेलि बोने में हमारी धरु राजनीति ने महारत हासिल कर ली है। परिणति सामने है। संस्कृत की छोङिये, जिस हिन्दी को गैर हिन्दी भाषी लोगों ने राष्ट्रभाषा बनाने के लिए पहल की, एक जुटता दिखाई, राष्ट्रीय एकत्व के लिए सभी वर्गो के लोग को सिर पर कफन बाँध आगे आने हेतु प्रोत्साहित किया, उसी को पहले उर्दू से विलगाया गया। अब तो उसकी बोलियों से भी उसे अलग करने की प्रवृति पनप रही है। जिस अंगेजी के विकल्प के रुप मे और राष्ट्रीयता को पुष्ट करने के लिए हिन्दी को स्थापित किया गया था, स्वदेशी अवधारणा का अनुष्ठान किया गया था, उसी हिंदी को आजादी के बाद क्षुद्र स्वार्थवश किनारे करने का कुप्रयास किया जा रहा है, तो संस्कृत के भगवान ही मालिक है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000066;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;संस्कृत निर्विरोध रुप से उत्तर का सेतुबंध रही है। समस्त भारतीय भाषाओं की जननी-जैसी रही है। वृहत्तर भारत के वाङ्मय का माध्यम रही। ‘वसुधैव कुटुम्ब’ के भाव को सर्वातमना जीती हुई सबको आत्मसाक्षकर आत्मीयता देती रही। उसी को वर्ग विशेष की भाषा मानकर उसके पठन-पाठन पर ग्रहण विडंबना नही तो क्या है? यह वर्ग विशेष की भाषा नहीं, अशेष की है। कांची-काशी की नहीं, समस्त भारतवासी की है। संकीर्णता की नही, उदारता की है। इसी उदारता से प्रभावित होकर दाराशिकोह ने उपनिषदों का अनुवाद फारसी मे किया था। रसखान ब्रजभाषा के रस मे पगे और मलिक मुहम्मद जायसी की अवधी में समाधी लगी।वेद वाणी समस्त जगत के जीव और नर-नारी के शिवत्व की कामना करती हुई कहती है-&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;ऊँ स्वस्ति मात्र उत पित्रे नो अस्तु। स्वस्ति गोभ्यो जगते पुरुषेभ्यः&lt;br /&gt;विश्वं सुभूतं सुविदत्रं नो अस्तु ज्योगेव द्दशेम सूर्यम् –ऋगवेद् 1-31-4&lt;br /&gt;इसी भाव का भाष्य यह श्लोक है-&lt;br /&gt;सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वेसन्तु निरामयाः।&lt;br /&gt;सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्ददुखभागभवेत्।।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;पितृपक्ष में तर्पण करते हुए भारतीय जन न केवल अपने पितरो को जलांजलि देकर उनकी तृप्ति की कामना करते हैं अपितु विश्व के समस्त जङ-चेतन के लिए तृप्ति जलांजलि समर्पित करते है।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;ऊँ देवास्तृप्यन्ताम्, ऋषयस्तृन्ताम् संवत्सरः सावयवः तृप्यताम् नागास्तृप्यताम् सागरा स्तृप्यन्ताम्, पर्वता-स्तृप्यन्ताम् सरितस्तृप्यन्ताम् मनुष्यास्तृप्यन्ताम् रक्षांसितृप्यन्ताम् पशवस्तृप्यन्ताम, वनस्पतयस्तृप्यन्ताम् औषधयस्तृप्यन्ताम् भूतग्रामचतुर्विधस्तृप्यन्ताम्।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;वेद-वेदांग की भूमिका के बाद पुराणों की भूमिका सर्वमंगलत्व की दिशा में कम महत्वपूर्ण नहीं कही जा सकती। शक्तिस्वरुपा देवी की प्रार्थना करते हुए भक्त- सबके सारे हितों की सिद्दि हेतु याचना करता है &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;सर्वमंगल मंगल्ये शिवे सवार्थ साधिके।&lt;br /&gt;शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणी नमो स्तुते।। &lt;strong&gt;-दुर्गासप्तशती&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;श्रीमदभागवत पुराण की मंगलकामना और भी व्यापक है। विश्व की मंगलभावना से भावित है। दुष्यों तक की निर्मल बुद्धि की कामना की गई है। प्राणियों में परस्पर सदभावना हो। मन शुभ मार्ग में प्रवृत्त हो तथा निष्काम भाव से रमा रमण में हमारा मन रमता रहे&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;स्वस्त्यस्तु विश्वस्च खलः प्रसीदतां&lt;br /&gt;ध्यायन्तु भूतानि शिवं मिथोधिया।&lt;br /&gt;मनश्च भद्रं भजतादधोक्षजे&lt;br /&gt;आवेश्वयतां नो मतिरप्यहैतुकी।।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;यह सर्वशुभोदय की भावधारा गंगोत्री की तरह सहस्रधार होकर संस्कृत काव्य-भूमि में बहती रही है। लोगों को भ्रांति है कि संस्कृत पूजापाठ की भाषा है। पंडितों की भाषा है। जन साधारण की समस्या सोच, सुख-दुख, चरित्र से इसका दूर का भी संबंध नहीं। आभिजात्य वर्ग की अभिव्यक्ति का माध्यम रही है। आज के संदर्भ में इसकी प्रासंगिकता चुक गई है। अदी-अदि न जाने कितने भ्रम फैले हुए हैं, किन्तु गहरे उतर कर देखें तो ये सारे भ्रम, भ्रम ही हैं, सतही हैं। संस्कृत संदर्भहीन नहीं हुई है। कोई भी भाषा जब साधारण जन के बीच संवाद का माध्यम नहीं रह जाती तो उसमें ताजगी भले ही कम हो जाती है, किन्तु इससे वह संदर्भही नहीं हो जाती।सबके हित की उपेक्षा करके िकसी भाषा का साहित्य जी नहीं सकता।जबआदि कवि वाल्मीकि का अदना हृदय क्रौंचवध पर रो उठा था, तब उन्होंने राम जैसे आर्तत्राण महानायक की खोज अपने श्लोकों की सृष्टि रचने के लिए की थी। इस खोज में मुनि ने सतचरित्र एवं सभी के हितभाव को केन्द्र में रखा था। नारद जी से प्रश्न करते हुए आदि कवि ने जिज्ञासा प्रकट की कि अभी इस लोक में कौन ऐसा वीर पुरुष है, जो धर्मज्ञ, कृतज्ञ सत्यसंध, दृढ़वती गुणवान, विद्वान, चरित्रवान और प्राणिमात्र का हितैषी है ? नारद मुनि ने राम का ना लिया। सबका कल्याणकरना राम का काम था –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;कोन्वस्मिन् साम्प्रतं लोके गुणवा कश्च वीर्यवान्।&lt;br /&gt;धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च सत्वाक्यो दृढ़वतः।।&lt;br /&gt;चारितत्रेण च को युक्तः सर्वभूतेषु को रतः।&lt;br /&gt;विद्वान कः कः समर्थश्य कश्चैक प्रिय दर्शनः।। &lt;strong&gt;- वा.रा.वा. कां. 2-3&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;व्यास यदि मनुष्य को सृ-ष्टि का श्रेष्ठतम जीव मानते हैं, तो कालिदास प्रकृति अर्थात् प्रजा के हित को सर्वोपरि स्थान देते हैं। पग-पग पर राजा या प्रशासक को कालिदास की कविता प्रकृति रंजन का स्मरण दिलाती है। राजा प्रकृति रंजनात्, अर्थात् सब प्रकार से प्रजा को प्रसन्न रखने वाला ही राजा हो सकता है। अभिज्ञान शाकुन्तलम् के अंत में नाटककार का भरत वाक्य है कि राजा प्रजा के हित में रत रहे। विद्या में वृद्धि हो। शिव हम सबका शुभ करें –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;प्रवर्तताँ प्रकृति पार्थिवः&lt;br /&gt;सरस्वती श्रुतमहतां महीयसाम्।&lt;br /&gt;ममापि च क्षपयतु नील लोहितः&lt;br /&gt;पुनभवं परिगतशक्तिरात्मभूः।।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;परम्परासे हटकर सोचने और रचने वाले करुणा के कवि भवभूति समस्त भावों के केन्द्र में करुणा को रखकर जग मंगल के लिए अपनी प्रतिबद्धता सम्प्रेषित करतेसे जा पड़ते हैं। अशेष मानवीयसहानुभूति का स्त्रोत करुणा ही तो है। उसमेंसंसार के शुभोदय का निवास है। परपीड़ा अधमताई है तो परोपकार पुण्यकापुंज। एक से बचने और दूसरे को करने के लिए करुणा चाहिए। इसी चाह की खोज भवभूति की करुणा है। पृथ्वी तनया प्रकृति स्वरूपा सीता की पीड़ा से द्रवित कवि चित्त करुणा का आश्रय लेता है। लोकाराधन के लिए सीता का निर्वासन प्रजाहित के लिए प्रकृति का पीड़न कहा जा सकता है। प्रजा मंगल के लिए और भी विकल्प खोजे जा सकते थे। इसकल्प की कसक-कचोट से पत्थर भी रो उठता है। प्रकृतिरोती है। राम रोते हैं। स्वयं राम को अपना उत्तरचरित अपराध बोध से भारी लगता है – ते ही नो दिवसाः गताः (उत्तरराम चरितम् ्ंक 1) इसी करुणा ने तो ुबद्ध को घरबार छुड़ाया था। विश्वमंगल की साधना के लिए उसकायाथा। भवभूति का कवि अपनी तथा सबकी विभूति का कारण प्रेम, करुणा और परोपकार को मानते हुए कामना करता है कि सारे संसार का शिव हो। सभी प्राणी परिहत निरत हों। दोष शांत हों। सभी स्थान के निवासी सुखी हों –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;शिवमस्तु सर्वजगतां परहित निरताः भवन्तु भूतगणाः।&lt;br /&gt;दोषाः प्रयान्तु शान्ति सर्वत्र सुखी भवतु लोकः।। &lt;strong&gt;- मालतीमाधवम् 10-25&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;कविता संसार का प्रतीक और पात्रों के माध्यम से मंगल का संदेश देता है। वह समस्त मानवता के प्रति स्वभावतः प्रतिबद्ध होता है। पक्षी, पर्वत, प्राणी-जड़ चेतन सभी उसकी सहानुभूति और प्रेम के पात्र होते हैं। संस्कृत इसी भाव की पूजा करती है। सर्वदया का पाठ पढ़ाती है। सबके श्रेय-पेय की स्तुति गाती रहती है। अपने कल्याण से पहले विश्व मंगल की कामना की जाती है –&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt; “शिवमस्तु सर्व जगताम्।”&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;संस्कृत की भारत सावित्री पूडा-पाठ प्रधान नहीं, धर्म और कर्म प्रधान है। धर्म की व्याख्या में समष्टि का मंगल विधान सर्वोपरि है, बाह्याडंबर नहीं। धर्म की अवधारणा प्रजा और समाज के धारण या रक्षण करने से अर्थवती है। वे कर्म और यम नियम, जो ध्वंस से बचाते हैं और निर्माण करते हैं, उन्हें धर्म कहते हैं। वे आचरण जो आतंक नहीं, आनन्द और अभय़ प्राणि मात्र के लिए सिरजते हैं, उन्हें धर्म की मर्यादा कहते हैं। तभी तो भारत सावित्री कहती है –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;धारणादधर्म इत्याहुर्धर्मोधारयते प्रजाः।&lt;br /&gt;यत् स्यात् धारणसंयुक्तं सधर्म इत्युदाहृतः।&lt;/span&gt; &lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;- महाभारत&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;ऐसी सर्व मंगल धारणधर्मी आवधारणा वाले धर्म को अर्थ, काम एवं राज्यका मूल माना गया है – त्रिवर्गोsयं धर्ममूलं नरेन्द्र राज्यं चेदं धर्ममूलंवदन्ति (महाभारत वनपर्व 414) आशय यह कि जो अर्थ धर्मार्जित नहीं होता, अनीति अन्याय व दुष्ट साधनों से अर्जित होता है, वह अनर्थकारी होता है। गलाकाट प्रतियोगिता व लूट-खसोट को बढ़ावा देता है। आदमी को आदमी नहीं रहने देता। वह धर्म से अनुशासित न रहने पर हवस का रूप ले लेता है। अनुजा तनुजा, परजा में भेद भूल जाता है। आसुरी बन जाता है। धर्म रहित राज्यकी भी यही दशा होती है। हस्तिनापुर का राज्य उसे छोटा लगता है। जो प्राप्त भाग है उसका विकास भूलकर काश्मीर की रट लगाने लगता है। मानों काश्मीर मील जाने पर उसकी कोई इच्छा शेष नहीं रहेगी। यह देश हमेशा धर्म को कमोबेश केन्द्र में रखता चला आया है। लंका जीतकर लंकावासी को और बंगलादेश बंगलावीसी को सुशासन के लिए सौंप दिये गये। यह भारतीय धर्म का मंगल भाव है जिससे हमारा जीवन, हमारे आचार-व्यवहार और हमारी राजनीति अनुशासित है। यह धर्म आध्यात्मिकता की ऊँचाई पर पहुँचकर जीवन के बहुविध अच्छे कर्मों को ही शिव की आराधना मानता है। इस शिव स्तुति का यही विशद आशय है –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;आत्मात्वं गिरिजामतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहम्&lt;br /&gt;पूडा ते विषयोपभोगरचना निंद्रा समाधिस्थितिः।&lt;br /&gt;सञ्चारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो&lt;br /&gt;यतयतकर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम्।। &lt;strong&gt;- शंकराचार्य शिवमानसपूजा&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#00cccc;"&gt;000000000&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#00cccc;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#00cccc;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#00cccc;"&gt;प्रस्तुतिः &lt;a href="http://www.srijansamman.com/"&gt;&lt;span style="color:#ffff00;"&gt;जयप्रकाश मानस, सृजन-सम्मान&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#00cccc;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/33768350-115843446148969813?l=lalitnibandha1.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lalitnibandha1.blogspot.com/feeds/115843446148969813/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=33768350&amp;postID=115843446148969813' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/33768350/posts/default/115843446148969813'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/33768350/posts/default/115843446148969813'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lalitnibandha1.blogspot.com/2006/09/15.html' title='15. सर्वमंगल भाव और संस्कृत साहित्य'/><author><name>जयप्रकाश मानस</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-33768350.post-115843392884843908</id><published>2006-09-16T11:56:00.000-07:00</published><updated>2006-09-16T12:12:08.953-07:00</updated><title type='text'>14. निर्वासन</title><content type='html'>&lt;a href="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/1600/one.jpg"&gt;&lt;img style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/320/one.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;निर्वासन और निर्वसन के बीच मात्र एक मात्रा का अंतर है, परन्तु दोनों के भीतर निहित अपमान-अवसाद की तादात में बेशुमार फर्क है। ठीक है कि जिसके असन, वसन और वास का ठीक-ठिकानान नहीं होता, उसके लिए पुण्य प्रकाशी काशी भी मगहर जैसी हो जाती है और पुण्य सलिला शीतला गंगा भी अंगारवाहिनी लगती है –&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;असनं वसनं वासो येषां चैवाविदानतः।&lt;br /&gt;मगधेन समाकाशी गंगाप्यंगारवाहिनी।।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;परन्तु आधा पेट खाकर, लंगोटी लकाकर, वृक्ष के नीचे रहकर भी कमोबेश सुख काअनुभव किया जा सकता है, ‘अइहहिं बहुरि बसन्त रितु’ की आशा में जीया जा सकता है। फुटपाथ को वास स्थान बनाकर जिंदगी को घसीटकर लोग जी ही रहे हैं। परन्तु निकाले जाने का दर्द बड़े-बड़े मर्दों से नहीं सहा जाता। इसकी पीड़ा भोक्ता को तो हिला ही देती है, द्रष्टा को तटस्थ नहीं रहने देती, द्रवित कर देती है। पाषाण को पिघला देती है। प्रमाण चाहिए तो पंचवटी से पूछिए, जोसीता के अकारण निर्वासन की कचोट से रो उठी थी, बज्र का हृदय फट पड़ा था। आकाश चीत्कार कर उठा था। वनदेवी थरथरा उठी थी और तभी सेराम राम नहीं, राजा राम – आत्मनिर्वासित राम – रह गए थे।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;निर्वासन यातना का अक्रूर रूप है। यह निर्वासित को जल्दी से मारता नहीं, सालता है। चोट नहीं पहुँचाता, कचोटता है। यदि अच्छे कार्यके लिए, देशहित के लिए निर्वासन राजदंड के रूप में दिया जाता है तो वह ज्यादा दुःकद नहीं होता। व्यक्ति अच्छे काम के नाम पर कालापानी की सजा भी काट लेता है। तिलक ने तो कालापीन की यातना सहते-सहते गीता का भाष्य ही लिख डाला था। आज़ादी के दीवानों ने क्या-क्या नहीं सहाथा, परन्तु धरणीसम धीरा सीता भी निर्वासन के दर्द को नहीं सह पाई और धरती में समा गई, क्योंकि यह निर्वासन राजदंड से प्रेरित नहीं था। अपनों के द्वारा अपने का निर्वासन था। समूह मन का निकाला था। राजा समूह मन का मालिक कहालाता है। प्रकृति का रंजन करने वाला राजा कहलाता है। उसमें भी राम जैसे राजा ने निकाला दिया था। अनन्य ने अन्यकी तरह व्यवहार किया था। कैसे सह पाती सीता ?&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;यक्ष अलकापुरी से निर्वासित हुआ था, प्रिया के मन से नहीं। उसे अपनी अनवधानता का भी अहसास था,इसलिए वह आकुल हुआ था, पर आत्मघातके लिए आतुर नहीं।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;देश निकाला का दर्द सहा जा सकता है, पर मन के निकाले का नहीं। थेथर लोगों की नेता किस्म के मानुष की बात और है। सौ जूते खाकर भी थेथर लत नहीं छोड़ता और ज जूते की माला पहनकर भी नेता कुर्सीनहीं छोड़ता। राम के बिना अकाम मैथिली ने मिट्टी में समा जाना ज्यादा बेहतर समझा। व्यर्थ चेतना का विलाप बनकरजीने से समा जाना अच्छा समझा गया। तिल-तिल जीवित मृत्यु को जीने से एक बार ही मरण को स्वीकार करना अच्छा समझा गया।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;सीता के धरा में समा जाने के बाद क्या राम भी आराम से रह सके ? क्या वे भी आत्मनिर्वासन की पीड़ा से छटपटाते नहीं रहे ? वे ऊपर से भले ही शान्त दिखाई दे रहे थे, किन्तु भीतर से पूरी तरह अशान्त, शीतल सागर के भीतर आग चल रही थी। व्यथा कहें तो कैसे और किससे ? राजा तो ठीक से न रो सकता है न हँस सकता है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;राम की बात राम जानें। मर्यादा की सीमा राम-रहीमा के लिए सब कुछ सह्य है – संभव है (रामंतु सर्वं सहे) किन्तु आत्म निर्वासन की यंत्रणा यह यंत्र युग का मानव कैसे सहे ? इस यंत्र युग ने माल को भीतर भर दिया है और मनुष्य को बेघर कर दिया है। पति को परदेस भेज दिया है। बेटे को कारखाने का मजदूर बना दिया है। बाप-बेटे को अलग कर दिया है। जैसे-तैसे बाप-बेटे से मिलने बंबई नगरिया पहुँच भी जाता है तो बेटे को मन भर बतियाने के लिए फुर्सत नहीं। संतान झूलेघर में और भाग्यवान-भाग्यवती नौकरी पर। निर्वासन का सिलसिला एक हो तो बताया जाए, यहाँ तो सारे रिश्ते रिस रहे हैं और सरोकार सर्द हो रहै हैं। भीड़ बढ़ गई है। आदमी अकेला हो गया है। आत्मनिर्वासित आदमी आत्मगात से लेकर आतंकवाद तक कुछ भी अकर्म करने के लिए उतारू है। यह युग सच पूछें तो निर्वसन रहने से ज्यादा निर्वासन का ही दर्द भोग रहा है। अपनों से निर्वासित होकर जी रहा है। बंजारे भी साथ-साथ रहने का सुख पाते हैं। पर अघोषित बंजारे को तो वह भी प्राप्त नहीं है। भगवान बचाए इस निर्वासन से।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;00000000&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;प्रस्तुतिः &lt;/span&gt;&lt;a href="http://www.srijansamman.com/"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;जयप्रकाश मानस, सृजन-सम्मान&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/33768350-115843392884843908?l=lalitnibandha1.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lalitnibandha1.blogspot.com/feeds/115843392884843908/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=33768350&amp;postID=115843392884843908' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/33768350/posts/default/115843392884843908'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/33768350/posts/default/115843392884843908'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lalitnibandha1.blogspot.com/2006/09/14.html' title='14. निर्वासन'/><author><name>जयप्रकाश मानस</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-33768350.post-115843297437442699</id><published>2006-09-16T11:55:00.000-07:00</published><updated>2006-09-16T11:56:16.320-07:00</updated><title type='text'>13.सर्वमङगल माङगल्ये</title><content type='html'>&lt;a href="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/1600/durga.jpg"&gt;&lt;img style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/320/durga.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;सर्वमंगला काली कराल वंदना घोररूपा भयंकरी है, परन्तु विरोधाभास से देखिये कि वे सर्वमंगला कहलाती हैं। त्रिपुर सुंदरी व मंगल मूर्ति हैं। विचारकर देखें तो यह विरोधाभास ही है, वास्तविकता नहीं। ‘मगि’ धातु से अचल् प्रत्यय लगाकर ‘मङगल’ शब्द और ‘यत्’ तथा ‘ण्यञ्’ जोड़कर क्रमशः मङगल्य और माङगल्य शब्द निष्पन्न होता है। ‘सर्वमंगा’ विशेषण साभिप्राय है। उनके अनेक नाम-रूप हैं और सबके अभिप्राय हैं, किन्तु मांगल्य का भाव अन्तर्धारा की तरह सभी में समाहित है – तेज में प्रकाश की तरह, भगवान में भगवत्ता की तरह। ‘काली’ नाम के आशय पर ही विचार करें तो ज्ञात होगा कि शिवानी का यह नाम भी घोर रूप को प्रकट करता हुआ भी कल्याण से रहित नहीं है। प्रकृति अपने मूल स्वरूप से पृथक नहीं हो सकती। जल अपनी रसात्मकता नहीं छोड़ सकता न अग्नि अपनी उष्णता। उसी तरह काली रूप में भी शिवानी शुभ ही करती है। काली शब्द की व्युत्पत्ति है कि जो काल स्वरूप धारण कर समय के पाप-ताप-शाप दुर्वृत्त आदि को लीलती रहती है, उसे कालिका कहते हैं – कलयति लीलयति पापं दुर्वृत्तं वा सा कालिका। कलयति भक्षयति प्रलय काले सर्वम् इति काली अर्थात् काली काल बनकर दुराचार भ्रष्टाचार को लील जाती है। जग के कालकूट को महाकाल की तरह महाकाली पी जाती है और गौरी से काली बन जाती है – जैसे कपूर गौर शंकर नीलकंठ बन जाते हैं। है न मांगल्य भाव ?&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;मूढ़ हैं वे लोग, जो अपने को चतुर-चालाक समझकर गलत काम करते रहते हैं और सोचते हैं कि काली के कोप से वे बच जायेंगे। जग की आँखों में धूल झोंकी जा सकती है, जगदीश्वरी की आँखों में नहीं। वे भूल जाते हैं कि सर्वमंगला होकर भी दुर्वृत्त बरदाश्त नहीं कर पातीं। उसका शमन करना उनका शील है –&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;दुर्वृत्तशमनं तव देखि शीलम्।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;भवानी का दूसरा नाम भद्रकाली भी है। काली शब्द के रूप में लगा भद्र विशेषण उनके सर्वमंगल शील का ही संकेत देता है। भद्र, अर्थात् जो भक्तों के लिए मंगल स्वीकार और प्रदान करे उसे भद्रकाली कहते हैं – भद्रं मङगलं सुखं वा कलयति स्वीकरोति भक्तेभ्यो दातुम इति भद्रकाली सुखप्रदा। भद्रकाली की असुर संहार लीला के रहस्य में भी सोचकर देखें, तो सर्वमांगल्य निहित है। संहार के पिछे सृजन का भाव भावित है। भला सोचिये की जगन्माता विश्वमूर्ति भवानी कुमाता कैसे हो सकती है ? अकारण अपने ही पुत्र असुरों का संहार क्यों करेगी ? किन्तु अपना ही पुत्र यदि कुपुत्र बन जाता है, राज-समाज का शत्रु बन जाता है तो क्या माता-पिता उसका शमन नहीं करते ? असुरों का शमन और सुरों का पोषण किसी प्रकार के पक्षपात का परिचायक नहीं है, अपितु आसुर व सुरभाव का शमन-पोषण है। जग-मंगल का विधान है। सृष्टि सुव्यवस्था है। लोकहित की रक्षा है। मूल्य-मर्यादाओं की अभिरक्षा है। शास्त्र का स्पष्ट मत है कि लोक कल्याण की दृष्टि से किया गया कार्य सुकर्म है। हत्या भी पाप नहीं धर्म है। हत्या पाप है, किन्तु वध नहीं। राम ने रावण का और कृष्ण ने कंस का वध किया था, हत्या नहीं। रावण वध के पीछे सीता मात्र निमित्त कारण थी। मुख्य कारण तो रावण का स्वयं का दुष्कृत्य था जो लोकहित को बाधित और लोक कोप को संवद्धित कर रहा था। राम का कोप उसी लोक-कोप की अभिव्यक्ति था, जिसका शिकार रावण को बनना पड़ा। भागवतकार की यह गोविन्द वंदना इसी वास्तविकता की समृति है –&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;लोक शोकापहाराय रावणं लोकराणः। रामो भूत्वावधीत् यस्तं गोविव्दं विन्दतां मनः।।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;जन्म से ही रावण लोक को रुलाता रहा। भाइयों तक को नहीं छोड़ा। व्यासदेव का तो स्पष्ट मत है कि प्रभु मनुष्य देह धारण ही करते हैं मनुष्य को शिक्षा देने केलिए। राक्षस वध उनका एकमात्र लक्ष्य नहीं होता। आत्माराम राम के द्वारा किया गयारावण वध सीता निमित्त नहीं था, लोक हित और लोक शिक्षा से प्रेरित था –&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;मर्त्यावतारिस्त्विह मर्त्यशिक्षणं, रक्षोवधायैव न केवलं विभोः।&lt;br /&gt;कुतोsन्यथास्यादरमतः स्व आत्मनः,सीता कृतानि व्यसनानीश्वरस्य।। - &lt;strong&gt;भाग. 5-19-5&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;तथ्यहै कि समस्त अवतार लोक उपासना की अभिव्यक्ति हैं। यह स्वार्थी मर्त्यलोग अपने अवतारों की उपासना या उनके प्रति निष्ठा का प्रकटीकरण सेंतमेंत में नहीं करता। न जाने अपने हित के लिए लोकेश को किस-किस जहालत में डालता रहता है। कृष्ण को ही लीजिए। क्या वे कबी भी सुख से दोरोटी का सके ? जिस गोपाल ने अपने बालपन में ही लोगों को त्राण दिलाने के लिए कष्ट उठाया उसी कृष्ण कोजरासंध की इस मांग पर कि मथुरा के लोग मुझे कृष्ण-बलराम को सौंप दें हत्या के लिए। मैं शेषलोगों को मुक्त कर दूँगा। युद्ध नहीं करूँगा। अन्यथा सबको जलाकर राख कर दूँगा। लोगों ने अपना स्वार्थ देखा और कृष्ण-बलराम को क्रूर जरासंध के हाथों सौंपने का निश्चय कर लिया। यह सोचकर कि इन दोनों के मरने से हम सब बच जाते हैं, तो बुरा क्या है ? ऐसा होता है लोक ?&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;भागवती की असुर संहार लीला के पीछे भी लोक उपासना का भाव है। वे राक्षसों को मारती नहीं, संहार करती हैं। उनके दुष्कर्मों के विस्तार समेटती हैं। रोकती हैं – अनवरुद्ध लोक यात्रा के लिए। सभी के उपकार के लिए सदा दयालु बनी रहने वाली (सर्वोबकार करणाय सदाssर्द्रचित्ता) शिवानी दानवों को मारकर जग.का कल्याण ही तो करती हैं। अपने में मिलाकर योगियों के लिए भी दुर्लभ सायुज्य मुक्त दुष्टतम राक्षसों को भी प्रदान करती है –&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;एबीर्हतैर्जगदुपैति सुखं तथैते, कुर्वन्तु नाम नरकाय चिराय पापम्।&lt;br /&gt;संग्राममृत्युमधिगम्य दिवं प्रयान्तु, मत्वेति नूनमहितान विनिहंसि देवि।।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;- दुर्गासप्तशती 4-18&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;शक्ति का दुर्गा, काली, गौरी आदि रूपों में प्रकटीकरण देव शक्तियों का सामूहिक अवतरण है – समूह मंगल के लिए देव, दानव व मानव सभी उनके उपकार से उपकृत होते हैं। सभी उनके स्मरण से कृकत्य होते हैं। असुरगण तो खासकर शिव और शक्ति की उपासना करते हैं। विश्व जननी सर्वे भवन्तु सुखिनः की प्रतिमूर्ति हैं। कोई सच्चे मन से उनका स्मरण करके तो देखे –&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः&lt;br /&gt;स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।&lt;br /&gt;दारिद्र दुख भयहारिणी का त्वदन्या&lt;br /&gt;सर्वोपकारकरणाय सदाssर्द्रचित्ता।। - &lt;strong&gt;दुर्गा सप्तशती 4-17&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;जाहिर है किदेव शक्तियों के पूँजीभूत रूप मंगला भगवती शुभ शक्तियों का समवाय हैं। शुभंकरी हैं। उनके नाम और रूपों की जितनी व्याख्या की जाये कम है। उनके वाहन सिंह, अस्त्र-शस्त्र और उनकी लीलाओं – सब का आशय एक ही है – सर्व मंगल। शक्ति-साधना जरूरी है शुभ-सुख की स्तापना के लिए। दुर्बल को सभी सताते हैं। आसुरी शक्ति लाख मनाने-चेताने पर भी नहीं मानती। सीधी नहीं रह सकती – कुत्ते की दुम की तरह। सत्ता सिंह की तरह होती है जिस पर नियंत्रण रखने तथा उसेशुभ कार्य में लगाये रखने के लिए देवी उस पर सवार रहा करती हैं। साधना भी जब गलतउद्देश्य से प्रेरित होती है तो श्रेय-प्रेय के बजाय ध्वंस ही सिरजती है – दक्ष यज्ञ की तरह। मातृशक्ति ज्यादा ममतामयी धैर्यवती और उदार होती है। वह कुपुत्र को भी स्नेह देने में कोताही न हीं बरतती, किन्तु शरीर का ही कोई अंग जब सड़ जाता है, उसेक विष से सारे शरीर का खतरा बढ़ा जाता है तब उसे काटकर फेंक देने में ही क्षेम निहित होता है। ठीक इसी तरह जब कोई दानव या मानव समाज के लिए खतरा बन जाता है तब उसका अपसरण या नाश अपेक्षितहो जाता है। संहार लीला का यही रहस्य है। रहस्य यह भी है कि आदमी शिक्षा ले। आदमी आदमी बना रहे। ब्राह्मी सृष्टि का वह सर्वोत्तम जीव बन के रहे। आध्यात्म और भोतिकतामें तालमेल रहे। दुर्का दुर्गति दूर करने और योग-क्षेम वहन करने के लिए मानवताके आह्वान पर अवतरित होती हैं। सबका मंगल नारायणी का अभिप्रेत होता है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;सर्वमङगल माङगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।&lt;br /&gt;शरण्ये त्र्यंबकेगौरि नारायणी नमोsस्तुते।।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#ffffff;"&gt;&lt;strong&gt;0000000000&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;प्रस्तुतिः &lt;a href="http://www.srijansamman.com/"&gt;जयप्रकाश मानस, सृजन-सम्मान&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/33768350-115843297437442699?l=lalitnibandha1.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lalitnibandha1.blogspot.com/feeds/115843297437442699/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=33768350&amp;postID=115843297437442699' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/33768350/posts/default/115843297437442699'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/33768350/posts/default/115843297437442699'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lalitnibandha1.blogspot.com/2006/09/13.html' title='13.सर्वमङगल माङगल्ये'/><author><name>जयप्रकाश मानस</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-33768350.post-115843262995132966</id><published>2006-09-16T11:43:00.000-07:00</published><updated>2006-09-16T11:50:31.826-07:00</updated><title type='text'>12. भोग और शक्ति</title><content type='html'>&lt;a href="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/1600/life.jpg"&gt;&lt;img style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/320/life.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;साधारण तौर पर पानी और जल में, भोग और भोजन में, भोज और भोजन में कोई अंतर नहीं दिखाई देता। केवल शब्दों का हेर-फेर लगता है। मूड़ का नाम कपार जैसा लगताहै,पर बारीक विचार करने पर इनमें बहुत फर्क है। नाली का पानी जल नहीं कहला सकता, गंगा का जल पानी नहीं कहला सकता। कहना हो तो कह लीजिए पर तर्कसंगत नहीं लगता। भोज और भोजन में वही दूरी है जो राजा भोज और भोजबा तेली में है। भोज भोग के ज्यादा समीप है। जो रस, जो आस्वाद, जो सौजन्य और जो आह्लाद भोज में है वह भोजन में कहाँ ? खाना ता भूख की खानापूर्ति है और लंच पेट के प्रपंच की पूर्ति। भोज के नाम से भोज्य पदार्थ का जायका कुछ और ही हो जाता है। उसका नाम सुनते ही कई मीठे प्रसंग और संदर्भ ढेर सारे अनुषंगों के साथ मन में तैरने लगते हैं। साथ में मिल-बैठकर बाँटकर भोगने के भाव भी भोजन में शामिल हैं। एक ही प्रकार के भोजन आप होटल में कीजिए। गृहिणी की प्रीति की छौंक से सिक्त वही घर में कीजिए और वहीं सबके साथ एक प्रांत में बैठकर बोज में कीजिए, तृप्ति में भारी अंतर मालूम पड़ेगा। यही हाल भोग का है। भोज में कई प्रसंगों की साझेदारी होती है, तो भोग में भाव की। यह भाव भगवदीय भी हो सकता है और मानवीय भई। भाव के योगायोग से साधारण भोज्य पदार्थ भी भोग बन जाता है – नैवेद्य बन जाता है – भगवान का प्रसाद बन जाता है। बहुत दिन पहले की बात याद आ रही है – मेरे घर पिताजी के मामाश्री आये हुए थे। मेरे दादाजी ने बड़े प्रेम से शकरकंद को कंडे में पकाकर उसमें दूध-चीनी मिलाकर मामाश्री को देना चाहा। उन्होंने बिना चखे कहा की रहने दीजिए, ऐसा तो मैं रोज खाता हूँ। किन्तु दादाजी ने कहा इसे जरा चखकर तो देखिए। यह खाना नहीं भोग है, प्रसाद है, इसका स्वाद ही और है। प्रसन्न हो जायेंगे। चखने के बाद वे और मांगने लगे।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;दरअसल भाव का भोग लगता है। सूखी रोटी भी मेहमान को या भगवान को आदर भाव से निवेदित कीजिए वह नैवेद्य बन जायेगी और इसके विपरीत रसगुल्ले भी बिना भाव के परोसे जाने पर भूसा बन जाते हैं, क्योंकि सांवरा भाव का भूखा होता है। जूठा बेर भी प्रेम से खिलाया जाये तो वह रुचि से खाता है। बिदूर का साग भी बड़े चाव से खाता है और दुर्योधन के छप्पन भोग को भी छोड़ देते हैं। जिस छप्पन में छल छिपा हो, अहंकार मिला हो, जिमाने का भाव नहीं, निवेदन नहीं, उसे भगवान तो भगवान इंसान भी ग्रहण नहीं करता। यदि वह उसे खाता भी तो उसमें वह रस नहीं पाता, उसे व्यवहारवश निगलता है। इसीलिए भगवान को कोई चीज भोग लगाते समय भक्त बड़े भाव से निवेदन करतेहुए कहता है कि हे गोविन्द यह आपकी वस्तु आपको अर्पित है। आप उसे प्रसन्न मन से ग्रहण करें। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;त्वदीयं वस्तु गोविंद तुभ्यमेव समर्पये। ग्रहण सुमुखी भूत्वा प्रसीद परमेश्वर।।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;इस भाव से जब व्यक्ति खाली हो जाता है तब वह मालामाल रहते हुए भी कंगाल नजर आता है। पूरे देश को भी चाट लेने के पश्चात भी वह अतृप्त रहता है। और की तलाश में कई तरह के घोटाले हवाले में संलग्न रहता है। इस अतिरिक्त संलग्नता और हवस में पड़कर वह मनुष्यता से वंचित तो हो ही जाता है, प्राप्त सुखभोग से वंचित रहा करता है। हब्शी और वहशी को सुख कहाँ ? उसकी तो “डासत ही भाव निशा सिरा जाती है।“ जोड़ता कोई और है और भोगता कोई और है। यह आँखों देखी बात है, कानों सुनी नहीं। हमारे गाँ में एक महाजनी सभ्यता के ठेकेदार थे। नाम था सत्यदेव। नाम के विपरीत उनका आचरण था। चालीस साल पहले बहुत ब्राह्मण बंधुओं के लिए भी काला अक्षर भैंस बराबर हुआ करता था और अन्यों के लिए ओनामासी ढम, बाप पढ़े न हम जैसी स्थिति थी। इस स्थिति का फायदा उठाकर और ईमान-धरम से आँखें बचाकर वे काला-पीला किया करते थे। ऋण देते वक्त दो तीन और लेते वक्त तीन का दो बहीखाते में लिख दिया करते और ऋणी से अंगूठा लगवा लिया करते थे। पाप का धन प्रायः बहुत जल्दी बढ़ता है और उसी मान से घटता भी है। देखते-देखते सत्यदेव पहले तो शक्कर और उच्च रक्तचाप के शिकार हुए। भोग उठ गया। दो सूखी रोटी भी ठीक से खा नहीं पाते थे। जिसके पास भरपेट भोजन की व्यवस्था नहीं होती उससे ज्यादा दुःखी वह होता है जिसके पास भोगने के सारे पदार्थ प्रस्तुत होते हैं, परन्तु बीमारी के कारण वह उन्हें देखता भर है, भोग नहीं पाता।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;सकल पदारथ जगमाहीं। करमहीन नर पावत नाही।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;सत्यदेव के बेटे विलासी बन गए और देखते-देखते ही उनके खाने के लाले पड़ गए। पर मानता कौन है ? इतिहास पुराण के पन्ने दृष्टान्तों से भरे पड़े हैं। रोज-बरोज पास-पड़ोस में ऐसे उदाहरण देखने को मिलते हैं, पर आदमी मानता नहीं है, चेतता नहीं है, आगे-पीछे देखता नहीं है। नहीं तो ऐसा दिन क्यों देखना पड़ता कि जिनके इशारे से पत्ते हिलते थे आज वे पत्तों की तरह काँपते हैं। जिन मंत्रियों का स्वागत आँखें बिछाये होता था, आज उनके स्वागत में बंदी गृह सज रहेहैं। लानत है अमानत में खयानत करने वाले लोगों के भोग को।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;भोग काशी शास्त्र होता है। कोई बहुत भूखा होने पर भी दोनों हाथ से खाने लगता है। दोनों हाथ से बटोरा जा सकता है। खाया नहीं जा सकता। ऐसा न भोगें कि हाजमा खराब हो जाए। अजीर्ण भोजन विष बन जाता है। मित भोजन मीत होता अमित मित्र। ऐसा ही भग रोग बन जाता है। भोग सुख भी होते हैं और दुःख भी। और किये का फल यहाँ या वहाँ भुगतना ही पड़ता है। क्रिया कभी निष्फल नहीं होती। यही कारण है गीता निष्काम कर्म करने के लिए प्रेरणा देती है। क्रिया के सारे फलों को कर्म-धर्म को समर्पित कर देने की सलाह देती है,ताकि अच्छे-बुरे फलों को सुख-दुख को समभाव से भोगा जा सके।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;दरअसल समर्पण का भाव कर्तव्य के अहंकार का त्याग है, निमित्त भाव का स्वीकार है। यह फालतू किस्म का दैन्य नहीं, न ही हारी हुई सेना का शस्त्र समर्पण है। हारे हुए का हरिनाम तो रहारा होता ही है, दुख में तो सब सुमिरन करते ही हैं, किन्तु यह सुख में सुमिरन की मानसिकता है। असीम के प्रति ससीम का श्रद्धा अर्पण है। कृपालु के प्रति कृतज्ञता का बोध है। इन्हीं भावों के साथ भगवान को पत्र-पुष्प जो भी अर्पित आस्वाद्य बन जाते हैं, अमृत बन जाते हैं। अमृत भी तो एक अलौकिक अनुभूति ही है। मीठा अहसास है, आनन्द की चरम उपलब्धि है। फिर असली अमृत को देखा किसने है और पिया किसने है ? वस्तुतः भोजन चाहे लाख स्वादिष्ट हो, यदि भक्तिपूर्वक निवेदित नहीं होता तो वह भोग नहीं बन सकता और भक्ति रहित भोग रोग है। और ऐसा भोग आदमी को बी भोग लेता है, भले ही आदमी इस मुगालते में हो कि वह उसे भोग रहा है। मद्यपायी सोच रहा हो कि मैं मद्य पी र&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;हा हूँ। शंकराचार्य जैसे ज्ञानी ज्ञान की सीमा जानते हैं। अतः वे भोग रोग से बचने के लिए गोविंद भजन की सीख देते हैं –&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;“भोग न भक्ता वयमेव भुक्ताः&lt;br /&gt;कालो न यातः वयमेव यातः&lt;br /&gt;भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;गोविन्द भज मूढ़मते।।”&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;तुलसी के राम भी शबरी से कहते हैं कि हे भामिनी बिना भक्ति के कुल, जाति, बड़ाई, मान-सम्मान आदि जल विहीन बादल की तरह शोभित नहीं होते। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;“जाति-पांति कुल धर्म बडा़ई। धन बल परिजन गुन चतुराई।।&lt;br /&gt;भगतिहीन न साहई कैसा। बिनुजल बादि देखिन जैसा।”&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;वस्तुतः भक्तिहीनता श्रद्धआ-विश्वास का चुक जाना है। “ईश्वर मर गया” यह घोषणा करने वाला आस्थाविहीन यह युग क्या जाने कि देवता मनुष्य के लिए और मनुष्य देवुता के लिए कितना जरूरी है ? भक्ति को पूजापाठ क्रियाकाण्ड का पर्याय मानने वाले मानुष क्या जाने कि धर्म और सम्प्रदाय से भक्ति करती है, सबको सबका भाग देती है, भक्ति नहीं करती जोड़ती है। वह बाँटती है तो केवल आनन्द को, प्रेम को, उछाह को, प्रसन्नता को, वह अर्पितकर बाँटकर भोगने के लिए सूत्र देती है। उसी सूत्र की व्याक्या कदाचित मार्क्सवाद है। गीता का स्पष्ट कथन है कि जो व्यक्ति केवल अपने लिए पकाता है, बाँटकर नहीं बोगता, वह भोग नहीं पाप भोजन है – भुज्यते ते अद्यंपापा ये पचन्त्यात्मकारणात्।। भक्ति का दर्शन सहभाग का दर्शन है। इसमें भक्त, जगत और जगतपति सभी सहभाग होते हैं। एक दूसरे को भावित करते हैं एक दूसरे को श्रेय-प्रेय बाँटकर जीवन को अर्थ प्रदान करते हैं –&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;देवान्भावयतानेन ते देवा भायुन्तु वः।&lt;br /&gt;परसांर भवयन्तः श्रेयःऋ परमावश्यथ।।&lt;br /&gt;इवटान्भागान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;नैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो छु भुङ क्ते स्तेन एव सः।। 31.11.92&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;भक्ति और भजन भी भोग भोजन की तरह चिंतनीय है। भजन यद्दपि भकि्त का ही स्वरुप है, परन्तु दोनों के बीच बारीक लकीर खींची जा सकती है। दोनों मे साध्य-साधन संबंध स्थिर किया जा सकता है। राम को पाने के लगए सुमिरन आवश्यक है। एक भजन साधन है। भक्ति की विद्दा है। एक भाव है तो दूसरी रस है भजन-भाव है तो भक्ति अहोभाव है इसी अहोभाव के सामने सुधा र भी तुच्छ लगने लगता है सुखदेव जी गवाह है कि राजा परिक्षित को जब वे भगवान कथा सुनाने को प्रस्तुत हुए तभी देवता लोग स्वर्ग लोक से अमृत घर लेकर पहुँच गए। और सौदा करते हुए बोले मुनिवर आप राजा परिक्षित को बनाने के लिए यह अमृत घर ले लिजिये और बदले मे हमें कथामृत का दान दीजिए। दावो पर हंसते हुए मुनि बोले काघ और कंचन में अदला-बदली कैसी? कहाँ यह अमृत और कहाँ यह भगवदीय कथमृत।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;इस मकारा के पीछे निश्चय ही यह धारणा रही होगी कि अमृत तो खारे सागर से उत्पन्न रस है इसमें खारा पन का कुछ रस तो बचा ही होगा। दूसरी बात यह छीना-झुटी से बचा अमृत है। राक्षसों को वंचित कर संचित ईष्या-वेष समन्वित इस अमृत मे वह स्वाद-प्रभाव कहां जो वेद-पुराण से उदभूत भगवतकथामृत मे है। यह भक्ति रस पूरित कथा मनुष्य को ईष्या द्वेष से उपर उठाती है किसी को वंचित नही करती और न कुछ संचित करती है। यह तो सबको प्रेमसुधा रस बांटती ही रहती है। अमृत गले से नीचे उतर कर चूक जाती है, प्रभावहीन हो जाता है, स्वाद रहित हो जाता है, कथारस भीतर उतरकर तर कर देता है। देह-गेह बिसारकर भक्त सांई का सुमिरण करता कराता रहता है। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;सब रग तमत रबाब तन बिरह बजावै नित्त।&lt;br /&gt;और न कोई सुन सके, कै साईं के चत्त।।&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;कई मायने मे कथामृत अपनी श्रेष्ठता का इजहार करता है। इसमे मन को बांधने की ताकत होती है। रमाने की औकात होती है। झरने की तरह प्यास बुझाने की सामर्थ्य होती है। बादल की तरह भिगोने की सहज परोपकारी होती है। यह एक साथ कई इन्द्रियों को बाँधती है। ऐसे गुण उद्द्दि अदभूत् अमृत मे कहाँ? उसे तो एक बार पी कर आदमी निश्चिंत हो जाता है। अमरत्व के अंहकार से भर जाता है। इतना ही नही कथीमृत कई रसो का रसायन होता है। इसमें हृदय दहलाने-सहलाने और दुबोने-उबारने एख से बढ़कर एक प्रसंग होते है, लीलाचरण के अध्याय होते है जो कई तरह से विभोर करते है। यह खूबी अमृत मे कहाँ। वह घर रीत सकता है पर कथा सागर तो अथाह है। कथा के कारण ही सूर के गीत से ज्यादा तुलसी के दोहे-चौपाई जन-जने को समोते है। दूर तक खींचते है। सूर के गीत भी लीला संदर्भो के कारण कदाचित अन्यों की अपेक्षा ज्यादा रमाते है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;दरअसल भगवदीय कथा की बात ही कुछ और है। यही कथा कथा है, बाकी सब व्यथा है, क्योकिं यह भक्ति रस से सिक्त होती है और भक्ति श्रद्ददा विश्वास और प्रेम के भाव संमिश्रित होते है जो व्यक्ति को मम ममेतर से मुक्त करते है मुक्तदशा में न कोई चाह शेष रह जाती है और न चलने के लिए राह। संदेह मिट जाते है, तर्क गल जाते है। ज्ञान का जाल मिट जाता है। जिस मुक्ति के लिए मुनिगण जन्म-जन्म जतन करते रह जाते है, पंडित वृंद पोथी पढ-पढ कर थक जाते है, ुस परम को बिना किसी विशेष यम नियम और धरम-करम के भक्त पा लेता है। प्रभु को अपने भीतर पधरा लेता है-सारे संतो का एक ही मत है&lt;br /&gt;पायो जिन राम, तिन प्रेम ही सो पायौ है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;नृगां जन्मसहस्त्रेण भक्तौ प्रीतिर्हि जायते।&lt;br /&gt;कलौ भक्तिः कलौ भक्तिर्भक्त्या कृष्ण पुरः स्थिर्तिः &lt;strong&gt;भागवत 1-2-19&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;अर्जुन भगवान के अत्यन्त प्रिय पात्र थे अपने सखा के श्रेय के लिए गुहृय गीता ज्ञान का आख्यान उन्होनें किया। उन्हें ज्ञान योग और कर्म योग के अनेक बुझौवल बुझा लेने के बाद, फेंट-फेंटकर गुह्यादगुह्यतर ज्ञान दे लेने के बाद श्री कृष्ण ने अपने दिव्य रुप की झाँकी दिखाई। इस झाँकी से संभवतः अर्जुन का मन और चकरा गया। गीता के 18 अध्याय के 6 सौ 86 श्लोक भी चक्कर दूर नही कर सके तो श्री कृष्ण ने सौ बातो के लिए एक ही बात कही- प्रिय अर्जुन तू अपने मन को मुझमे रमा दे, मेरा भक्त बन जा, मेरी पूजाकर, मुझे प्रणामकर मुझमे समा जायगा, समझ जाएगा। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;मन्मना भव मदभक्तो मव्याजी मां नमरकुरू।। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;मामेवैष्सि सत्यं ते प्रति जाने प्रियोश्सि में।। 18 1165&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;वस्तुतः सोचकर देवों तों ज्ञान की कोई सीमा नही है शब्द शास्त्र अनन्त है। अनेक वेद-पुराण है, बाईबिल-कुराण है शास्त्र स्मृति है, अनेक ऋषि-मुनि और महापुरुष के वचन- प्रवचन है। किसको माने किसे नही, यह पचड़े का विषय है इसलिए इस प्रषंच से निजात पाने के संत पते की बात कानों मे कहते है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;भगति &lt;span style="color:#cc0000;"&gt;भजन हरिनाम है, दूजा दुख अपार ।।&lt;br /&gt;मनसा बावा कर्मना कबीर सुमिरन सारे।।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;सच मे सुमिरन सार है सुबदन को सार समझने वालों कोयह बात सारहीन लग सकती है परन्तु अद्वैत वेदान्त के चूड़ान्त ज्ञानी आचार्य़ शंकर भी अन्त मे सुमिरन के लिए आदेशात्मक राय देते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;भज गोविन्दम् भजगाविन्द भज, मुढमते। क्योकि वे जानते है भजन भक्ति के सारे भाव समा जाते हैं। सारे ज्ञान-विज्ञान क्रिया अनुष्ठान तिरोहित हो जाते है, निराकार आकार पा जाता है निंरजन लीम्बुज श्यामल बनकर नयन मे रच जाता है। वह ऐसा अनुरुब रुप पा जाता है कि देखने वाले ठगा-सा रह जाता, जीने मरने लगता है जीयतमरत झूकिं झूकिं परत जेहि वितवत एकबार, तन यमुना तट हो जाता है और मन वृंदावन। लोक लाज छोड़कर कुल कानि को ताक पर रखकर गापियां इन्द्रियाँ रास मे रम जाती है। मीरा लागी लगन मे मगन हो जाती है चित्र द्रवित हो उठता है, विभोर हो जाता है और पोर-पोर महारास में सराबोर होने लगता है और भुवन धन्य हो उठता है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;ताग, गदगदा, द्रवते यस्य चिद्तं रुदत्यभिक्ष्णं हसति क्वच्चिद&lt;br /&gt;विलन्ज उदगायेति नृत्यते च मद् भक्तितयुक्तः भुवनं पुनाति, &lt;strong&gt;भागवत 11/14/24&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;सोचकर देखें तो पता नही चलेगा कि ज्ञान की कोई सीमा नहीं है। यह पूरी तरह व्यक्ति आश्वस्त भी नहीं कर पाता जबकि भक्ति के आते ही आशवस्ति मिल जाती है। यह जीवन का बीमा है। पोषण है। अनुग्रह है। लोकसंग्रह है। भक्ति का ना कोई शास्त्र है और तर्क जाल है। नारद मुनि ने भी भक्ति के शास्त्र नही सूत्र दिये हैं, जिन सूत्र को गहकर व्यक्ति आसानी से अंधकार को पार कर सकता है। भक्ति तो गीत है, दीवानगी है, अश्रु है, अनुराग है, जीवनोत्सव है, इसलिए दुनियादारी एक किनारे करके मीरा गाती है, नाचती है और गिरिधर के रंग में रंग जाती है। सूर सूरसागर में ऊभचूम करने लगते है। तुलसी की भक्ति का मन जब “मानस नहीं” भरता तो वह कवितावाली-दोहावली गाने लगता है भक्ति में निहित इसी मस्ती को छानने के लिए भक्त गण राज पाट धन-दौलत यहां तक कि मुक्ति भी नकार कर भक्ति की मांग करते है। हनुमान जी की यह दशा है कि जहाँ रघुनाथ की गाथा गाई जाती है वहाँ वे अश्रु छलकाते उपस्थित रहते हैं। भक्तिस्वरुपा माता सीता ने भी हनुमान जी को वरदान देते हुए कहा था कि “तुम पर रघुनाथ जी नेह की वर्षा करते है”।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;भक्ति लगी की वस्तु है। लगी नहीं कि समझिये ज़िंदगी तर गी, विहाल हो गई। सारी भाव बाधा दूर हो गई इसमें राधा माधव हो जाती है और माधव राधा। भक्त ज्ञान का पहाड़ा भूलकर प्रेम का पाठ पढ़ने लगता है और वह पोथी नहीं ढाई आघर पढ़ता है और सब कुछ पा जाता है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;“हहिहिं साध्यते भक्त्या प्रणामं तत्र गोपिका”&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;की पहली शर्त ज़रूर है, किन्तु रिरियाहट उसकी नियति नहीं। वह रिरियाती नहीं, वह पुकारती है। यही प्रकार भजन-कीर्ति और अजान होती है जो आराध्य को चाहे वह जिस किसी बाल में हो खींच लाती है। द्रौपती ने पुकारा, कृष्ण चीर बन गए। गज ने पुकार, गंडक तीर पहुँच गए। मीरा ने पुकारा उसके एक तारा बन गए। जब सूर से बाँह छुड़ाकर भागने लगे तो सूरदास रिरियाये नहीं। अपितु ललकारते हुए कहा –&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;“बाँ छुड़ाये जात हौ अबल जानि के महि।&lt;br /&gt;हृदय से चले जाव तो मर्द बखानौ तोहीं।।”&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;भक्त के आत्मनिवेदन और विनय में रिरियाहट नहीं होती आत्मविश्वास, श्रद्धा और अनुराग होते हैं। उसी अनुरागवश वासुदेव हो जाते हैं। कभी उखलन में बँध जाते हैं। कभी गाय नचाने लगते हैं। चराने लगते हैं तो कभी माखन चोरी के लिए पकड़े जाते हैं। धन्य है भक्त और वृंदावन जो भगवान सहित भक्ति को भी नचाते हैं –&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;“वृंदावनस्य संयोगत्युनस्त्वं तरुणी नवा।&lt;br /&gt;धन्यं वृन्दावनं तेन भक्तिर्नृत्ति यत्र च्।।” – 1-1-96&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;यही कारण है कि भगवान अपना अपमान सह सकते हैं किन्तु भक्तों का नहीं अपना वचन छोड़ सकते हैं, किन्तु भक्त को दिए हुए वचन को हर हाल में निभाते हैं। वे बैकुण्ठ को छोड़ सकते हैं परन्तु भक्त के हृदय निवास नहीं।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;“नाहं वसामि बैकुण्ठे, योगिनां हृदयेषु च मत भक्ताः यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद।।”&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;ज्ञान और वैराग्य भक्ति के आत्मज हैं। भक्ति के आते ही व्यक्ति को संसार का वास्तविक ज्ञान असली तात्पर्य भासित हो जाता है। यह ज्ञान तर्क-वितर्क, वाद-वितंडा से कम और श्रद्धा-विश्वास से अधिक जुड़ा होता है। मतवाद नहीं, संवाद होता है। विराग के भीतर भी परमात्मा का – इन दोनों से भक्ति पुष्ट होती है। ह भी ध्यान रहे कि भक्ति तर्क को एकदम से नहीं अस्वीकारती। अंध श्रद्धा, अन्ध विश्वास, सकाम प्रेम भक्ति के स्वरूप में शामिल नहीं। भव को बंधन समझकर रस्सी तोड़ाकर पर्वत पर भाग जाना, धुनी रमाना, माया के भय से भाग खड़े होना, ये भक्ति के भाव नहीं हैं। वह जीवन को इंच-इंच स्वीकारती है, जीती है – उत्साह से जीती है, कण-कण में सीयाराम के दर्शन करती है। प्रणाम करती है और उदास निराश चेहरे पर मुस्कान बिखेरती है। वह ज्ञान की तरह स्थितप्रज्ञ नहीं रहती। वह हर रंग को , हर मौसम को अहोभाव के साथ स्वीकारती है और शरद की ज्योत्सना और वृंदावन जैसी जगह, अनुकूल काल स्थान पाकर नाचने लगती है। सुख-दुख को ईश्वर की ही देन समझकर भोगभाव से स्वीकारती है। वह भागती है आडम्बर से, चाहे वह अनुष्ठान का आडम्बर क्यों न हो। वह परहेज करती है, पुरोहिताई से, क्योंकि भक्ति भगवान से सीधा-सीधा साक्षात्कार चाहती है। सम्पर्क चाहती है, संवाद चाहती है। वह किसी को बीच में लाना पसंद नहीं करती। पुरोहित बिचौलिया होता है। क्रियाकांड में भरमाता है। राम में सीधे रमने के लिए अवसर नहीं देता। द्रावीड़ प्राणायाम कराता है। “हरितालिका में जो नारी व्रत नहीं करती वह अमुक दोष से ग्रस्त हो जाती है।जो लोग नरक निवारण चतुर्दशी नहीं करते वे कुंभीपाक नरक में जाते हैं।” परन्तु भक्ति तो सीधे-सीधे कहती है जो हरि को भजता है वह हरि का हो जाता है। वह कभी नहीं पछताता।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;भक्ति मिथ्याचार और चमत्कार से भयभीत रहती है। चमत्कारी स्वामियों से कोसों दूर रहती है। चमत्कार के चक्कर में स्वामी पड़ सकते हैं परंतु गोस्वामी नहीं। गोपियाँ कभी कृष्ण के चमत्कारों से अभिभूत नहीं हुईं। वे तो उसके वंशी वादन से, नर्तन से विबोर होती थीं, रास से रसमय होती थीं, उसकी सहजता पर रीझती और कुटिलता पर खीझती थीं। भगवान का भी यही हाल था, तभी तो आज भी हंसुला की सदा कगरी को कंजन की छैंया को मटकी के माखन को नहीं भूल पाये। राम हनुमान के अदभुत करतब के ऋणी नहीं बनते अपितु उनके निरभिमान भक्ति व्यवहार के ऋणी हो जाते हैं। उनके सहज स्नेह पर वे बेमोल बिक जाते हैं। जब राम हनुमान से कहते हैं कि मैं तेरा प्रतिउपकार नहीं कर सकता, तेरे ऋण का चुकारा नहीं कर सकता, तब हनुमान जी प्रशंसा की इस बड़ी आँधी में भी आन्दोलित नहीं होते और कहते हैं “प्रभु यह सब आपकी कृपा का प्रताप है, वरना इस डाली से उस डाली कूद करने वाले बंदर की औकात ही क्या है ?” इतना नहीं वै प्रभु प्रशंसा से अकुला जाते हैं। बोझ सम्हाल नहीं पाते और श्रीराम के चरण पर प्रेमाकुल होकर गिर पड़ते हैं –&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;“सुनि प्रभु वचन बिलोकि मुख, गात हरषि हनुमत।&lt;br /&gt;चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत।।” – सुंदर कांड 32&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#ffffff;"&gt;000000000000000&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#993399;"&gt;प्रस्तुतिः &lt;/span&gt;&lt;a href="http://www.srijansamman.com/"&gt;&lt;span style="color:#ffcc33;"&gt;जयप्रकाश मानस, सृजन-सम्मान&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#993399;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/33768350-115843262995132966?l=lalitnibandha1.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lalitnibandha1.blogspot.com/feeds/115843262995132966/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=33768350&amp;postID=115843262995132966' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/33768350/posts/default/115843262995132966'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/33768350/posts/default/115843262995132966'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lalitnibandha1.blogspot.com/2006/09/12.html' title='12. भोग और शक्ति'/><author><name>जयप्रकाश मानस</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-33768350.post-115843216769001443</id><published>2006-09-16T11:35:00.000-07:00</published><updated>2006-09-16T11:42:47.806-07:00</updated><title type='text'>11. अपवित्रो पवित्रो वा</title><content type='html'>&lt;a href="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/1600/bath.jpg"&gt;&lt;img style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/320/bath.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000066;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत छुटपन से इस मंत्र को सुनते और इससे जुड़े पूजन-विधान को सुनते-देखते आ रहे थे –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;ऊँ अपवित्रो पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोsपिवा।&lt;br /&gt;यः स्मरेतपुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः।।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;पिताजी नित्य पूजन प्रारंभ करने से पूर्व इस मंत्र को पढ़कर ‘विष्णु र्विष्णुर्हरि हरिः’ कहते व जल छिड़कते हुए देह, पूजन द्रव्य एवं भू शुद्धिः करते थे। आज स्वयं नित्य-पूजन अनुष्ठान करने के पूर्व उक्त श्लोक का उच्चारण करता हूँ – टेप की तरह औरशुद्धता का कर्मकाण्ड पूर्ण कर लेता हूँ – सोचविहीन क्रिया की तरह। इस क्रिया के द्वारा बाहर भीतर से कितना पवित्र हो पाता हूँ, वह तो हरि जाने, परन्तु अब जबकि सोचने की उम्र को जी रहा हूँ तब कभी-कभार बाबा तुलसी से बतियाते और भागवत के आंगन में रमते हुए लगता है कि सच में हरि का स्मरण पूजन पूर्व विधान ही नीहं, विश्वास भी है। भाव-कुभाव से सोच-असोच से जैसे तैसे प्रभु का स्मरण आत्म अभिषेक है। मल धुले वा न धुले, मंगल का आमंत्रण है –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;हरिर्हरति पापानी दुष्टचित्तैपरि स्मृतः। अनिच्छा्याsपि संस्पृष्टो दहत्येव हि पावकः।&lt;br /&gt;अज्ञानादथवा ज्ञानादुक्तमश्लोकानाम् यत्। सङकीर्तनमघं पुंसो दहेदेधोयथानलः।।&lt;br /&gt;यथागदं वीर्यतममुयुक्तं यहच्छ्या। आजानतोsप्यात्मगुणं कुर्यान्मन्त्रोsप्युदाहृतः।।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;- भाग 6-2-18-19&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;तात्पर्य स्पष्ट है। हरि का गुणानुवाद इच्छा या अनिच्छा के साथ किया जाये, वह मन के मैल को जला डालता है – जैसे आग ईंधन को। जाने अनजाने अमृत पीने पर अमरत्व तो मिलता ही है। मंत्र चाहे जाने-अनजाने में उच्चरित हो, वह निष्फल नहीं होता। राम-कृष्ण नाम तो महामंत्र है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;अतिरिक्त श्रद्धावश विशाल बुद्धि व्यासदेव ने यह बात नहीं कही है। महाभारत जैसे महानग्रंथ लिखकर जब वे आत्माराम न हो सके, अकृतार्थता उन्हें सालती रही तब वे नारद के सदपरामर्श से हरि स्मरण के ग्रंथ भागवत-रचना में रमे और कृतार्थता की प्राप्ति हुई। महाभारत की मार-काट, कुटिलता, द्वेष-दंभ, छल-कपट ने तो उनकी शांति चौपट कर दी थी। गुहा निवासी धर्म की गुत्थी सुलझाते-सुलझाते वे स्वयं अशान्त से रहे। शांति, संतोष, आनन्द, कृतकृत्यता तो उन्हें भक्ति काव्य श्रीमदभागवत से मिले। अतः भागवत व्यासदेव के अनुभूत का आख्यान है, अतिरिक्त श्रद्धा या भक्ति का भावावेश नहीं। आप भी आजमा सकते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;पवित्रता का एकमात्र स्नान है। मलापकर्षण का नाम स्नान है। मल चाहे देह का हो या मन का, वह स्नान से ही धुलता है। मंत्र स्नान, भौम स्नान, अग्नि स्नान, वायव्य स्नान, दिव्य स्नान, वारुण स्नान और मानस स्नान –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;मान्त्रं भौमं तथाग्नेयं वायव्यं दिव्यमेव च।&lt;br /&gt;वारुणं मानसं चैव सप्त स्नानान्यनुक्रमात्।।&lt;br /&gt;आपो हि षष्ठादिभिर्मान्त्रं मृदालम्भस्तु पार्थिवम्।&lt;br /&gt;आग्नेयं भस्मना स्नानं वायव्यं गोरजं स्मृतम्।।&lt;br /&gt;यत्तु सातपवर्षेण स्नानं तद् द्व्यमुच्यते।&lt;br /&gt;अवगाहो वारुणं स्यात मानसं ह्यात्मचिन्तनम्।।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;‘ऊँ अपवित्रो पवित्रो वा’ यह मानस स्नान है। आभ्यन्तर का अभिषेक है। हरि स्मरण का आग्रह है। आत्म चिंतन है। यही वास्तविक स्नान है। देह शुद्धि जन्म से हो जाती है, परन्तु आत्म-शुद्धि के लिए मानस चिंतन अनिवार्य है। माया की नगरी में चाहे जैसे भी सयाने आयें, बेदाग नहीं बच सकते। कबीर जैसे सयाने संत ही दावा करसकते हैं कि उन्होंने चदरिया ज्यों की त्यों धरदीनी। फिर भई वे माया का लोहा मानकर कहते हैं कि ‘राम चरण’ में रति होने से ही गति मिल सकती है –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;राम तेरा माया दुंद मचावे।&lt;br /&gt;गति-मति वाकी समझि परे नहिं, सुरनर मुनिहि नचावे।&lt;br /&gt;अपना चतुर और को सिप्ववै, कामिनि कनक सयानी।&lt;br /&gt;कहै कबीर सुनो हो सन्तों, राम-चरण रति मानी।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;पूजा बर बाठा रहता हूँ और मन में माया द्वन्द्व मचाती रही ती है। घरु, मिट्ठ, करु – दुनियाभर की बातें मन को नचाती रहती हैं और मन को तो नाच पसन्द ही है। पूजा के बीच में कुछ सोच बैठता हूँ। बोल पड़ता हूँ। संदीप टोक देता है – “बाबूजी ! पूजा कीजिए, बाकी बात बाद में।” झेंपता हूँ। चित्त को मोड़ता हूँ – हरि स्मरण की ओर। पुण्डरीकाक्ष का स्मरण मान स्नान जो है –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;अतिनीलघनशामं नलिनायतलोचनम्।&lt;br /&gt;स्मरामि पुण्डरीकाक्षं तेन स्नातो भवाम्यहम्।। - वामनपुराण&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;अर्थात् नीलमेघ के समान श्यामल कमल लोचन हो जाता है। हरि का स्मरण कर व्यक्ति नहा जाता है, पावन सोचू उम्र और पंडितम् मन्य प्रवृत्ति। छोटी सी बात विचार का विषय बना लेती है।पद-पदार्थ पर आगे-पीछे विचार करने लगती है। मामंसक की तरह बाल की खाल निगालने लगती है। जबकि दास कबीर ठौका बात कह गये हैं कि पंडित बनने के िलए प्रेम का ढाई आखर ही पर्याप्त है, परन्तु ‘संसकिरत भाषा पढ़ि लीन्हा, ज्ञानी लोक कहो री’ इस गुमान को गौरवान्वित करने सोचू मन उपर्युक्त मंत्र श्लोक की मीमांसा करने लगता है। मीमांसा कहती है कि शुद्ध पवित्र मन से भगवत भजन करने से फल मिलता है, फिर ‘अपवित्रो वा’ पद से ही जब काम चल सकता था, तो ‘सर्वावस्था गतोsपि वा’ पद बंध का विन्यास क्यों किया गया ? जबकि संस्कृत के वैयाकरण अर्ध मात्रा लाघव को पुत्र जन्मोत्सव जैसा आनन्द मानते हैं, तब इस बड़े पदबंधका प्रयोग आनन्द में अवरोध है कि नहीं ?&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;गहरे पैठकर देखियेतो इस छोटे श्लोक में सारे पद विन्यास सार्थक हैं, चौकस हैं, अर्थानुष्ठित हैं। हरि-स्मरण की सहज महिमा का अवबोधक ये पद साफ-साफ कहतेहैं श्याम संकिर्तन व्यक्ति चाहे बिना नहाये-धोये, मन को भिगोये बिना करें अथवा स्नान ध्यान करके वह बाहरःभीतर से पावन हो उठता है। स्मरण की महिमा ऐसी है कि वह अपवित्र को पवित्र और पापी को पावन बना देती है, स्मरणीय बना देती है। वाल्मीकि इतने डूबे हुए थे कि मुख से सही भगवान्नाम उच्चरित नहीं हो पा रहा था। ‘राम-राम’ के बदले ‘मरा-मरा’ जप रहे थे, परन्तु उल्टा नाम जप कर मभी ब्रह्म समान हो गये। द्रौपदी ने हरि का स्मरण किया। स्मरण करते ही उसका गुमान गल गया, श्याम दौड़ पड़े और वह पावन हो उठी। पवित्र होने के लिए तो स्मरण किया जाता है –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;कृष्णेति मङगलनाम यस्य वाचि प्रवर्तते। भस्मीभवन्ति सद्यस्तु महापातककोटयः।।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;यहाँ फिर मीमांसा की जा सकती है कि जो अपवित्र है वह हरि स्मरण करे – पवित्र होने के लिए। पवित्रों के लिए जरूरी तो नहीं लगती। दरअसल हरि स्मरण सबके लिए निरंतर जरूरी है। तिरगुन फाँस लिये डोलती माया निरंतर बाँधने के लिए चौकस रहती है। थोड़ा भी लोभ मोह जन्य असावधानी दिखी की वह बाँध लेती है। नारद मुनि से ज्यादा कौन पावन होगा, परन्तु वे भी माया के चक्कर में पड़ गये। नर से वानर हो गये। लोग पवित्र होकर भी पापी हो जाते हैं – पवित्र पापी। गंगा-यमुना नहाने के बाद भी मैं नहीं धुलता। कपड़ा रंगाकर भी मन नहीं रंगता राम में। माला फेरते युग बीत जाता, पर मन का फेर नहीं मिटता। नाम बेचकर साधुता की दुकान चलाते रहते हैं –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;भगति विराग ज्ञान साधन कहि, बहुविधि डहकत लोग फिरौं।&lt;br /&gt;सिव सरबस सुखधाम नाम तव, बेचि नरकप्रद उदर भरौं।। - विनय पत्रिका 141&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;इसीलिए मंत्र कहत है कि पवित्रो हो अथवा अपवित्र प्रभु का स्मरण करते रहो। बाहर-भीतर से पवित्र होते सहे। राम में रमते-रमाते रहे। किसी अवस्था, देश, काल में रहो नाम जपते रहो। पावन हो तो और पावन हो जाओगे। सुंदर हो तो और सुंदर हो जाओगे। भारद्वाज मुनि क्या कम पवित्र थे ? परन्तु आश्रम में राम के पग पड़ते ही और पवित्र हो उठे। पावनता में नहा उठे। कृतार्थ हो उठे।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;आजु सुफल तपु तीरथ त्यागू। आज सुफल जप जोग बिराजू।&lt;br /&gt;सफल सकल सुभ साधन साजू। राम तुम्हहि अवलोकत आजू।। अयोध्या कांड 107&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;भगवान ने अपने स्मरण की छूट तो यहाँ तक दी है कि व्यक्ति चलते-फिरते, उठते-बैठते, सोते-जागते देश –काल के नियम से परे होकर स्मरण कर सकता है। आश्चर्य, भय, शोक, क्षत, मरणासन्न – किसी भी दशा में ईश्वर स्मरण कल्याणकारी है –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;न देश नियमो राजन्न काल नियमस्तथा। विद्यते नात्र संदेहो विष्णोर्नामानुकीर्तने।।&lt;br /&gt;आश्चर्ये वा भये शोके क्षवेवा मम नाम यः। व्याजेन वा स्मरेत् यस्तु ययाति परमां गतिम्।।&lt;br /&gt;अपवित्रो पवित्रो वा सर्वावस्था गतोsपि वा। यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षां स बाह्यान्तरः शुचिः।।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;गोपियों ने प्रेम से, कंस न भय से, शिशुपालन जैसे राजाओं ने द्वेष से, वृष्णिवंशी यादवों ने संबंध से, पाण्डवों ने स्नेह से और नारद जैसे भक्तों ने भक्ति भाव में डूबकर भगवान का स्मरण किया और सभी प्रभु को पा गये। वैरानुबन्ध से स्मरण तो और भी तन्मय बनाकर पतित को पावन बना देता है, क्योंकि बैर तीव्रता सेदिन-रात बैरी का स्मरण दिलाता रहता है। हाँ, क्षुद्र से बैर ठानने में क्षुद्रता ही हाथ लगती है। अतः रावण-कंस जैसे महान पापियों ने महानाम परमात्मा से शत्रुता करके वे सबके शरण को पा गए। बाहर-भीतर से पवित्र हो गये –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;तस्माद् वैरानुबन्धन निर्वैरेण भयेन वा।&lt;br /&gt;स्नेहात्कामेन का युञ्जयात् कथञ्चिन्नेक्षते पृथक्।।&lt;br /&gt;गोप्यः कामाद् भयादकंसो द्वेषाच्चैद्यादयो नृपाः।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;सम्बन्धाद् वृष्णयः स्नेहात यूयं भक्तया वयं विभो।। - &lt;strong&gt;भागवत 7-1-25-30&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ffcc33;"&gt;प्रस्तुतिः &lt;/span&gt;&lt;a href="http://www.srijansamman.com/"&gt;&lt;span style="color:#993399;"&gt;जयप्रकाश मानस, सृजन-सम्मान&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/33768350-115843216769001443?l=lalitnibandha1.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lalitnibandha1.blogspot.com/feeds/115843216769001443/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=33768350&amp;postID=115843216769001443' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/33768350/posts/default/115843216769001443'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/33768350/posts/default/115843216769001443'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lalitnibandha1.blogspot.com/2006/09/11.html' title='11. अपवित्रो पवित्रो वा'/><author><name>जयप्रकाश मानस</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-33768350.post-115843171157438118</id><published>2006-09-16T11:25:00.000-07:00</published><updated>2006-09-16T11:35:11.696-07:00</updated><title type='text'>10. कृतार्थता की आकांक्षा और भागवत</title><content type='html'>&lt;a href="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/1600/images111.jpg"&gt;&lt;img style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/320/images111.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000066;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;बरुत नामी, ज्ञानी-ध्यानी, शोहरतशुदा तख्त-ताजधारी व्यक्ति सफलकहला सकता है, समृद्ध और प्रतिष्ठित हो सकता है, पर वह कृतार्थ ही हो सकता है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। सामान्य की बाद जाने दें, विशाल बुद्धि व्यास जैसे मुनि की भारत कौन कहे महाभारत जैसा अदभुत ग्रंथ रचकर – ज्ञान, दर्शन, धर्म का संदोह, वेदोपवृंहणन महान काव्य लिखाकर ही कृतार्थ नहीं हो सके। विश्वास इतना बढ़ गया कि उन्हें लगा कि जो कुछ महाभारत के घट बीत जाने के बाद उनका मन अकृतार्थता के बोध से उदास हो चला। घटनाओं के मलबे से चीत्कार की उठती प्रतिध्वनि उनकी संवेदना को सालने लगी। ध्वंसजन्य सन्नाटा अशांत करने लगा। धृतराष्ट्र, दुर्योधन, द्रौपती, अश्वत्थामा के अंधापन, घमंड, पुकार, कुंठाग्रस्त हिंसा और जीतकर हार गये युधिष्ठिर का बोध, सबसे उपजा सन्नाटा बहुत गहरे उतरकर व्यास की तटस्थता को कुरेद रहा था। धर्म-दर्शन के सारे ज्ञान, विदुर की नीति, कृष्ण-भीष्म जैसे लोगों का होना ही त्रासद यथार्थ को घटित होने से नहीं रोक पाया था। उसकी त्रासदी कदाचित व्यास के कवि हृदय को बेचैन किये बैठी थी। वे अपनी अकृतार्थता को कुछ-कुछ महसूस करते हुए कहते हैं – महाभारत के बहाने मैंने वेदों के अर्थों को खोल दिया ताकि सभी उसका लाभ ले सकें। अपने धर्म-कर्म का ज्ञान प्राप्त कर सकें। यद्यपि मैं ब्रह्मतेज से सम्पन्न एवं समर्थ हूँ तथापि मेरा हृदय अपूर्ण काम-सा जान पड़ता है –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;भारत व्यापदेशेन ह्याम्नार्थश्च दर्शितः।&lt;br /&gt;दृश्यते यत्र धर्मादि स्त्री शूद्रादिभिरप्युत।।&lt;br /&gt;तथापि वत में दैह्यों ह्यात्मा चैवात्मना विभुः।&lt;br /&gt;असम्पन्न इवाभांति ब्रह्मवर्चस्य सत्तमः।। - &lt;strong&gt;भागवत 1-4-29-3-&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;व्यास जी अकृतकाम खिन्न हो बैठे थे, तभी नारद जी वहाँ पधारे। कुशल-क्षेम और आतिथ्य ग्रहण करने के बाद कुशल वैद्य कीतरह नाड़ी टटोले बिना चेहरे को पढ़कर ही नारद ने व्यास की अकृतार्थता को पहचान ली। और मानों उनके समग्र ज्ञान की खान महाभारत पर व्यंग्य मुस्कान चस्पा करते हुए वे बोले – महाराज व्यास जी। धर्मादि सभी पुषार्थों से परिपूर्ण महाभारत रचकर आप अपने कर्म एवं चिंतन से संतुष्ट हैं न ? सनातन ब्रह्म तत्व को आपने जान ही लिया है, फिर भी आप अकृतार्थ नर के समान अपने विषय में शोक क्यों कर रहे हैं ? व्यास जी ने स्वीकृति के स्वर में कहा – नारद जी। सच में परब्रह्म और शब्दब्रह्म को जान लेने के बाद ही कहीं कोई कमी रह गई है, जिससे मेरा परितोष अधूरा है। कृपया आप ही इस अधूरेपन का कारण बतायें –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;नारद उवाच&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;पराशर्य महाभाग श्वतः कच्चिदात्मना।&lt;br /&gt;परितुष्यति शरीर आत्मा मानस एव वा।।&lt;br /&gt;जिज्ञासितं सुसम्पन्नमपि ते महदभुतम्।&lt;br /&gt;कृतवान भारतं यस्त्व सर्वार्थपरिबृहितम्।।&lt;br /&gt;जिज्ञासितमधीतं च यत्तदब्रह्म सनातनम्।&lt;br /&gt;अथापि शोचस्यात्मानमकृतार्थ इव प्रभो।।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;व्यास उवाच&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;अस्त्येव में सर्वमिदं त्वयोक्तं&lt;br /&gt;तथापि नात्मा परितुष्यते में।&lt;br /&gt;तन्मूलमव्यक्तमगाथ बोधं&lt;br /&gt;पृच्छामहे त्वssमश्वात्मभूतम्।। &lt;strong&gt;- भागवत 1-5-2,3,4,5.&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;वस्तुतः महाभारत में सब कुछ होते हुए भी वह नहीं है, जो कृतिकार औस उससे साक्षात्कार करने वाले पाठक-श्रोता को कृतार्थ कर सके। माना कि उसमें धर्म, दर्शन, इतिहास वेद की व्याख्या सब कुछ है, परन्तु वह जो प्रभाव छोड़ता है, उसमें सब कुछ दब सा जाता है और उभरकर आती है मृत्यु की त्रासदी, ध्वंस की पीड़ा, मानवी नियति की विडंबना, करुण गाथा। व्यास मुनि जिन मूल्यों को सम्प्रेषित करना चाहते थे, अपने जिन बोधों से संसार को संस्कारित करना चाहते थे, सब हो नहीं पाया, घात-प्रतिघात, दंभ-द्वेष और काल की निर्ममता की गाथा बनकर ही महाभारत रह गया। आज भी महाभारत को लोग न पढ़ना पसंद करते हैं न घर में रखना। यह अकृतार्थता का सबसे बड़ा सबूत है। जो कृति लोक स्वीकृति नहीं पा सकी वह भारत हो या महाभारत वेद हो या पुरण न खुद कृतकृत्य हो सकती है न लेखक को बना सकती है और न लोक को। लोग उसी युद्ध की गाथा सुनना पसंद करते हैं, जो गाथा श्रेय-प्रेय को बढ़ावा देती हो, भाई-भाई के द्वन्द्व और छल-छद्म की नहीं। रोजमर्रा रोज-ब-रोज उ्हें स्वाद्व स्वार्थ-संघर्ष में तो घसीटता ही रहता है। देशी संस्कृति और मानस जीवन के दुखद अंत का अभ्यासी नहीं। इन्हीं सब कारणों से महाभारत और व्यास दोनों उतने लोक स्वीकृत नहीं हो सके जितना वाल्मीकि और उनकीरामयण,तुलसी और उनके ‘मानस’ (व्यास ने यदि श्रीमद भागवत की रचना नहीं की होती तो संभवतः और अलोकप्रिय तथा अकृतार्थ रह जाते। नन्द दुलारे वाजपेयी का मनना है) “महाभारत के गीता प्रकरण में महाकवि ने आँसू पोंछने की चेष्टा न की होती तो उसका अध्ययन करने का साहस एक भी व्यक्ति न कर सकता। उसका अंतिम शांति पर्व तो विकट अशांतकारी है।” &lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;– हिन्दी साहित्य बीसवीं शताब्दी पृष्ठ 42&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;बहस की जा सकती है कि महाभारत में भी तो कृष्ण हैं ही। उनके बिना महाभारत कैसा? रामायण या मानस में राम हैं, तो महाभारत में कृष्ण, फिर व्यास को कृतार्थता क्यों नहीं मिली ? कृतार्थ होने के लिए क्या जरूरी है कि भगवान की चर्चा और अर्चा की जाए ? बहस तर्क आश्रित होती है और तर्क का कोई अन्त नहीं। नारद जी साफ-साफ व्यस जी से कहते हैं कि आपने भगवान के निर्मल यश का गान प्रायः नहीं किया है। मेरी ऐसी मान्यता है कि जिससे भगवान संतुष्ट नहीं होत, वह शास्त्र और ज्ञान अधूरा है। आपने वासुदेव की महिमा का वैसा वर्णन नहीं किया है जैसा धर्म आदि पुरुषार्थों का। जिस वाणी से श्रीकृष्ण का गुणगान नहीं होता वह कौओं के उच्छिष्ट अन्न फेंकने के स्थान जैसा अपावन होता है, वहाँ हंस नहीं जाते – &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;भवानुदितप्रायं यक्षो भगवतो मलम।&lt;br /&gt;येनैवासौ न तुष्येत मन्ये तददर्शनंखिलम्।।&lt;br /&gt;यथा धर्मादयाचार्था मुनिवर्यानुकीर्तिताः।&lt;br /&gt;न तथा वासुदेवस्य महिमा ह्युनुवर्तितः।।&lt;br /&gt;न यद्वचश्चित्र पदं इर्श्यशो जगत्पवित्रं प्रगृणीतकीर्जित।&lt;br /&gt;तदवायसं तीर्थमुशन्ति मानसा न यत्र हंसा निरमुन्त्यशिक्क्ष्याः।।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;- भाग 1-5, श्लोक 8-9-10&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;तुलसीदास बी प्रकारन्तर से इसी बात का समर्थन करते हैं – &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;किन्हें प्रकृतजन गुनगाना। सिर धरि गिरा लगी पछिताना।।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;यहाँ फिर बहस को बढ़ाई जा सकती थी कि भगवान का गुणगान ही क्या वाणी की धन्यता केलिए जरूरी है ? फिर सदियों से इतने काव्य क्यों लिखे जा रहे हैं ? फिर तो कुरान, पुराण, बाइबिल लिखे जाने के बाद शेष की जरूरत ही नही थी। ऐसी बात नहीं है। दरअसल भगवान के गुणों के बखान और यश के कीर्तन से तात्पर्य मनुष्य के ही उन मूल्यों और कर्मों का कीर्तन करना है, जो लोक-परलोक को साधने के लिए जरूरी है। सत्य, शील, सौन्दर्य और शक्ति के पर्याय का नाम भगवान है। परोपकार, दया,दान आदि धर्म के समस्त मान मूल्यों का आचरण भगवान के गुणों का गान है। मनुष्य बेहतर दशा दिशा प्रदान करने एवं उसे नर से नारायण बनाने के लिए नारायण विविध रूपों में अवतरित होते रहते हैं, वरना, क्या जरूरत है उस अनादि अनन्त अजन्मा को यहाँ अवतरित होने की। वस्तुतः प्रत्येक के भीतर बसेवासुदेव जिस शास्त्र या रचना विधान से प्रसन्न नहीं होते, वह अधूरा है। जिस कला या ज्ञान के द्वारा लोकसंग्रह यालोक मंगल की श्रीवृद्धि नहीं होती, वह कृतार्थता नहीं दे सकती। महाभारत की नियति ऐसी ही रही। युधिष्ठिर जीतकर भी हारे हुए लगते हैं और भीष्म इच्छा मृत्यु का वर पाकर भी अभिशप्त। शर शय्या पर महीनों सोते रहने के लिए शापग्रस्त/ द्रोणाचार्य का गुरुत्व ग्लानि में डूबा हुआ है। व्यास इतना महान ग्रंथ रचकर भी अकृतार्थ हैं, क्योंकि यह रचना लोगों को रच नहीं सकी। युधिष्ठिर जैसे धर्मधुरीण स्वर्ग में भी पहुँचकर दुर्योधन को सुख मनाते और अपने भाइयों को दुःख से हाय-हाय करते देख अड़ गए कि उसे भाइयों के साथ नरक में रहना पसंद है, पर यहाँ नहीं। येसब अकृतार्थता के सबूत हैं। शून्यता के प्रमाण हैं।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;तुलसी वाल्मीकि व्यास सबेस कृतार्थता के तत्व को लेकर मानस की रचना करते हैं। वे उन तत्वोंको छोड़ते चलते हैं जो जो वास्तव होकर भी लोक के मूल्वान नहीं होते/कृतार्थ करने के योग्य नहीं होते। सीता निर्वासन के प्रसंग को तुलसी पूरी तरह छाँट देते हैं, क्योंकि वह प्रसंग लोक को अब भी सालता है, करुणा को भी करुणा से भर देता है। महाभारत भाई-भाई के बीच मरणोपरान्त भी बैर को शमित नहीं करपाया। राज्य की खातिर बंधुता को नष्ट करता है, जबकि मानस यारामायण बंधुता की खातिर राज्य का त्याग करना सिखाता है। बड़ी से बड़ी कुर्बानी देना सिखाता है। भ्रातृ प्रेम को केन्द्रस्थ भाव मानता है, यही कारण है कि ’मानस’ की चौपाई मंत्र बन गई और महाभारत के श्लोक पुण्यश्लोक नहीं बन पाये। व्यास देव भी महाभारत के प्रसंगो को एकदम काट-छाँट करते हैं, अनुच्छेद परिवर्तन भागवत जैसे काव्य ग्रंथ रचनाकार को सच में कृतकृत्यता देते हैं। जहाँ प्रेम ही प्रेम हो वहाँ ईर्ष्या-द्वेष, संगर्ष, दंभ-अहंकार, लोभ-मोह जैसे अशांत करने वाले भाव कैसे टिक सकते हैं। यहाँ दया, उदारता, परोपकार, दान, धर्म, नियम-संयम जैसे दैवी गुणों का गान है – मानव को देव बनाने के लिए। प्रीति की रीति है – रमणीय में रम जाने के लिए। राधा भाव है – माधव बन जाने के लिए। भक्ति भाव है – सभी धर्मों से ऊपर, कुल कानि जाति-पांति की बड़ाई से बड़ा साझा भाव। रास है, जिसमें रास बिहारी का निवास है &lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;(रसौ वे सः)&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; जहाँ रासेश्वर स्वयं बंशी बजाते, नाचते हैं और भक्त के साथ-साथ भक्ति भी नाच उठती है। वहाँ कृतकृत्यता दूर कैसे रह सकती। ये तो ऐसे भाव हैं जो दूर खड़े को भी पास खींच लेते हैं, रमा लेते हैं, समा लेते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;भागवत में उन भावों का व्यास ने परित्याग कर दिया है, जो उन्हें महाभारत में थका चुके थे, आकुल कर चुके थे। कृष्ण जैसे को भी कपट और क्रूरता के लिए विवश होना पड़ा था। विदुर की उपेक्षा और भीष्म की अनसुनी कर दी गई थी। वे इसमें कौरवों के युद्धोन्माद और पांडवों की युद्धोन्माद में शामिल होने की विवशता के वर्णन से बचते हैं और त्रासद घटनाओं का उल्लेख भर करते हुए आगे बढ़ जाते हैं। वे महाभारत की तरह धर्म क्षेत्र कुरुक्षेत्र में लहुलुहान होती मानवता को नहीं देखना चाहते, धर्म की गुहा में मनुष्य को उलझाना नहीं चाहते हैं। वे भक्ति भाव में सबको सराबोर करना चाहते हैं। कृतकृत्य होना चाहते हैं। भागवत की शरुआत में ही वे भक्ति को परमधर्म मानते हैं और वासुदेव में सबका वास-समाहार –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे।&lt;br /&gt;अहेतुक्यप्रतिहता यया त्माssसम्प्रसीदति।।&lt;br /&gt;तस्मादेकेन मनसा भगवान सात्वतां पतिः।&lt;br /&gt;श्रोतव्यः कीर्तितव्यरच ध्येयः पूज्यश्च नित्यदा।।&lt;br /&gt;यदनुध्यसिना युक्ताः कर्मग्रन्थिनिबन्धनम्।&lt;br /&gt;छिन्दन्ति कोविदास्तस्यकोनु कुर्यात् कथारतिम्।।&lt;br /&gt;वासुदे परा वेदा वासुदेव परामखाः।&lt;br /&gt;वासुदव परा योगा वासुदेव परा क्रियाः।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;- भागवत 1-1-6,14,15,28&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;व्यथा कथा के भवजाल में फँसनेके बजाय व्यासजी की अकृतार्थता अपनी कृतार्थता के लिए वासुदेव-कथा-रति को ही अपनी गति बनाती है और भटकाव से बचने के लिए भागवत रचना के दस प्रस्थान बिन्दु निर्धारित करती है –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;अत्र सर्गो विसर्गश्च स्थानं पोषणमूतयः।&lt;br /&gt;मन्वन्तरेशानकथा निरोधो मुक्तिराश्रयः।।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;ऐसा सोचना भूल है कि व्यासदेव महाभारत कथा से आकुल-व्याकुल होकर भागवत-कथा में पलायन कर गये। पलायन तो इस देश ने कभी सीखा ही नहीं। न प्रेम जीवन के संघर्ष से पलायन है, भक्ति। भक्ति तो वह शक्ति है जो व्यक्ति को टूटने से बचाती है, बैकुंठ बनाती है, जीवन जीने में रसप्रदान करती है। भगवान कृष्ण की रणछोर उपाधि पलायन नहीं, अपितु पैंतरा बदलकर दुष्ट दलन और सज्जन रक्षण के एक उपाय का पर्याय है। सब धर्मों-प्रपंचों का पूर्णविराम है भक्ति। अतः इसी भक्ति को भागवत के केन्द्र में प्रतिष्ठित कर व्यास स्व और पर को कृतकृत्यतो छकककर परोसते हैं। राधा-माधव गोपिकाओं में डूबते-डूबते हैं। माधव यदि रसमय विग्रह हैं तो सोलह हजार गोपिकाओं की राशिभूत पीड़ा की पर्याय राधा मिठासमय प्राण रासेश्वरी –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;सोलह सहस पीर तर एकै&lt;br /&gt;राधा कहिए सोई।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;राधा रासेश्वरी की आह्लादिनी शक्ति है। महाभाव रूपा। आधा प्रकृति। नितय् लीला सहचरी। आह्लाद महाभाव से भावित प्रेम परिपूर्ण लीला का काव्य भागवत, जो विद्वानों और श्रोताओं को एक साथ आह्लादित करता है, राधा-माधव भाव से भावित करता है, सच में कृतार्थता का काव्य है। यहाँ कर्म है तो समर्पण लिये, वैराग्य है तो अनुराग लिये, वध है तो उद्धार के लिए – वध किया ही जाता है लोक उद्धार के लिए। आकुल करने वाली कथा का संदर्भ देकर लीन करने वाली कथा-लीला का गायन है। यहां कुरुक्षेत्र और द्वारका का उतना महत्व नहीं है, जितना ब्रज रेणु-धेनु गोपी-ग्वाल का है। रसराज श्रृंगार से सिक्त माधुर्य गुण से मधुमय सख्यभाव का यह काव्य किसे कृतकृत्य नहीं करता ? ज्ञान यहाँ गदगद हो जाता है। विश्वास न हो तो उद्धव जी से पूछ लीजिए, थोड़ी देर के लिए गोपी-ग्वाल बनकर देख लीजिए। बारह स्कन्धों में रचित भागवत का दशम स्कन्ध जो कृतार्थता का मूल स्रोत है, पूरे भागवत के एक तिहाई से भी ज्यादा भाग में फैला हुआ है। भागवत का सार है। जैसे तुलसी हृदयस्पर्शी प्रसंगों का, तल्लीन करने वाली लीलाओं का रम-जमकर वर्णन करते हैं वैसे ही व्यासदेव दशम स्कन्ध की लीलाओं में लीन से हो गये हैं। लीला वर्णन करते-करते लीलामय हो गये हैं।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;इस दशम स्कन्ध को रचते-रचते व्यास देव स्वयं रच गये हैं। श्रद्धालु सुनते-सुनते गदगद हो जाते हैं। इस स्कन्ध की वाणी धन्य हो जाती है। प्रकृतजन अपने ही भावों का गुणगान कृष्ण लीला गान को मानकर तृप्त हो जाते हैं। यहाँ मैं ‘हम’ में समा जाता है, स्वार्थ परमार्थ के लिए समर्पित हो जाता है। महाभारत की तरह रिक्तता, खीझ, त्रास, करुणा और धर्म का उलझाव नहीं है। द्रौपदी धर्मवृंद सभासदों से सवाल करती है कि जब मेरे पति युधिष्ठिर मुझे दांव पर चढ़ाने से पूर्व अपने को ही हार चुके थे, फिर मुझे दांव पर कैसे चढ़ा सकते थे ? और यदि एक हारे हुए जुआरी के द्वारा मैं दांव पर चढ़ा भी दी गई, तो क्या मैं दुर्योधन की दासी बन गई ? धर्म धुरंधर भीष्म ‘धर्म की गति बड़ी सूक्ष्म है’ कहकर उलझा सा जवाब देकर चुप हो गये। ज्ञानवृंद द्रोण चुप्पी साध गये। धर्मावतार युधिष्ठिर का वाक बंद हो गया और भरी सभा में – अपने ही लोगों के सामने अपनों के ही द्वारा ऐसी अपमानित होती रही, जिसका घाव आज तक हरा है, भरा नहीं है। नारी जाति आज भी द्रौपदी के अपमान से चीख पड़ती है। अनेक घटनाएँ, जिनकी याद भूल से भी आ जाती है तो मानवता काँप और कचोट उठती है, महाभारत से कृतार्थता पाने का सवाल ही नहीं उठता। विदुर जी मैत्रेय ऋषि से कहते हैं – “हे ऋषि। व्यास जी के मुख से ऊँच-नीच वर्णों के धर्म कई बार सुन चुके हैं किन्तु अब कृष्ण कथा रूपी अमृत प्रवाह को छोड़कर अन्य स्वल्प सुखदायक धर्मों से मेरा मन ऊब गया है।” – &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;परावेषां भगवन् व्रतानि श्रुतानि मे व्यसमुखादभीक्षण्।&lt;br /&gt;अतृप्नुमः क्षुल्लसुखावहानां तेषामृते कृष्णकथामृतौदात्।।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;- भागवत 3/5/10&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;विनम्रता के अनुपात से अनुप्रेरित व्यास ने प्रभु से कहा था – “हे जगत के गुरुदेव। आप अरूप हैं, फिर भी ध्यान के द्वारा मैंने महाभारत आदि ग्रंथ में आपकी बहुशः रूपकी कल्पना की है, रूप में बाँधने की कोशिश की है, आप निर्वचनीय हैं, व्याख्याओं द्वारा आपके रूप को समझ सकना संभव नहीं, फिर भी वचन बाँधने का प्रयास किया है। आप सर्वत्र व्याप्त हैं, तथापि तीर्थयात्रा विधान से आपके उस व्यापकत्व को मैंने खंडित किया है, सीमित किया है। अतः हे जगदीश। मेरी बुद्धिगत विकलता के तीन अपराध – अरूप की रूप कल्पना, अनिर्वचनीय का स्तुतिनिर्वचन और व्यापी का स्थान विशेष में निर्देश – क्षमा करें।” –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;रूपं रूपविवर्जितस्यभवतो ध्यानेन यत्कल्पितम्।&lt;br /&gt;स्तुत्या निर्वचनीयता खिलगुरोदूरीकृतायन्मया।।&lt;br /&gt;व्यापित्वं च निराकृतं भगवते यततीर्थयात्रादिना।&lt;br /&gt;क्षन्तव्यं जगदीश, तदविकलता दोष त्रयं मत्कृतम्।।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;वस्तुतः विनम्रतावश स्वीकारे गए ये दोष, दोष नहीं, गुण हैं। अरूप को रूप देकर जन-जन में रमाया गया है। जिनका ध्यान योगी भी नहीं साध पाते उन्हें ब्रज रेणु-धेनु के बीच रमाकर सर्वसुलभ बनाया गया है। तीर्थयात्रा को भगवत प्राप्ति यात्राबताकर जन-जन को जोड़ने तथा भूमा बनानेकी कोशिश की गई है। दरअसल भागवत कथा के द्वारा कृष्ण के गुण व लीलाओं का गान वाणी की धन्यता है। अक्रूरजी स्वीकारते हैं कि “जब अखिल पाप विनाशक कृष्ण मंगलमय गुण, कर्म और जन्म की लीलाओं से युक्त होकर वाणी उनका गान करती है, तब उस गान से संसार में जीवन में स्फूर्ति होने लगती है, शोभा का संचार होता है। जिस वाणी से प्रभु का कीर्तन नहीं होता वह मुर्दा वाणी है, व्यर्थ है।” –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;यस्याखलामीवहभिः सुमङगलैर्वाचेवि मिश्रा कर्मजन्माभिःय़&lt;br /&gt;प्रणन्ति शुम्भन्ति पुनन्ति पै जगद् यास्तद्विरक्ताः भव भोगना मताः।।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;भागवत 10-38-12&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;प्रस्तुतिः &lt;a href="http://www.srijansamman.com/"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;जयप्रकाश मानस, सृजन-सम्मान&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/33768350-115843171157438118?l=lalitnibandha1.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lalitnibandha1.blogspot.com/feeds/115843171157438118/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=33768350&amp;postID=115843171157438118' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/33768350/posts/default/115843171157438118'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/33768350/posts/default/115843171157438118'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lalitnibandha1.blogspot.com/2006/09/10.html' title='10. कृतार्थता की आकांक्षा और भागवत'/><author><name>जयप्रकाश मानस</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-33768350.post-115843113332364014</id><published>2006-09-16T11:19:00.000-07:00</published><updated>2006-09-16T11:25:33.500-07:00</updated><title type='text'>9. होने का अर्थ</title><content type='html'>&lt;a href="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/1600/hona.jpg"&gt;&lt;img style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/320/hona.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000066;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;‘होना’ क्रिया है। है, हूँ, हैं, था, थे, होंगे, हो सकता है, हो सकता था, हो सकेगा, हुआ होता, हो रहा है आदि-आदि होने के बहुत सारे रूपों में आदमी उदय से लेकर अस्त तक होता रहता है। अपने को अर्थवान बनाता रहता है।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;शब्दों के अर्थ होते हैं। व्यक्ति व वस्तुके भी अर्थ होते हैं। अर्थ शब्द रहित शब्द शोर है तो होनेपन के अर्थ से रहित व्यक्ति हाड़-मांस का पिंड, गोबर-गणेश, मिट्टी के माधो। मनुष्य मनुष्येतर सृष्टि से इसलिए श्रेष्ठ है कि वह मनन धर्मा है। चेतना का विशिष्ट रूप है। सच्चिदानन्द का विशेष प्रतिरूप है। व्यक्त स्वरूप है। वह निरंतर अपनी सृजनशीलता के विविध रूपों के द्वारा मनुष्येतर सृष्टि से पृथक पहचान बनाता रहता है। अपने होने की सार्थकता की तलाश क्रियाओं के द्वारा करता रहता है। सर्वांगपूर्ण की बात जाने दें, विकल अंग सूरदास गीत से, गूँगा मूर्तिगढ़ के बछरा के चित्र उकेरकर लंगड़ा वाद्य बजाकर भाँति-भाँति से परम रचनकार को और अपने आसपास को अपने होने का प्रमाण देते रहते हैं। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;‘होना’ क्रिया पद है। मतलब यह है कि व्यक्ति कर्म के द्वारा अवयक्त की महिमा को प्रकट कर सकता है. अपनी महिमा के प्रकटीकरण के सर्वोत्तम माध्यम के रूप में कदाचित अव्यक्त को ही चुना है। वह अवतरित होकर विविध लीलाओं के द्वारा अपने अवतारत्व का विशिष्ट बोध स्वयं कराता है। दसों अवतार एक जैसे नहीं होते। वह हर युग में अपनी संभवता की अलग-अलग पहचान कराते हैं और मनुष्य रूप धारण करने का अर्थ प्रतिपादित करते हैं। जितने संत और महापुरुण हुए हैं, कोई अहिंसा के, कोई करुणा के, कोई सेवा के तो कोई परोपकार के मिथ बन गए हैं। कवि कोकिल, खेलन कवि के रूप में यदि विद्यापति का काव्य व्यक्तित्व जाना जाता है तो सूर पुष्टिमार्ग के जहाज के साथ-साथ वात्सल्य एवं श्रृंगार के सूर के रूप में। कबीर अपनी पहचान कराते हुए हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में – “ऐसे थे कबीर, सिर से पैर तक मस्तमौला, स्वभाव से फक्कड़, आदत से अक्खड़ भक्त के सामने निरीह, भेषधारी के आगे प्रचंड, दिल के साफ, दिमाग के तुरुस्त, भीतर से कोमल, बाहर से कठोर, जन्म से अस्पृश्य, कर्म से वंदनीय” – कबीर पृ.167&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;जाहिर है कि अवतार सहित संत साहित्यकार, अन्य महापुरुष सभी, जो गाथा के रूप में गाये जाते हैं और मानवता की उत्कृष्ट पहचान हैं, गौरव हैं, मूल्य हैं, होने के अर्थ हैं, वे सब सीख-संकेत प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से देते रहते हैं कि मनुष्य कर्म से महान बनता है, ‘होने’ पहचान बनता है, जन्म से नहीं। रामचार भाई, थे किन्तु जो राम की पहचान बनी वह दूसरे भाईयों की नहीं बन पायी। जो कृष्ण की बनी वह बलराम की नहीं बनी। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;‘होने’ की पहचान सद् और बद दोनों तरह की होती है। बहुतों के आत्मीय, अनुकूल और सहज आकर्षण का केन्द्र बन जाना, मानवता को कृतार्थ करना सद् पहचान के लक्षण हैं। इसके विपरीत बद पहचान के लक्षण हैं। दोनों तरह के लोग मिलते हैं, अपितु दूसरी तरह के लोग गिनती में ज़्यादा हैं। कलियुग और कलयुग के दुष्प्रभाव से बदनाम लोग ज़्यादा मिलते हैं, परन्तु याद रहे गुमनाम से बदनाम अच्छा है। कम से कम बुरे के रूप में ही सही, राम के साथ रावण और कृष्ण के साथ कंस तो याद किये ही जाते हैं। सुबह-शाम यों ही खुद को तमाम करना, रोजमर्रे में अकारथ करना हीरा जनम को मिट्टी पलीद करना है। “उदर भरन कारने जनम गँवायो सारा”। बड़े भाग्य से चौरासी चक्कर लगाने के बाद यह सुर दुर्लभ मानुष जनम मिलता है। इस अमोल को माटी के मोल गँवा देना, लोक-परलोक सुधारे बिना गुर गोबर कर देना निहायत निखट्टूपन है।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;अवसर बीत जाने पर पछताते रहना बची खुची संभावनाओं को भी गारत करना है। भला इसी में है कि व्यतीत से सबक लेकर शेष को विशेष बनाएँ। न सही महापुरुण, पौरुषवान तो बने। जब तक सामान्य से हटकर अपने किये को दर्ज नहीं कराया जाता, अपनी अस्मिता से लोगों को वाकिफ नहीं कराया जाता तब तक व्यक्ति का होना न होना एक बराबर है। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि डॉक्टर नहीं बन सके तो डाकू बन जायें, समाज सुधारक नहीं रो सके तो बिगाड़क बन जाएँ। बनने या होनेका सही मतलब है कि अपनी सृजनशीलता औरस्वतंत्र चेतना का अधिकाधिक बेहतर इस्तेमाल करना। “मनुष्य की स्वतंत्र चेतना और सृजनशीलता ऐसे तत्व हैं जो उसे अन्य प्राणियों से अलग करते हैं। स्वतंत्रचेता होने का तात्पर्य ही उत्तरदायी होना – किसी बाह्य सत्ता के प्रति नहीं, बल्कि अपनी चेतना के प्रति उत्तरदायी।” &lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;– नन्दकिशोर आचार्य – संस्कृति का व्यारण, पृ.- 11&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;अपनी चेतना के प्रति उत्तरदायी होना ही नैतिक होना है, मनुष्य होना है, सृजनात्मकता को संभावनाओं की हद तक ले जाना है। उत्तरदायित्व का यह बोध अपने साथ अन्यु गुणों को भी समेटता है, जो गुण आदमी को आदमी होने में सहायक होते हैं। होने के मार्ग में अवरोध खड़ा करने वालों के विरुद्ध संघर्ण और असहमति जताने के लिये तैयार करते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;सभा सभ्यों की होती है और ससंद सद् मनुष्यों की। सभा और ससद सभ्य इसलिए कहलाती है कि वह सब के प्रति उत्तरदायी होती है, परन्तु जब वह असद् वृत्तियों से लैस लोगों का जमावड़ा बन जाती है, धृतराष्ट्र जैसे राजा और दुर्योधन जैसे सेनापति नियुक्त करती है तो नियति से ही क्रूर सत्ता द्रौपदी के चीर हरण तथा अहिल्या के शील हरण में संकोच नहीं करती। उत्तरद्यित्व के भाव से उपजी नैतिकता उसके लिए बेमतलब होती है। मतलब की होती है सत्ता। सत्ता का इस्तेमाल। कभी न तृप्त होने वाली तृष्णा का भोग। किन्तु यह भी वास्तविकता है कि कोई न कोई विकर्ण सभा में होता है जो अपने होने के साथ ही सभा के होने को भी अर्थ देने की हिम्मत करता है। भले धर्मवृंद भीष्म अपनी थोथी निष्ठावश विवश हों, पर ज्ञानवृंद द्रोण समझौतावादी बन जाएं, कर्ण बदले के कुभाव में आँख मूँद कर समर्थन कर रहे हों, नीतिवृंद विदुर धकिया दिये जाएं, किन्तु विकर्ण जैसे लोक उत्तरदायी चेतना का इज़हार किये बिना नहीं रहते। द्रौपदी के दाँव पर चढ़ाये जाने और चीरहरण मे विरोध में आवाज उठाये बिना नहीं रुकते। (महाभारतः सभापर्व, 61/21,22) भले ही नक्कारखाने में तूती की आवाज दब जाये, पर कवि की संवेदना उसे सुनती है। व्यास उसे इतिहास में दर्ज करता है। विकर्ण का होना हर सभा-समाज के लिए महत्वपूर्ण होता है। लात खाकर भी रावण की सभा में विभीषण का बने रहना, उसकी अमानवीय नीतियों का चाहे-अनचाहे समर्थन करते रहना या तो भाई-भतीजावाद का उत्कृष्ट उदाहरण हो सकता है या असभ्य सभासद होने का प्रमाण, क्योंकि सभासद होकर सभासदों के दोषों को जानते हुए भी चुप रहना, अनभिज्ञता प्रकट करना एक प्रकार का अपराध है, दोष है –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;न सभां प्रविशेत् प्राज्ञः सभ्यदोषानिनुस्मरन्।&lt;br /&gt;अब्रूवन् विब्रूवनज्ञोनरः किल्वषमश्नुते।। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;- भागवत 10-44-10&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;स्प्ष्ट है ‘चीर हरण’ के साक्षी महारथियों के बी विकर्ण का विनम्र विरोध भी बड़ा महत्वपूर्ण था और वहाँ उपस्थित होने को सार्थक सिद्ध कर रहा था। उसकी उत्तरदायी स्वतंत्र चेतना का इज़हार कर रहा था। उसे उन महारथियों से ज्यादा महत्वपूर्ण सिद्ध कर रहा था, जो उससे वय, बल, ज्ञान, धर्म, नीति में अधिक प्रतिष्ठित कहलाते रहे। विवेक को मारने या ओछा बनाने के बजाय विरोध जताना ज्यादा बेहतर है. विवेकहीन श्रद्धा जताने से श्रेयस्कर है असहमति जताना – नचिकेता की तरह। धृतराष्ट्र की संसद में रहकर उसकी अंधी नीतियों का समर्थन करते रहने से कहीं अच्छा है वहाँ से हट जाना विदुर की तरह। नीति या अनीति केपक्ष में लड़ना अनिवार्य हो तो नीति के पक्ष में लड़ना उत्तम है – युयुत्सु की तरह। भयाक्रान्त और दास बनकर जीने से सुन्दर है स्वाधीन होते तक लड़ते रहना – महात्मा गांधी की तरह। रिरियाते, घिसटते जिंदगानी और दूसरे की मेहरबानी पर जीते रहने से बेहतर है कुरुक्षेत्र में लड़ते-लड़ते वीर गति प्राप्त करना।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;जो मुझसे हुआ नहीं&lt;br /&gt;वह मेरा संसार नहीं&lt;br /&gt;कोई लाचार नहीं&lt;br /&gt;जो वह नहीं है&lt;br /&gt;वह होने को &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;– श्रीकान्त वर्मा, समाधि लेख&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;ठीक है कि वह मेरा संसार नहीं है जो मुझसे हुआ नहीं, किन्तु आदमी लाचार भी तो है अन्यों के संसार के समान होने को। जीने के लिए उसे वह भी करना पड़ता है जो वह नहीं चाहता है। वह जो नहीं होना चाहता, वह भी उसे होना पड़ता है, करना पड़ता है, बनना पड़ताहै। क्या उग्र विरोधी या उग्रवादी होने का मतलब यह नहीं है कि वे कहीं न कहीं सामाजिक, राजनीतिक व सत्ता के शोषण से उपजे हुए लोग हैं ? मंथरा की मति मारी जाने से क्या राम-सीता को वनवास की पीड़ा से नहीं गुज़रना पड़ा ? क्यातापस की तरह रहना चाहकर भीवनवास के दिन भी काटे जा सके ? रावण जय भय से आशंकित राम की मर्यादा क्या अपनी ही सीमा सेखा को नहीं लांघ जाती है ? पलायन में मुक्ति नहीं। भागने से उबारा नहीं –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;तुम लोभ मोह अहंकारा। मद क्रोध बोध रिपु मारा।।&lt;br /&gt;मैं एक, अमित बटपारा। कोउ सुनै न मोर पुकारा।।&lt;br /&gt;भागेहु नहि नाथ उबारा। रघुनायक करेहुँ सँवारा।। -&lt;strong&gt; विनय पत्रिका, पद – 125&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;ठीक है कि विनयवश तुलसी संभार के लिए रघुनाथ क पुकारते हैं, किन्तु असली बात जो वे यह कहना चाहते हैं वह यह कि व्यक्ति भागकर भी मुक्ति नहीं पा सकता। उबार के लिए दुर्निवार विषम परिस्थितियों से जूझना उसकी मजबूरी और जरूरी दोनों है। होने की यात्रा में यात्री अकेली होता है और बटमार अनेक। बटमारों के भय से यात्रा करना ही छोड़ देना नकारा बटोही साबित होना है। अतः लाचारीवश अमानुष हो सकता है, और कुछ हो सकता है तो व ‘स्व’ की तलाश तो करे। यदि सच में मनुज ब्रह्म का आंश है, तो वह अपने इस ‘है’ को कई तरह से अर्थवान बना सकता है। ‘होने’ का हमारा अर्थ विवादी नहीं, संवादी है, घटाव नहीं, जोड़ है। पाश्चात्य अस्तित्ववाद की अवधारणा की तरह नहीं, कि जहाँ अन्य को नरक समझा जाता है। नरक समझकर अन्य को रौंदा जाता है। दुसरे कि स्वतंत्रता को नकारा जाता है। उपनिवेशवाद को प्रोत्साहित किया जाता है। शोषण को उकसाया जाता है। दूसरे धर्म के मानने वाले को काफ़िर समझकर कत्ल किया जाता है। व्यक्ति को बाज़ार नहीं कुटुम्ब में तब्दील करो। जो व्यवहार अपने को प्रतिकूल लगे वैसा दूसरे के साथ आचरण मत करो (आत्मनः प्रतिकूलानिन समाचरेत) वह धर्म धर्म नहीं है जो दूसरे र्म का बाधक है – न धर्मः तत् यो बाधते धर्मम्।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;वैश्वीकरण का असली तात्पर्य ‘स्व’ को विश्व बनाना है न कि विश्व को ‘स्व’ के लिए इस्तेमाल करना है। ‘स्व’ की सीमा का इतना विस्तार करना है कि ‘अन्य’ अपना बन जाये। अन्य के ‘होने’ में अपना ‘होना’ शामिल हो जाये। प्रत्येक के होने में अपना सहकार यदि दर्ज न हो, तो विरोध तो कतई न हो। सह-अस्तित्व बना रहे। वह युग या व्यक्ति विश्व क्या बन सकता है, जो खुद का नहीं हो सकता।जो आत्मनिर्वासित होकर जी रहा हो, जो मेले में रहकर भी निपट अकेला हो, जो घर में रहकर बेघर बना रहे, जो अपने परिवार को तोड़ चुका हो, अपने वृद्ध माता-पिता को वृद्धाश्रम में भेजकर छुट्टी पा रहा हो, वह ससुरा ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’, अर्थात विश्व ही परिवार है, का अर्थ क्या जानेगा ? अपनी खोल में सिमटा आदमी दूसरे को क्या समा सकता है ? कुत्ते को गोदी में खिलाने वाले तथा माता-पिता को फटकारने वाले लोग क्या जानें स्वजन स्नेह का स्वाद ? किसी अन्य या अपनों के होने का आस्वाद। मिशनरी हिन्दुओं की आस्था को बदल नहीं सके तो उसका कारण यह नहीं था कि हिन्दुओं में ईसा मसीह के संदेश के प्रति कोई प्रतिरोध था, बल्कि उन्होंने उस संदेश को अपनी बहुलतावादी आस्था की कोटियों में ही समा लिया। - निर्मल वर्मा &lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;(पत्थर और बहता पानी, पृ. 139)&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; भारत की समोने-पिरोने वाली संस्कृति ने इस्लाम को भी समोना चाहा है। हिन्दुओं के द्वारा ताजिए पर चढ़ाये जाते चढ़ौना, मानी जाती मनौतियों और मजारों पर चढ़ाई अन्य को अपने से अलग न समझने के ही प्रमाण हैं। इस देश ने ब्रह्म को अन्य पुरुष माना है। उसे तत् से संबोधित किया है।थ वह प्रथम पुरुष है। चराचर जगत चल-अचल उसकी प्रतिमा है। ऐसा प्रमाण देने के लिए आग्रह भी है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;“जैविक स्तर पर मनुष्यत्व स्वयं प्राप्य है, लेकिन उसके बाद का मनुष्यत्व अर्जित करना होता है – इस अर्जन की सारी संभावनाएं मनुष्य में ही हैं। जिस सीमा तक कोई यह अर्जन कर पाता है वास्तविक अर्थों में उसी सीमा तक मनुष्य हो पाता है। ...अमानवीयता के खिलाफ़ संघर्ष भी मनुष्य होने की बुनियादी शर्त है। इस तरह सहमति, असहमति, विरोध संघर्ष तथा स्वतंत्र चेतना से उपजी सृजनशीलता के माध्यम से व्यक्ति अपनी संभावनाओं को उपलब्धि के रूप में अर्जित करता रहता है। यह अर्जन किसी अन्य को क्षति पहुँचाकर नहीं किया जाता। मनुष्येतर सृष्टि से अपने को श्रेष्ठ सिद्ध करने के फिराक में मनुष्येतर को हेय, हीन, जेतव्य मानकर नहीं। व्यष्टि और समष्टि के सामंजस्य में, सहवीर्य, सहकार में भी होने का अर्थ अर्जित किया जाता है। गैर-मानवीय संसार से अलगाव यूरोपीय सभ्यता का सबसे त्रासद आयाम रहा है, जिसने गोएटे को यह यह कहने के लिए विवश किया कि ‘हर अलगाव में विक्षिप्तता के बीज होते हैं : हमें ध्यान रखना चाहिए कि हम उसे पनपने न दें।” &lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;– निर्मल वर्मा (पत्थर और बहता पानी पृ. 172)&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;स्पष्ट है कि अलगाव में यदि विक्षिप्तता के बीज होते हैं तो अन्य को अन्य समझने में संघर्ष के। ऐसे संघर्ष के महाभारत को जो व्यक्ति के होने के अर्थ को कुत्सित करार देता है, कौन अच्छा कहेगा। लोग उसे घर में पुस्तक के रूप में भी रखने से कतराते हैं। भारत ने महाभारत को अच्छा नहीं समझा। वह होना था, हो गया यह और बात है, किन्तु उसकि आत्मीयता सदा अन्यको आत्मसात करने में अपनी समृद्धि मानती रही है. यह देश बाहर से आए जातियों अपना बना कर याय उनके होकर वृहत्तर भारतवर्ष के गौरव से अपने को मंडित करता रहा है। बिना किसी के भूभाग को राजनैतिक उपनिवेश बनाते हुए, अपने भूमा स्वरूप का परिचय देता रहा है। जिन बाहरी जातियों ने अपनी सीमित सोच एवं धर्मान्धता के कारण अन्य को काफ़िर या नरक समझकर रौंदना चाहा उसके साथ अब तक भारत की अस्मिता अपना तालमेल बिठा नहीं पाई है। बिठाये भी कैसे ? अपने ‘स्व’ को विसर्जित करके परधर्म को अपनाने से मर जाना बेहतर जो माना गया है – स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;- गीता।&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;‘होने का अर्थ’ बहुअर्थी है – छंद की तरह। बहुरूपी है – सृष्टि की तरह। अव्याख्येय है – भूमा की तरह। व्यक्ति भूत, भवन और भविष्य में होता रहता है, क्योंकि वह धरती से आकाश तक व्याप्त विष्णु का सगुण स्वरूप है। हमारे तीनों कालों में वही तो होता रहता है। इसी से भाव हमें होते रहना चाहिए – उस पुराण पुरुष सहस्र शीर्ष प्रभु को प्रणाम करते हुए –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;भुत भव्यभवन्नाथः पवनः पावनोsनलः।&lt;br /&gt;कामहा कामकृत् कान्तः कामः कामप्रदः प्रभुः।। &lt;strong&gt;- विष्णुसहस्रनाम&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;प्रस्तुतिः &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;a href="http://www.srijansamman.com/"&gt;&lt;span style="color:#00cccc;"&gt;जयप्रकाश मानस, सृजन-सम्मान&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/33768350-115843113332364014?l=lalitnibandha1.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lalitnibandha1.blogspot.com/feeds/115843113332364014/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=33768350&amp;postID=115843113332364014' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/33768350/posts/default/115843113332364014'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/33768350/posts/default/115843113332364014'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lalitnibandha1.blogspot.com/2006/09/9.html' title='9. होने का अर्थ'/><author><name>जयप्रकाश मानस</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-33768350.post-115843074579446772</id><published>2006-09-16T11:12:00.000-07:00</published><updated>2006-09-16T11:19:05.896-07:00</updated><title type='text'>8. लिखने का मतलब</title><content type='html'>&lt;a href="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/1600/writer.jpg"&gt;&lt;img style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/320/writer.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;थाली परोसी रखी रहती है। भोग लगाने के लिए गोपाल जो बाट ताकते रहते हैं। मेरी ही भूखसे तिल मिलाती संगिनी भगवान को भोग अर्पण करने के लिए आग्रह-अनुरोध, रीझ-खीझ प्रकट करती रहती है। ‘अन्नपूर्णा का अनादर अच्छा नहीं होता न भगवान को को प्रतीक्षा करना’ संस्कार का यह अबोलबोल सुनकर भी मेरा लिखवाड़ लेखक इस कदर लीन रहता है कि कोई अपूर्व छूट न जाये, बाँह छुड़ा के चल न दे। बाँह की पीड़ा ‘हनुमान बाहुक’ पाठ के लिए प्रेरित करती रहती है। पेट की गैस, पीठ की पीड़ा व गर्दन की दुर्गति घड़ी-घड़ी अच्छी हलाकान करती है। बुढ़ापा सिर पर सवार होकर बार-बार तरह-तरह से चेताता रहता है। मिलने वाले मुझसे और में उनसे बतरस के लिए ललचता रहता हूँ – फिर बी तल्लीनता ऐसी कि गोपी रास रस हो कि वाल्मीकि रामायण रच रहे हों। तीर मार रहे हों। इतनी तन्मयता यदि तत्सत में होती तो सच मानिये जिन्दगी तर जाती, तीर्थ बन जाती है। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;इस तन्मयता से परेशान होकर कभी-कभी परेशान होकर कभी-कभई एकान्त और शान्त क्षणों में श्रीकान्त वर्मा की इस पंक्ति को गुनता रहता हूँ कि सच में “लिखने का मतलब है नरक से गुजरना ?” क्या वाकई लेखन कर्म नरक का अगाऊ भोग है ? यदि है, तो लेखक जीते जी क्यों जान बूझकर जहन्नुम से रू-ब-रू होना चाहता है ? जैसे कुछ खाँटी लोग जीते जी अपना श्राद्ध कर लेते हैं, इस अंदेशे से कि जाने नालायक औलाद मरने के बाद क्रिया कर्म करे या नहीं, वैसे ही किस अंदेशे से यह लेखक नाम का प्राणी नरक का अगाऊ अनुभव करना चाहता है ? अपने कौन से पाप का प्रायश्चित करना चाहता है ? एक कवि ने अर्ज करते हुए निवेदन किया था कि “हे ब्रह्मदेव ! मेरे पापों के बदले में जो भी दुष्फल देंगे उसे मैं सह लूँगा, किन्तु खूसट आदमी को कविता सुनाने का दंड मत देना।” –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;इतर पाप फलानि यथेच्छया&lt;br /&gt;वितरतानि सहे चतुरानन।&lt;br /&gt;अरसिकेषु कवित्व निवेदनं&lt;br /&gt;शिररसि मा लिख मा लिख।।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;न जाने केखक कौन से लिखकर अर्ज-फर्ज को पूरा करना चाहता है ? वह कौन सी मजबूरी की गुलामी करने के लिए लाचार है ? ज्यादातर मजबूर करने वाली व्यवस्था भी नहीं चाहती कि कोई लिखे-बोले और बैठे-ठाले मुझसे बैर मोल ले। कोई लिखना-बोलना ही चाहता है तो वह मेरे पक्ष में लिखे-बोले, अन्यथा सिर कलम करने का फतवा जारी कर दिया जायेगा।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;इस तथ्य से वाकई इनकार नहीं किया जा सकताकि लेखन कर्म शिद्दत से उठाने का कर्म है। माथा-पच्ची का काम है। अपने आपको हलाकान करा है। उस शैतान से मुठभेड़ करना है, जो अव्यवस्था, अन्याय, असंगति, अत्याचार, अनास्था आदि की शक्ल में जहाँ-तहाँ मौजू होता है। लेखक की जिंदगी निजी होकर भी सार्वजनिक होती है – उन नेताओं की तरह नहीं, जिनका निजी जीवन ही प्रमुख होता है, सार्वजनिक दिखाउ होता है। तभी तो गैर क्रौंच वध की पीड़ा से उपजी करुणा ने मुनि को इतना उद्विग्न किया है कि उनका मौन मुखर हो उठा – इस आर्या छंद में –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;माम निषाद प्रतिष्ठां त्वगमगमः शाश्वती समा।&lt;br /&gt;यदक्रौ़ञ्च्य मिथुनादमेकवधीः काममोहितम्।।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;एक क्रौंच की पीड़ा इतनी भारी थी कि रामायण जैसा महाकाव्य लिखना पड़ा, किन्तु लाखों क्रौंच की कराह से रोज-ब-रोज कातर होते कवि कैसे मौन रह सकता है ? हृदय हिला देने वाली घटनाओं का घर उसकी संवेदना कैसे चुप लगा सकती है ? गूँगेपन के अभिशाप से मुक्ति के लिए ही उसे वाणी का वरदान मिला है। तमस को ठेलठालकर निकाल बाहर करने के लिए उसे वाक का प्रकाश मिला है –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;बाचो प्रसादेन लोक यात्रा प्रवर्तते।&lt;br /&gt;इद्मन्धतमः कृत्स्नं जायेत भुवनत्रयम्।&lt;br /&gt;यदि शब्दाहवयं ज्योतिरासंसारान्न दीप्यते।। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;- काव्यादर्श दण्डी 1/3-4&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकाश को वह अपने भीतर कैसे कैद करके रख सकता है। उसे जूझना ही होता है – अंधकार से। उसे चोखिम उठाकर बोलना ही पड़ता है – सबकी ओर से। उसे सहना बी पड़ता है सबके दुख को – राम की तरह (रामं तु सर्व सहे)&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;लेखक ‘इदं न ममं’ के भाव में जीता है। सबका होकर रहता है। उसके समूचे ीवन का साधरणीकरण-सा हो जाता है। संभवतः इस अर्थ में भी ऋषियों के द्वारा साक्षात्कृत वेद मंत्रों को अपौरुषेय कहा गया हो। अपौरुषेय इस अर्थ में भी कि वह अपने अहं को सर्वम् में, पुरुषार्थ को परमार्थ में विलय कर देता है। अपने को फटक-बीतकर, कूट-पीसकर, राँधकर, सिझाकर तथा परोसकर सबके के लिए आस्वाद्य बनाता रहता है। वहसंसार में होते अनाप-शनाप व्यवहार तथा अमानवीय घटनाओं को खटित होते देख-सुनकर चुप नहीं रह सकता – भीष्ण पितामह की तरह, तटस्थ नहीं रह सकता। ऐसी तटस्थता भी किस काम की जो अन्याय के सामने चुप लगा जाये और व्यक्ति को नपुंसक तथा अपराधी करार दे। शरशय्या पर महीनों लिटाये रखे।&lt;br /&gt;लिखने का अर्थ है अपराधी किस्म की तटस्थता के दोष से बचते हुए प्रतिपक्ष में खड़ा किसी भी किस्म के खतरे उठाकर लिखने का अभिप्राय तुलसी की तरह गाथा गाकर चुप नहीं रह जाना, अपितु उस पराधीनता के विरुद्ध आजादी का आव्हान करना, जो सपने के सुख से भी आदमी को वंचित करती है। रावण को रथ पर सवार देख और राम को विरथ देख तुलसी का विभीषण मन कैसे चुप रह सकता। वह लिखेगा ही। दरिद्रता के कारण रावण ने जहाँ संसार को दबोच रखा हो (दारिद दसानन दबाईदुनी दीनबन्धु दुरित दहन देखि तुलसी हहा करी) वहाँ तुलसी मौन कैसे रह सकते ? हाहाकर कर उठते हैं। गाल बजाऊ पंडित, ढोंग बढ़ाने वाले साधुओं, जाति, सम्प्रदाय, राजनीति-अर्थ-सबकी दुश्चिंता तुलसी को सताती है और सुबह शाम रघुनाथ गाथा गाने के बाद भी उसे लिखने के लिए बाध्य करती है।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;लिखने का मतलब ही स्वान्त सुख के साथ वृहत्तर सुख की कामना। जगमंगलके भाव से आप्लावित होकर साधना-यातना की नदी में अपने को बहाने के िलए उतारना। सबकी पीड़ा को गाना –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;भनिति भदेश वस्तु भलि बरनी।&lt;br /&gt;राम कथा जगमंगल करनी।। &lt;strong&gt;- दोहा 10&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;कबीर तो घर फूँक कर हिन्दू-मुसलमान सबकी दुत्कार सहते हुए सबद, रमैनी, दोहे में रमें रहते हैं। गाथा या गीत नाद ब्रह्म की आराधना है तो रचना अक्षर ब्रह्म की। गाथा ध्ववि तो श्रुति पक्ष से चलकर नाद ब्रह्म में समा जाती है, किन्तु अमिट आखर में लिखी रचना प्रामाणिक दस्तावेज की तरह सनद रहतीहै। बार-बार व्यष्टि-समष्टि के सामने विपत्ति, विकृति, विडम्बना, विसंगति के छाये अंधकार के बीच रोशनी बिखरेती रहती है – रवि रेखा की तरह। वह जग जीवन में रह-रह उठने वाले रावण जय भय के विरुद्ध उठ खड़े होने के लिए उकसाती है –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;स्थिर राघवेन्द्र को हिला रहा फिर फिर संशय।&lt;br /&gt;रह-रह उठता जग जीवन में रावण जय भय।। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;- राम की शक्ति पूजा&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;बात साफ है कि रह-रह उठने वाले संशयों और आकुल करने वाले बहुत सारे प्रश्नों से लेखक हमेशा घिरा रहता है। वे सब मिलकर उसे सताते रहते हैं. सती का संशय, निराला के राम का संशय,रावण जय-भय, द्रौपदी के दांव पर चढ़ाने और युधिष्ठिर के अर्ध सत्य, कृष्ण के दाँव-पेंच सभी से उठे प्रश्व व्यक्ति को अलग-अलग सालते हैं, परन्तु व्यास को सब मिलकर सालते हैं। अतः व्यास होना ही नरक जैसी यातना से गुजरना है। जब “आजमी के लिए सैकड़ों जिन्दा विचार भाष्य बनने के लिए व्याकुल हैं” – धूमिल, तो व्यास की जान साँसत में होगी ही। इसलिए व्यास महाभारत जैसे विशाल ग्रंथ लिख लेने के बाद भी प्रसन्न नहीं थे, अकृतार्थ थे। भीतर ही भीतर कुछ साल रहा था। भला हो नारद मुनि का जिन्होंने उन्हें भागवत रचना की सलाह दी और वे उसे रचकर कृतार्थ हुए। (देखें लेख – अकृतार्थता के बोध से उपजा भागवत)&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;रचने का मतलब अर्ज-फर्ज की माँग की पूर्ति भी है। भीतरी अर्ज रचनाकार को बेशुमार परेशान करती है। जागते-सोते बेचैन किये रहती है। वह नहीं जानता कि क्यों लिख रहा है, किस देव के लिए वह जीवनाहुति दे रहा है, वह हविष्य स्वीकार करेगा भी कि नहीं, वह यह भी जानते हुए लिख रहा है कि घर के लोग भी उसे नहीं पढ़ते, पाठक का अकाल है। वसंत को खारिज कर दिया पेशेवर गुलाहों की हँसी ने, फिर भी वह बहारों का गीत गाये जा रही संवेदन क्षुधा की तृप्ति के लिये। कभी-कभी कवि की यह प्रवृत्ति लोगों को सनक-सी लगती है। बेमतलब का काम। मित्र राधाकृष्ण झा वाइलिन की लकड़ियों को छील-छालकर जतने से शक्ल दे रहे थे, उसके तरबदार तारों को कस रहे थे ताकि वह मन कि तड़प को तरब-तराना दे सके। इसी समय नौकरी के पैरवी के लिए दो सज्जन उनके दर पर पहुँचे। पैरवी की बात सुन चलाने से पूर्व एक ने कहा – “झा साहब पहुँचे हुए संगीतकार हैं।” दूसरा बोला – “हाँ भाई ! उनके कार्यों से तो ऐसा हीलगता है। सुना है संगीतकार व साहित्यकार पागल होते हैं।” यद्यपि यह टिप्पणी नवनीत लेपन की दृष्टि से की गई थी, किन्तु वह सच से बहुत दूर भी नहीं थी। ठाकुर जगमोहन सिंह की रचना ‘श्यामा स्वप्न’ पर वक्यव्य देते हुए डॉ. नामवर सिंह (रायपुर प्रवास में) बोल रहे थे – “न जाने किस-किस तरह के स्वप्न और सच लेखक को पागलपन के स्तर तक उद्वेलित करते रहते हैं। इस तरह के उद्वेलन से उद्वेलित होकर अंग्रेजीकवि बायरन अपने ही देश-सरकार के विरुद्ध ग्रीक की ओर से युद्ध में शरीक हो गया था – शहीद होने के लिए।”&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;लेखक विक्रम की तरह बेताल को कंधे में लादे सवालों के जवाब तलाशते फिरता है। होरी की गोदान की अधूरी आकांक्षा से आकुल ही तो रहता है। अंधेरे में चल रही स्याह साजिश को देखकर वह अपनी दुर्निवार आत्मसंभव अभिव्यक्ति को रोक नहीं पाता। चाहे दुनिया उसेपागल समझे या प्रजापति (अपारे काव्य संसारे कविरेक प्रजापतिः) अंधेरा मिटे या न मिटे। वैसे अहंकार की तरह अंधेरा पूरी तरह मिटना नहीं जानता। रोज सुबह-शाम बरी खबरें बाँटेते अखबार, आदमी को माल में तब्दील करते विश्व बाजार, अधों से राजित राजदरबार भ्रष्टाचार से भूषित लोकतंत्री सिंहासन, स्वधीनता को बेमानी बनाती व्यवस्था, नीति पर बहस करती और दुर्निति पर चलती राजनीति, दोहरा लगता हर चेहरा – तमाम बातों की गिरफ्त से बेचारा लेखक तब तक मुक्त नहीं हो पाता जब तक वह लिखकर खारिज नहीं हो जाता – बरस चुके बादल की तरह। जब तक वह साँचे आखर बल के सहारे अपना पक्ष प्रस्तुत नहीं कर लेता, सहानुभूति जता नहीं लेता, फर्ज अदा नहीं कर लेता तब तक तमाम बातें उसके भीतर टीसती रहती है – बिन बरसे बादल के भीतर बिजली की तरह।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;एक कवि का कहना है कि कवि के चुप हो जाने से समूचा मुल्क एक शव में तब्दील हो जाता है। इस कथन का आशय स्पष्ट है कि बोलना और लिखना समान व मुल्क को जीवित रखने के लिए अनिवार्य है, चाहे लेखक को नरक से होकर गुजरना पड़े या स्वर्ग के पास से। अकृतार्थता मिले या कृतार्थता व्यास को लिखना ही पड़ेगा। गुरु पुर्णिमा को वह पूजा जायेयह उसका अहोभाग्य है, नियति नहीं। किन्तु लिखने का अभिप्राय केवल यह नहीं है कि वेदना करुणा, नियति की क्रूरता के ही गीत गाते रहे।सूर होकर घिघियाते रहे। यह संसार सब रंगों और रसों का समाहार है। यहाँ शैतान हैं तो इन्सान भी रहते हैं। संत बी हैं, असंत भी। अनास्था है तो आस्था भी। पतझर हैं तो बहार भी। कर्म, अकर्म, विकर्म, पाप-पुण्य – सब कुछ तो है। यह लेखक पर निर्भर करता है कि वह क्या चुनना चाहता है। अंधकार से गुजर कर किस स्वर्णिम प्रभात को धरा पर उतारना चाहता है।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;दिन प्रतिदिन छिनते जा रहे आपसी संवाद, बतरस का सुख, टूटती जा रही शब्द-अर्थ की अभिन्नता, गूँगी होती जा रही स्वाधीनता, बढ़ता जा रहा तकनीकि का हस्तक्षेप, छिनती जा रही भाषा, झीनती जा रही मनुष्यता, भय, आतंक, आशंका – सब मिलकर साहित्य को सब कुछ बर्दाश्त करते रहने और शब्द साधना में लीन रखते हैं –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;साधो शब्द साधना कीजै।&lt;br /&gt;जे ही शब्दते प्रगट भए सब, सोई शब्द गहि लीजै।।&lt;br /&gt;शब्द गुरु शब्द, सुन सिख गये, शब्द सो बिरला बूजै।।&lt;br /&gt;सोई शिष्य सोई कुहु महातम, जेहि अंतर गति सूझै।।&lt;br /&gt;शब्दै वेद पुरान कहत है शब्दै सब ठहरावै।&lt;br /&gt;शब्दै सुख-मुनि-संत कहत हैं, शब्द भेद नहि पावै।&lt;br /&gt;शब्दै सुन-सुन भेष धरत हैं, शब्दै कहै अनुरागी।&lt;br /&gt;षट दर्शन सब शब्द कहत है, शब्द कहे वैरागी।&lt;br /&gt;शब्दै काया जग उतपानी, शब्दै केरि पसारा।&lt;br /&gt;कहै कबीर जहँ शब्द होत है, भवन भेद न्यारा।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;यह भी कहा जा सकता है कि जब वालमीकि जैसे मुनि ने रामायण की रचना कर डाली और महाभारत जैसे सब कुछ को समेटने वाला आकार ग्रंथ लिखा जा चुका है,फिर और कुछ लिखने का क्या प्रयोजन है ? क्यों नरक से गुजरने का प्रयास करना ? हकीकत तो यह है कि न आज के लोग रामायण-महाभारत काल जैसे मानसिकता वाले हैं और न त्रेता द्वापर युग जैसा युग है। आज के लोग औस समय आज के जैसे हैं, ठीक है कि इन आकार ग्रंथों में बहुत सारे मूल्य ऐसे हैं, जो आज भी आचरणीय हैं। चरित वंदनीय हैं। विचार चिंतनीय हैं, परन्तु आज जबकि सारे स्थापित खारिज किये जा रहे हैं, विचार मरते जा रहे हैं, ईश्वर की मृत्यु की घोषणा कर दी गई, ‘अन्य को नरक’ मानकर अपने अस्तित्व की रक्षा जैसे-वैसे करते रहना ध्येय बन गया हो, संतों को भी वर्गों में बाँटकर देखा जा रहा हो, अपने को बंदे और शेष को काफिर समझआ जा राह हो तब जरूरी हो जाता है लिखना। तब जरूरी हो जाती है ‘मानस’ की रचना। आवश्यक हो जाती है वेद की व्याख्या, पुराणों का पुरनाख्यान और व्यास का भास्य। रामायण की पहुत सारी घटनाओं और विचारों से तुलसी सहमत नहीं थे। उनका युग उनसे सहमत नहीं होता यदि वे उन्हीं बातों को संस्कृत में दुहरा देते, इसलिए उन्हें सोच-समझकर स्व मानस मथक अवधी में ‘मानस’ की रचना करनी पड़ी। व्यास भी कहते हैं कि इतिहस पुराण लिखकर वेद के रहस्यों को खोला जाना चाहिये, विस्तार किया जाना चाहिए। हर युग के व्यास को अपने युग की देखी और अतीत-अद्यतन की लेखी पर दिव्य दृष्टि डालकर लिखना ही होगा। लिखना होगा उनके पक्ष में जो तुलसी को एक वर्ग विशेष के कवि और कबीर को पंथ विशेष के कवि और संत मानकर उनके हाय से वंचित किये जा रहे हैं।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;“महाकाय धर्मात्मा&lt;br /&gt;देखता हूँ मैं तुम्हारे अनुयायी&lt;br /&gt;तुम्हें दगा दे चुके हैं&lt;br /&gt;बदला नहीं अगर कोई ते वे हैं तुम्हारे शत्रु”&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;एन्त्सेन्सबगर के द्वारा मार्क्स को संबोधित करते हुए लिखी गई इन पंक्तियों के द्वारा गांधी कोबीआज संबोधित नहीं किया जा सकता ? &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;स्पष्ट है कि बदलते समयऔर परिवेश, प्रासंगिकता, लोगों की गतानुगतिकता और लोग संग्रह निरंतर लेखन और पुनि-पुनि चिंतन की माँग करते रहते हैं, और माँग की मुराद पूरी करने के लिए लेखक लिखता रहता है। सबका मुजरा लेता रहता है। चाहे लिखने का मतलब कुछ भी हो।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt; &lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;&lt;span style="color:#993399;"&gt;प्रस्तुतिः&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;a href="http://www.srijansamman.com/"&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;जयप्रकाश मानस, सृजन-सम्मान&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/33768350-115843074579446772?l=lalitnibandha1.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lalitnibandha1.blogspot.com/feeds/115843074579446772/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=33768350&amp;postID=115843074579446772' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/33768350/posts/default/115843074579446772'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/33768350/posts/default/115843074579446772'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lalitnibandha1.blogspot.com/2006/09/8.html' title='8. लिखने का मतलब'/><author><name>जयप्रकाश मानस</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-33768350.post-115843033178468168</id><published>2006-09-16T11:06:00.000-07:00</published><updated>2006-09-16T11:12:11.910-07:00</updated><title type='text'>7. तीरथराज प्रयाग में कुंभ</title><content type='html'>&lt;a href="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/1600/holy.jpg"&gt;&lt;img style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/320/holy.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;तीर्थ तारण धर्मा होते हैं। जो तार दे वही तीर्थ, अथवा जहाँ पहुँचकर मनुष्य तर जाये उसे तीर्थ कहते हैं – ‘तारयति यत् तत्तीर्थम् वा तरति अनेन यत् तत्तीर्थम्’। उसमें भी तीरथराज प्रयाग का तो कहना ही क्या है ! तीन-तीन पावनतम नदियों का संगम। देव नदी गंगा-स्वर्ग से पृथ्वी तक व्यास सब ताप नसावन सुरसरिता,कृष्णप्रिया लीला सहचरी यमुना और पृथ्वी-उर अन्तर वाहिनी सरस्वती की राशिभूत पावनता में अवगाहन कर कौन अपावन रह सकता है ? भगवान श्रीराम के चरणरज सेपुनीत प्रयागराज किसको पुनीत नहीं बना देता ? जंगतीर्थरूप ऋषि-मुनियों व संतों का यह तीर्थ किसे तीर्थ नहीं बना देता ? ऋषि-मुनिसंत समागम से तीर्थ भी तीर्थ बन जाते हैं ‘तीर्थो कुर्वन्ति तीर्थानि’।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;br /&gt;बारह-बरह साल के अन्तराल से आने वाला कुंभ पर्व फिर आ रहा है – आस्था, विश्वास, उत्साह, पवित्रता और अमृत कुंभ लेकर। विश्व में बेजोड़ अमृत महोस्तव। श्रद्धा-विश्वास का महाभाव। पौराणिक गाथा का सामगान। पुण्य लूट का आह्वान। बिना किसी विज्ञापन के लाखों लोग मकर संक्रांति 14 जनवरी 2001 को प्रथम सुधा स्नान के लिए जुड़ रहे हैं। पृथ्वी के कोने-कोने से पावन होने पहुँच रहे हैं। आकाश मार्ग से देवगण ईभ आ रहे हैं अपनी उस स्मृति में स्नान करने, जो लाखों वर्ष पहले घटित अमृत मंधन की घटना की साक्षी रही है। वैसे भी मकर संक्रांति विशेष संक्रांति है। उत्तरायण होते भास्कर काल। पुण्योदय की घड़ी। हन वर्ष इसी घड़ी में मानव, देव-दानव सभी प्रयागराज के त्रिवेणी में डुपबकी लगाने व त्रिविध ताप नशाने आते हैं –&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color:#330099;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;माघ मकरगतरवि जब होई। तीरथपतिहिं आब सब कोई।।&lt;br /&gt;देव दनुज किन्नर नर श्रेणी। सादर मज्जहिं सकल त्रिवेणी।।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;परन्तु अमृत महोत्सव में आना अलग मायने रखता है। आधुनिकता को अंधविश्वास लग सकता है, पर प्रगतिशीलता को पोंगापंथी का इजहार लग सकता है, और को और कुच लग सकता है, परन्तु यहाँ आने वाले लोग निष्प्रयोजन नहीं आते। वे आते हैं अपने छीजते विश्वास को बढ़ाने, दुनियावी एकरसता से निजात पाने, आस्था के रिक्त होते घर को भर लेने, जुड़ने-जोड़ने और बहुत कुछ पा लेने के लिए आते हैं –&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;अकथ अलौकिक तीरथ राऊ।&lt;br /&gt;देई सवा फल प्रगट प्रभाऊ।।&lt;br /&gt;सुनि समुझहिं जन मुदित मन मज्जहिं अति अनुराग।&lt;br /&gt;ललहिं चारिफल अछततनु साधु समाज प्रयाग।।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;वस्तुतः साधु समाज-जंगमतीर्थों से तीर्थीभूत प्रयाग चारों फलप्रदान करने वाला है। ऐसा कहते हुए लोगों को लग सकता है कि यह तो अन्धश्रद्धा है। यह कुंभ का मेला आस्था का नहीं, अंधश्रद्धा का जमावड़ा है। पौराणिकता का प्रपंच है। रुढ़िवादिता का भेड़ियाधसान आयोजन है। समय और श्रम का तथा निजी और देश के धन का अपव्यय है। और भी बहुत कुछ लग सकता है। आस्थाविहीन मशीन बने इस युग को कुछ भी लग सकता है, क्योंकि सृष्टि को देखने की दृष्टि अपनी-अपनी होती है।दृष्टि भेद से एक ही मूरत अलग-अलग सूरत में दिखाई पड़ती है। कुब्जा के लिए कृष्ण मोहन हैं तो कंस के लिए काल। विभीषण के लिए राम छविधाम हैं तो रावण के लिए आँख की किरकिरी।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;जाकी रही भावना जैसी। प्रभु मूरति देखी तिन तैसी।।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;तथ्यतः आस्था के व्यापक स्वरूप को समझे बिना और श्रद्धा में भींगे बिना अनात्म होकर कुंभ-पर्व के सुधा स्नान को नहीं समझा जा सकता। भाव के बिना हर मूर्ति पत्थर होती है। जनक जन्म के हेतु मात्र होता हैं। देश इतिहास-भूगोल से ज्यादा कुछ नहीं होता। यह पृथ्वी मेरी माँ है और मैं उसका पुत्र, यह भाव उठता ही नहीं और राष्ट्रीयता दम तोड़ देती है। आप भाव धारे संगम के किनारे पहुँचकरक देखिये तो, आपकी अनास्था आस्था में, नास्तिकता आस्तिकता में औरआधुनिकता आध्यात्मिकता में बदल जायेंगी। विशावस बढ़ जायेगा। श्रद्धा में नहा उठेंगे। यहाँ पहुँचकर यह मेला अंधश्रद्धा का इजहार नहीं लगेगा। जड़ सृष्टि के साथ चेतन सृष्टि का जड़ाव लगेगा। उस महाभाव की अभिव्यक्ति लगेगा जिसमें डूबकर जड़-चेतन एक दूसरे के आत्मीय और मीत बन जाते हैं। भारतीय आस्था प्रकृति पर विजय की अभिलाषी नहीं, उसकी अनुरागी तथा आत्मीया रही है। कालिदास की शकुन्तला पौधों को पानी दिये बिना अन्न ग्रहण नहीं करती है। अकारण उसके फूलों-पत्तियों तक को नहीं तोड़ती। तभी तो जब वह पतिगृह जाने के लिए विदा लेती है तो ऋषि कण्व तो रोते ही हैं पादप भी रो उठते हैं। मृगी के मुख में तृण धरे के धरे रह जाते हैं। मोर नाचना बंद कर देता है। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;उद् मलित दर्ग कवला मृग्यः परित्क्तनर्तना मयूराः।&lt;br /&gt;अपसृत्पाण्डुपत्रा मुञ्चयन्त्यश्रूणीव लताः।।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;strong&gt;- शकुन्तला – 4 अंक&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;यह है आस्था जुड़ी आत्मीयता की अभिव्यक्ति। मनुष्येतर सृष्टि के साथ मनुष्यता की अनुभूति। आधुनिक मनुष्य यह तो सतत याद रखता है कि वह सृष्टि का श्रेष्ठतम जीव है,परन्तु यह भूल जाता है कि उसकी श्रेष्ठता के लिए सृष्टि के अन्य जड़ चेतन कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। वह श्रेष्ठतर है तो प्रकृति के अन्य रूप कमतर नहीं। उन पर विजय, उनकी उपेक्षा, उनके साथ गलत सलूक अन्ततः आत्मघात है। जब, वायु, आकाश, भूमिगत सारे प्रदूषण इसी आत्मघाती कुकृत्य के परिणाम हैं। आस्थाहीन सोच के दुष्फल हैं। इन्हीं सब दुष्फलों-दुष्कर्मों से मानव जाति को बचाते रहने के लिए ये कुंभ जैसे पर्व आते हैं। तीर्थ स्नान के पीछे जुड़ी धार्मिकता का आशय प्रकृति के साथ मनुष्य के सहभाव-स्नेह का आशय है। नदी हमारी संस्कृति में मातृस्वरूपा है। वह सच में माता है। नदी घाटी सभ्यता को जन्म देने वाली, दूध जैसा जल पिलाने वाली, अमृत पिलाकर अमर कर देने वाली गंगे त्वद्दर्शनान्मुक्तिः, जिस गंगा नदी के दरस, परस, मज्जन और जलपान से आदमी तीर्थ हो जाता है, तर जाता है, तर हो जाता है, उसमें नहाना अंधश्रद्धा का प्रतीक है, ऐसी सोच मूढ़ता है। कुसोच है। जड़ता है। रामकृष्ण परमहंस कहते हैं – नदियाँ बहती हैं, क्योंकि उनके जनक पहाड़ अटल रहते हैं, शायद इसीलिए इस संस्कृति ने अपने तीर्थ स्थान पहाड़ों और नदियों में खोज निकाले थे – शाश्वत अटल और शाश्वत प्रवहमान।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;निश्चय ही यह आस्था का कुंभ स्नान शाश्वत मूल्यों व धर्मबावों का स्नामन है।शाश्वत प्रवहमान जीवन मूल्यों के साथ बहना भी। यह स्नान परंपरा उस सनातन धारा के साथ हो लेना है, जिसमें अटल और चल नैतिक, सामाजिक, धार्मिक मूल्यों के जल प्रवहमान रहते हैं. परंपरा स्थिर और गतिशीलमान मूल्यों का नैरंतर्य है। परम और परा का सातत्य है। इसी नैरंतर्य का स्नान कुंभ स्नान है। पूर्वजों के मंथन प्रयास में अवगाहन है। उन संस्कारों से अभिसिक्त होना है, जो मनुष्य को आपद काल में अविचलित रह कर नदी के समान बहते रहने के लिए संस्कारित करते हैं। मंथन के लिए उत्प्रेरित करते हैं, जड़ता मृत्यु का संदेश देते हैं। यह भी कहते हैं कि मोह से मृत्यु और सत्यसे अमृत की प्राप्ति होती है –&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;अमृतं चैव मृत्यु द्वयं देहे प्रतिष्ठितम्।&lt;br /&gt;मृत्युमापद्यते मोहात्सत्येनापयतेsमृगम्।। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;- मोक्षपर्व, महाभारत&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;भीतर में निहित इसी अमृत को पा लेने के लिए लोग दूर-दूर से, गाँव-गाँव से शहर-शहर से, चारों ओर से ठिठुरते-उमगते धार बन जाने के लिए गंगा तट पर पहुँचते हैं। मोह की मृत्यु से निजात पाने के लिए पहुँचते हैं। अपने ठहरे-ठिठुरे ठूँठ से दुनियावी जीवन को पोटली की तरह लादे चले आ रहे हैं – चारों ओर से गंगा में मिलने के लिए अकुलाती सैकड़ों झरने की तरह। पिछले कुंभ स्नान के बारह बरस बीत चुके हैं। भीतर बहुत कुछ रीत चले हैं। बारह बरस तक बाट जोहते रहने के बाद फिर से नया बहाव देने, सिक्त तथा मुक्त करने कुंभ आया है। तम्बू ताने आया है। संतों की मंडलियों को लेकर आया है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;सुनते हैं यह तब से चला आ रहा है, जब से समुद्र मंथन से निकले अमृत घट की छीना झपटी में घट से अमृत बूँदें छलक पड़ी थीं। जहाँ-जहाँ ये बूँदें छलकीं, वे स्थान अमृत रूप हो गये। सौभाग्यशाली प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, नासिक, कुंभकोणम ऐसे ही धाम हैं। जब सूर्य एवं चन्द्र मकर राशि में होते हैं, बृहस्पति वृषभ राशि में अमावस्या होती है, तब कुंभोयग होता है। इसलिए मकर संक्रांति, अमावस्या और वसंत पंचमी का स्नान ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है। पौराणिक संदर्भ के अनुसार सिंह राशि में गुरु, मेष, तुला राशि में चन्द्र, स्वाति नक्षत्र और सौर चन्द्र सापेक्ष्य सिद्धि योग – ये पाँच पवित्र योग अमृत बिंदु निपात के समय थे।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;स्नान तो लोग रोज करते हैं, परन्तु पर्व-स्नान की पवित्रता, आनन्द कुछ और ही है। नल और कुएँ पर नहाना और नहाना है और नदी में नहाना स्नान है, डूब के स्नान करना है अमृत स्नान। बाहर-भीतर से लीन हो जाना है। भस्म स्नान आग्ने-मंत्र स्नान, ब्रह्म-गोधूलि स्नान (वायक) तथा जल स्नान (वारुण) इन चारों में जल स्नान का भौतिक व आध्यात्मिक महत्व ज्यादा है। नदी में नहाता हुआ अद्धालु सूर्य को अर्घ्य देता है और तर्पण के द्वारा वह ऋषि-पितरों को भी तृप्त कर पाता है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;मिथिला में कहावत प्रचलित है – ‘सुकठिक बनिज और पशुपतिनाथ के दर्शन, अर्थात जब लोग नेपाल स्थित ज्योतिर्लिंग पशुपति नाथ का दर्शन करने जाते थे तो वापस आते समय वहाँ से इमारती लकड़ियों का व्यवसाय भी कर लिया करते थे। यहाँ प्रयाग में भीस्नान के साथ-साथ गाँव वाले अपने लिए उपयोगी सामान खरीदते हैं और आवश्यकता की पूर्ति करते हैं। सबसे बड़ा लाभ उन्हें तब मिलता है जब बरसों भूले बिसरे रिश्ते के लोग उन्हें मिल जाते हैं। मिल जाते हैं। मित्र मिलते हैं। मीलाने के लिए ही तो जुड़ता है मेला। इस मेल-मिलाप के अतिरिक्त जो सादुओं का दर्शन और कथा पुराणों का प्रवचनों श्रवण संयोग होता है, वह अपने आप में अपूर्व होता है। कल्पवासियों के बीच विभिन्न अखाड़ों के सन्तों-महन्तों के मध्य कीर्तन, भजन, प्रवचन, यज्ञ-हवन अनुष्ठान प्रयाग राज का वचनामृत स्नान है। सत्संग की महिमा अघोर है। भगवान ने संतों को अपना ही स्वुरूप बताया है और कहा है कि जिस तरह सूर्य जगत एवं खुद को देखने के लिए प्रकाश देता है, वैसे ही संत स्वयं को तथा भगवान को देखने के लिए अन्तर्दृष्टि देते हैं। वे देवता, बंधु और मरे रूप होते हैं।’ –&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;सन्तो दिशन्ति चक्षूंषि बहिरर्कः समुत्थितः।&lt;br /&gt;देवता बान्धवा सन्तः सन्त आत्माहमेवच।। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;- भागवत 11-16/34&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;गोस्वामी तुलसीदास स्वर्ग, अपवर्ग व सुख से बढ़कर सत्संग सुख को मानते हैं। इस तरह इस सुख का आनन्द लेते हुए इस तीर्थराज में लघु भारत का दर्शन करके भई लोग धन्य होते हैं। अनेक प्रदेश के लोग, बाँति-भाँति की बोली, वेष, रूप-रंग, अखंड भारत का दर्शन। सामाजिक सभ्यता-सेस्कृति की झाँकी पाकर और मन की क्षुद्रता, क्षेत्रीयता, जातीयता को बहाकर निकालकर लोग लौटते हैं अपने घर। यही अमृत स्नान है। यही पर्व स्नान का आशय है। निर्मल वर्मा जी के शब्दों में – “कुंभ मेला अपने में एक बहता, अलिखा महाकाव्य है – गरीबी, गौरव, सुख, यातना को एक कड़ी में पिरोता हुआ, बालू पर मनुष्य की भाग्य रेखा को अंकित करता मिटाता हुआ।” &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;धर्मयुग – 29.1.89 पृष्ठ 14&lt;/span&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;प्रस्तुतिः &lt;/span&gt;&lt;a href="http://www.srijansamman.com/"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ffcc00;"&gt;जयप्रकाश मानस, सृजन-सम्मान&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/33768350-115843033178468168?l=lalitnibandha1.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lalitnibandha1.blogspot.com/feeds/115843033178468168/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=33768350&amp;postID=115843033178468168' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/33768350/posts/default/115843033178468168'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/33768350/posts/default/115843033178468168'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lalitnibandha1.blogspot.com/2006/09/7.html' title='7. तीरथराज प्रयाग में कुंभ'/><author><name>जयप्रकाश मानस</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-33768350.post-115842993381478929</id><published>2006-09-16T10:51:00.000-07:00</published><updated>2006-09-16T11:05:34.166-07:00</updated><title type='text'>6. पश्य देवस्य काव्यम्</title><content type='html'>&lt;a href="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/1600/nature.jpg"&gt;&lt;img style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/320/nature.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;राम लीला का काव्य यदि रामायण है, रामचरित मानस है, महारास का वाग विकास यदि श्रीमद् भागवत, सूरसागर है तो देव लीला का छंद प्रकृति। जरा और जीर्णता से रहित, रमणीय, नवरस रूचि (विषद आजिर) क्षण-क्षण में नवता धारण करने-रमाने, ललचाने, रिझाने डुबोनेवाली प्रकृति का आंगन। पल-पल परिवर्तित प्रकृतिवेश, किसे नहीं आवेशित कर लेता है, खींच लेता है। अनपने मंगल आजिर में लाखों विहारी को विहार करने के लिए न्यौता देता है और आकर्षण ऐसा कि नवल किशोरी-किशोर तो विभोर होकर विहार करते ही हैं, अधरस वय भी पीछे पग नहीं देती –&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;नव वृंदावन नव नव तरुगन&lt;br /&gt;नव नव विकसित फूल।&lt;br /&gt;नवल बसत नवल मलयानिल&lt;br /&gt;मातल नव अति कूल।।2।।&lt;br /&gt;बिहरइ नवलकिशोर&lt;br /&gt;कालिंदी –पुलिन कुंज वन सोभन&lt;br /&gt;नव नव प्रेम विभोर।।4।।&lt;br /&gt;नवल-रसाल-मुकुल-मधु मातल&lt;br /&gt;नव कोकिन कुल गाय।&lt;br /&gt;नव युवी गन चित उमताई&lt;br /&gt;नव सर कानन धाय।।6।। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;- विद्यापति&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;अब आप ही बताइये कि नव रस रूचिर कानन काव्य, क्या कभी जहा जीर्णता से ग्रस्त हो सकता है ? राम कथा-काव्य केलिए भी कहा गया है कि जब तक गंगा है, सागर का विस्तार है, तब तक संसार में रामायणी कथा कही-सुनी जाती रहेगी। इस कथा काव्य की अमरता का उपमान कानन का काव्य ही है। देवताओं की तरह काम रूप धारण करने वाली प्रकृति कभी न रीतने-बीतने वाली शोभा का आगार, विराट और बीहड़, भयंकर और अभयंकर-शुभंकर शिव की तरह, वामन विष्णु के समान। सृष्टि के प्रलय के समय भी प्रकृति प्रकृति की लय नहीं टूटती –&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;उषा सुनहली किरण उगलती&lt;br /&gt;जय लक्ष्मी-सी उदित हुई ।&lt;br /&gt;उधर पराजित काल रात्रि भी&lt;br /&gt;जल में अन्तर्निहित हुई।।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;ऐसी मोहिनी ममतामयी प्रकृति को मरणधर्मा मनुष्य अपने ही जैसा समझ बैठा है, जो जैसा होता है, दूसरे को भी वैसा समझता है। इसी नासमझई ने आदमी तो आदमी, ईश्वर तक को मृतमान लिया है। कविता मर गई, विचार मर गया, केवल वह जीवित है, प्रकृति पर विजय पाने के लिए। विजय की प्रक्रिया में हासिल हुआ कम और खो गया ज्यादा। विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाना, इसी खो गये की भरपाई की दिशा में प्रयास है। पर्यावरणविद् की चिंता और चेतावनी बड़े-बड़े नगरों की आक्रांत करने वाली प्रदूषण की दिन-प्रति-दि विकराल होती समस्याएँ हाथ के कंगन जैसे आँखों के सामने हैं, परन्तु दृष्टिहीन आरसी के सामने होने पर भी कुछ नहीं देख पाता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पृथ्वीपुत्र प्रकृति के कुछ रहस्यों का भेद पा लेने पर उच्छवसित है – उस बौने की तरह जो नीचे झुकी डालियों को छूकर सोचता है कि मैंने आकाश छू लिया है। अपने आपको वामन विष्णु समझने की भ्रांति में वह विराट की अभिव्यक्ति को आक्रांत करने की कोशिश करता है।आदमी की औकात बताने के बहाने, अनन्त का अहसास दिलाने प्रकृति बीच-बीच में तांडव लीला रचती रहता है, पर थेथर आदमी उससे भी सीख नहीं ले पाता – उस अपराधी की तरह, जो बार-बार जेल जाकर भी अपराध के कुकर्म से बाज नहीं आता है। परिणामतः रूद्र का तीसरा नेत्र खुलता है। प्रकृति का रौद्र सर का पन्ना पलटता है – अनावृष्टि, जल प्लावन, भूकम्प, प्रचंड ताप और जीवन को जमा देने वाले शैत्य के पन्ने। प्रदूषण और महामारी के पृष्ठ। विनाश के सिलसिलों का अध्याय। दुख तो यह है कि इन अध्यायों का सिलसिला आरंभ होने पर निर्दोष आम हीतबाहज्यादा होता है, वह खास नहीं, जो प्रकृति के अपमान का असली अपराधी है। कहाजाता है कि “कुत्ते कभी आग में नहीं जलते।”&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;प्रकृति देव काव्य हैं, इस बोध से विहीन विकासवादी दृष्टि विकास के नाम पर विकृति बढ़ा रही है – एलोपैथी दवा की तरह, जो एक रोग को शांत करती है तो दूसरेरोग को पैदा करती है। भारतीय मनीषा विकासवादकी पाश्चात्या सोच बिल्कुलअलग रही है। अर्थ को पुरुषार्थ का दर्जा दिया गया, परन्तु आर्थिक प्रगति के कारणप्रकृति पर विजय प्राप्त करने की बात कभी नहीं सोची गई। उसने पर्यावरण पर आक्रम्ण कभी नहीं किया। उसे रौंदने की बजाय उसने उसके साथ आत्मीयता स्थापित की। उसने उसे धार्मिक, मनोवैज्ञानिक रूप से अपने सुख-दुख में शामिल किया। भारतीय अवतार कच्छप, मत्स्य, वराह, नरसिंह उसके पीपल, वट, आम्र, सूर्य-चन्द्र, नाग नग, चूहे, गरूर सभी प्रकृति के विविध रूप हैं। इन सबके प्रति प्रदर्शित पूजा भाव और अभारतीय दर्शन की दृष्टि से पिछड़ापन का सबूत हो सकता है, पर सचाईतो यह है कि भारतीय दार्शनिक विचरधारा से ओतप्रोत अभिव्यक्ति है। यह अभिव्यक्ति हमारे मिथक और विश्वास का आत्मीय इजहार है। “सियाराममय सब जग जानी” का बोध है। प्रकृति पुरुष केसहभावु से यह सृष्टि विकसित होती है, इस दर्शन की स्वीकृति है, सम्मान है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;वह दर्शन ही क्या जो आचरण का हिस्सा न बन पाये। वह विचार ही का जो कमोबेश आयार में शामिल न हो पाये। सर्वेभवन्तु सुखिनः कह देने मात्र से सभी सुखी नहीं हो जाते, जब तक सभी लोग सबके सुख का ख्याल न रखें, वैसा आचरण न करें। तभीतो भारतीय जन ग्रह-नक्षत्र,गगन-पवन, अग्नि-आकाश, पृथ्वी-पानी सबको देव स्वरूप मानकर उन्हें अपने सुख-दुःख में शामिल करते हैं। जब सूर्य-चन्द्र ग्रहण के समय कष्ट में होते हैं तो लोग उनकी मुक्ति के लिए, कष्ट निवारण के लिए पूजा-पाठ करते हैं, घंटों नदी जल में खड़े होकर प्रार्थना करते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;दरअसल यह अंधविश्वास नहीं, अपितु उपकृत की उपकर्ता के प्रति कृतज्ञता, श्रद्धा, आत्मीयता जैसे भवों की अनौपचारिक अभिव्यक्ति है। देव से दान पाते हैं, प्रकाश भी, इसलिए वे देव हैं। देने वाले के प्रति पाने वाले का फर्ज बनता है कि वह उसके प्रति अपना श्रद्धाभाव प्रकटकरे। अपनापन दिखाये। “धन्यवाद” जैसे औपचारिक शब्दों का प्रयोग करते हुए निपटा न दे। प्रकृति देवी के प्रति पूज्य आत्मीय दृष्टि पूजाय-पूजक का परस्पर भवन का भावन है। भावों को उत्साहित व आनन्दित करने की क्रियात्मिका भावना। इसी पारस्परिक सौमनस्य एवं व्यवहार्य भाव को बढ़ाने केलिए गीता कहती है कि मानव और देव एक दूसरे को भावित करें और श्रेय प्राप्त करें –&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;देवान् भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।&lt;br /&gt;परस्परं भावयन्तः श्रेयमवाप्स्यथ।।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;हमारी संस्कृति-जीवन शैली निर्गुनिया नहीं कि दूसरे के गुण को भुला दें, उपकार की उपासना न करे। सगुणोपासक यह संस्कृति दुर्वादल श्यामल श्याम और तरुण अरुण राजिवनयन राम का उपासक है। मूर्त के द्वारा अमूर्त की आराधना में निपुण स्थूल के द्वारा सूक्ष्म का अहसास कराने में कुशल,। प्रकृति की विभूतियों में देव दर्शन करने-कराने में सिद्ध। हिमालय को देवतात्मामानागया,गंगा देव नदी मानी गई है – जिसके दर्शन पर सन मज्जन से पुनीत हुआ जाता है। गोवर्धन यदि कृष्णरूप है तो समस्त नदी मातृदेवता। केवल कथनी में नहीं, करनी में भी। आज भी लाखों लोग गोवर्धन और नर्मदा की परिक्रमा करते हैं। हरिद्वार से गंगा जल लेकर रामेश्वर में शिवाशीश का अभिषेक करने जाते हैं। नदी तट पर जुड़ने वाला कुंभ पर्व, मेला नहीं, पर्व है। अमृत महोत्सव। लाखों लोगों को इस अम-त पर्व पर नहाते देखकर पर्व भी नहा उठता है, पावन हो जाता है, लाखों की श्रद्धा पाकर गदगद हो जाता है., स्वयं गंगा नहा उठती है – श्रद्धा जल से। इस तरह के मेले के आयोजन के लिए जहाँ पाश्चात्य जगत अरबों रुपया विज्ञापन में खर्च करता है। वहाँ इस देश में केवलश्रुति परम्परा और पंचांग के माध्यम से लोग ऐसे जुड़े आते हैं कि भीड़ सम्हाले नहीं सम्हलती। श्रद्धा का वह बेजोड़ उदाहरण विश्व में खोजे नहीं मिलता। अद्वितीय भक्तिभाव। अप्रतिम सनातन प्रकृति पूजन। वहगमन के प्रसंग में राम सीता को वन जाने से रोकते है, वन में होने वाले कष्टों का खौफ दिखाते हैं और घर में रहकर, सास-ससुर की सेवा करने के लिए सलाह देते हैं, परन्तु सीता की सहचरी प्रकृति से आत्मीयता वन देवी और वन देव को ही सास-ससुर सम देखती है –&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;वन देवी वन देव उदारा।&lt;br /&gt;करिहिं सास-ससुर सम प्यारा।।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;यह है मानव का प्रकृति के प्रति महाभाव। सगुण संस्कृति का व्यापक विस्तार, अप्रत्यक्ष देवों का प्रत्यक्ष रूप। मानो तो देव, नहीं तो पत्थर। मानने से ही हिमालय पत्थर नहीं, देवतात्मा है, पार्वती के पिता, मैना के पति। देश का वरदान। आप मानसरोवर तो दूर, केवल केदारनाथ या बद्रीनाथ चले जाइए। आप विदेह हो जायेंगे। इसी देह से स्वर्गलोक पहुँचने का सद्यः अहसास। युधिष्ठिर के स्वर्गारोहण की समृति-पुराण प्रत्य़क्ष होता-सा जान पड़ेगा। कालिदास का यहग छंद अहसास की अभिव्यक्ति है –&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा।&lt;br /&gt;हिमालयो नाम नगाधिराजः&lt;br /&gt;पूर्वापरो तोयनिधिः वगाह्य।&lt;br /&gt;स्थित पृथिव्यांमिह मानदण्डः।।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;- कुमार संभवम्&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;जैसे रामायण और महाभारत भारतीय काव्य परंपरा के उपजीव्य रहे हैं वैसे ही देव काव्य प्रकृति भी। वेदों में ऊषा, अग्नि, गगन, पवन केन्द्रस्थ हैं तो “मेघदूत” मेघमाला की विश्व में बेजोड़ कृति है। विद्यापति, सूर, तुलसी के पद-प3बंधों में प्रकृति के अनुबंधों का गान है। छायावाद तो प्रकृति का गीला गान ही है, आत्मीय राग, निजता का नैवेद्य –&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;यमुने तेरी इन लहरों में&lt;br /&gt;किन अधरों की आकुल तान&lt;br /&gt;पथिक-प्रिया-सी जगा रही है&lt;br /&gt;उस अतीत के नीरव गानि।&lt;br /&gt;बता कहाँ अब वह बंशीव ?&lt;br /&gt;कहाँ गये नटनागर श्याम ?&lt;br /&gt;चलचरणों का व्याकुल पनघट&lt;br /&gt;कहाँ आज वह वृंदाधाम ?&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;– निराला – यमुना के प्रति&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;हकीकत तो यह है कि प्रकृति हममें समाई हुई है और हम उसमें। मनुष्य भी प्रकृति काव्य कासुंदर पृष्ठ है। नैरंतर्य क्रम में अजर अमर पृष्ठ।क्या यह वैज्ञानिक सत्य नहीं है कि मनुष्य 26 प्रकार के परमाणुओं का संघात है ? क्या यह धार्मिक विश्वास मिथ्या है कि यह शरीर पंचभूतों का मधु मिश्रण है। कृष्ण जब कहते हैं भूमि, जल अनल, अग्नि वायु, मन, बुद्धि, अहंकार सब मेरी प्रकृति है, मुझसे कुछ भी अलग नहीं है –&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;भत्तःपरतरंनान्यत् किञ्चितदस्ति धन जय।&lt;br /&gt;मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव।। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;- गीता 616&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;जिस देश का ऐसा दर्शन हो,जो आत्म से अन्य को अलग नहीं मानता हो, अन्य को हेयया हेल न समझता हो, जहाँ ऐसे विश्वास और मिथक जीवन जीने की सहज प्रक्रिया में अभिव्यक्त होते हों कि सारा जगत “सियाराममय” है, प्रकृति-पुरुष का प्रतिरूप है, वहाँ प्रकृति प्रतिपक्ष कैसे हो सकती है ? उस पर विजचय की बात कैसे सोची जा सकती है ? रावण सोच सकता है, राम नहीं। राम ने सामर्थ्य होते हुए भी समुद्र से रास्ते के लिए अभ्यर्थना की थी, इस अभ्यर्थना को दूत से सुनकर रावण को हँसी आ गई थी –&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;सुनत वचन बिहसा दससीसा। जौ असि मति सहाय कृ कीसा।।&lt;br /&gt;सहज भीरू कर बजन दृढ़ाई। सागन सन ठानी मचलाई।। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;- सुंदर कांड, दोहा – 56&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;वास्तविकता तो यह है कि भारतीय वैदिक काल से प्रकृति को अपना प्रतिपक्ष न मानकर सहचरी मानते आए हैं। उसकी पूजा करते आये हैं। पूजक में शोषक की सोच आ ही नहीं सकती। वह प्रेम कर सकता है, वह गंगा में अस्थि विसर्जन कर एकमेव हो सकता है। वैदिक कवि जब जिज्ञासा भाव से ओतप्रोत होकर भूमा से प्रार्थना करते हैं कि उसके सूर्यचन्द्र, पवन-गगन समस्त पर्यावरण मधुमय हो. तो वह अनुकूल-सहचरी के लिए ही कामना करता है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;मधुवाता ऋतायते मधुक्षरन्तिवः।&lt;br /&gt;मार्ध्विर्नः सन्तवौषधीः मधुनक्तमुतोषसि मधुमत्पार्थिवं ग्वं रजः।&lt;br /&gt;मधु पौरस्तु नः पिता।&lt;br /&gt;मधुमान्नो वनस्पतिर्मधु म्नस्तु सूर्यः माध्वीर्गावो भवन्तु नः&lt;br /&gt;ऊँ मधु-मधु-मधु&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;कण्व ऋषि जब अपने आश्रम पादपों-लताओं से कहते है – “जो शकुन्तला तुम्हारी प्याशांत किये बिना जल नहीं पीती थी, पुष्पभूषण प्रिय होने भी स्नेहवश वह तुम्हारे फूलों को नहीं तोड़ती थी, तुम्हारा प्रथ-प्रथम खिलना उसके लिए उत्सव-जैसा होता था, वह तुम्हारी प्रियसखि पतिगृह जा रही है। उसे विदाई दे दो।विदाई देने का विधान कितना मर्म महोर है। मृगी मुँह की घास उगल दे रही है। मयूर ने नाचना बंद करि दिया है। पादप-लता पीले पत्ते गिरा-गिराकर मानों आँसू से अभिषेक कर रहे हैं।”&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;पांतु न प्रथमं व्यवस्यति जलं युसम्माव्सवपीतेषु या&lt;br /&gt;नादत्ते प्रियमण्डनापि भवतां स्नेहेन या पल्लवम्&lt;br /&gt;आद्ये वः कुसुमप्रस्तिसमये यस्चया भवत्युत्सवः&lt;br /&gt;सेयं याति शकुन्तला पतिगृहं सवैरनुतायम्।।&lt;br /&gt;उदगलितदर्भवकला मृण्यः परित्यक्तन नर्तना मयूराः।।&lt;br /&gt;अपसृतापाण्डुपत्रा मुञ्चन्त्श्रूणीव लताः।। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;- शाकुन्तलम 4/8-11&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;यह हे इस मधुमय देश की संस्कृति का प्रकृति के प्रति सलूक और सरोकार।&lt;br /&gt;प्रसाद का कवि जब नाविक से निवेदन करता कि तुम मुझे वहाँ ले चलो भुलावा देकर जहाँ सागर लहरी आकाश से मनुहार की बातें कर रही हों, पृथ्वी के कोलाहल से दूर ले चल नाविक –&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;ले चल वहाँ भुलावा देकर&lt;br /&gt;मेरे नाविक। धीरे-धीरे&lt;br /&gt;जिस निर्जन में सागर लहरी&lt;br /&gt;अम्बर के कानों में गहरी –&lt;br /&gt;निश्छल प्रेम कथा कहती हो&lt;br /&gt;तज कोलाहल की अवनि रे। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#ff0000;"&gt;- लहर&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;तो यह मधुमय देश की कवि का जीवन से पलायन नहीं, उसके मधुमय क्षणों एवं संवेदनशील पक्ष का आत्मभावन है। सहचरी प्रकृति की आत्मीयता का सम्मोहन है। अपने आपको भुलावा देना नहीं, अपितु कोलाहल को भुलावे में डालना है। ईर्ष्या-द्वेष, मार-धाड़, तनाव-तिमिर से हटकर निश्छल प्रेम की दुनियाँ में खो जाना है, ताकि शक्ति संचय करके जिंदगी के जद्दोजहद का सामना किया जा सके। सप्ताहांत में सैकड़ों मील सफर करके वादियों की गोदी में पिकनिक के बहाने खो जाने वाले पश्चिम के प्रकृति प्रेमी लोग क्या पलायनवादी कहे जा सकते हैं ? नहीं, यह रोजमर्रा की ऊब-डूब से निजात पाने की प्यास है। मानसिक शारीरिक थकान खारिज कर फिर से संघर्ष केलिए तत्पर होने की अनजानी प्रतिक्रिया है। आदिम साहचर्य का भीतरी अर्ज है। सुकूँ पानेका सबब है। देव काव्य में रमने की ललक है। इसी भीतरी ललक और मांग के मद्देनजर प्रकृति से दूर-दूर जा रहे लोगों से रिलके अर्ज करते हैं –&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;“आपको प्रकृति की तरफ जाना होगा। दुनिया के आदि पुरुष के समाने वह सब कहने की कोशिश करनी होगी, जो आप देखते हैं, अनुभव करते हैं, प्रेम करते हैं, खो देते हैं।”&lt;/span&gt;&lt;strong&gt; &lt;span style="color:#cc0000;"&gt;– निर्मल वर्मा – पत्थर और पानी, पृष्ठ 86&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;रिलके आज कहते हैं, पर वैदिक कवि जाने कब से कहते आ रहे हैं – “प्रकृति देवों का काव्य है, जरा-जीर्णता जिसे छूती नहीं। उसे देखो हमेशा उसका सरोकारी बने रहो, तुमसे भी जरा-जीर्णता दूर रहेगी” – पश्य देवस्य काव्यं न ममार न जीर्यति।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;प्रस्तुतिः &lt;/span&gt;&lt;a href="http://www.srijansamman.com/"&gt;&lt;span style="color:#993399;"&gt;जयप्रकाश मानस, सृजन-सम्मान&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/33768350-115842993381478929?l=lalitnibandha1.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lalitnibandha1.blogspot.com/feeds/115842993381478929/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=33768350&amp;postID=115842993381478929' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/33768350/posts/default/115842993381478929'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/33768350/posts/default/115842993381478929'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lalitnibandha1.blogspot.com/2006/09/6.html' title='6. पश्य देवस्य काव्यम्'/><author><name>जयप्रकाश मानस</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-33768350.post-115799994025677408</id><published>2006-09-11T11:29:00.000-07:00</published><updated>2006-09-11T11:39:01.080-07:00</updated><title type='text'>5. ‘भयउ बिदेहु बिदेहु  बिसेषी’</title><content type='html'>&lt;a href="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/1600/images2.jpg"&gt;&lt;img style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/320/images2.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;रूप प्रेम की प्रस्तवना है। मधुमती भूमिका है। नैन को बाँधता है। बैन को मौन और मन को चपल। राजा जनक राम की मधुर मूरत को देखकर और विदेह हो गए। सुध-बुध भूल गए। एकटक निहारते रह गए चकोर की तरह, विभोर की तरह, सामान्य नर की तरह। क्यों न हों विश्व विलोचन चोर कोसल किशोर को निहारकर कौ ज्ञान योग की बात फटकार सकता है ? उपास्य का दर्शन पा लेने के पश्चात उपासना कैसी ? ज्ञान-धान के परम विश्राम राम के साक्षात्कार के बाद ज्ञान-धान कैसा ? तभी तो विदेह ज्ञान-ध्यान को बिसराकरश्रई राम में रम गए और विशेष ऊँचाई पर पहुँच गए। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;जरा विदेहत्व पर विचार करें। जनक जी ज्ञान की सीम थे। मुनिगण भी ज्ञान की प्यास बुझाने विदेर के पास आतेथे। अष्टावक्र जब जनक जी के पास पहुँचे, तो वे वहाँ का एक दृश्य देखकर भौंचक रह गये। अचंभित, ठगे से। उन्हें लगा कि शायद वे गलत द्वार पर पहुँच गए हैं। वापस जानेलगे,तो सुंदरियों के बीच घिरे जनक जी हँसते हुए अष्टावक्र जी को प्रणाम किया और रोका। मुनि को बैठाया। वे शान्त चित्त हुए, तब जनकजी बोले यह ज्ञान का ही पाठ था। व्यक्ति का चित्त जब किसी खास वस्तु या भाव में केंद्रित हो जाता है, तो वह अन्य सारी स्थितियों व भावों से ऊपर ऊठकर तदगत हो जाता है।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;ज्ञान का पहुँच मार्ग यही है। ब्रह्म की प्रप्ति का पथ यही है।योग ासधना का उद्देश्य चित्तवृत्ति का निरोध है – ‘योगश्चित्तवृत्ति निरोधः’ छप्पन प्रकार के भोजन परोस दिये जायें, सिर के ऊपर तलवार लटका दी जाये और भोजन करने के लिए कहा जाये तो भोजन तो अंदर जायेगा पर बेस्वाद होकर। सारा ध्यान भोक्ता का लटकती तलवार पर रहेगा। यही स्थिति मन की होती है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;भगवान राम फुलबाड़ी देखकर लखन के संग गुरू विश्वामित्र के पासआते हैं। वहीं मुनिकी अगवानी के लिए जनकजी पहुँचते हैं। वहीं पर विश्व चित्त चोर राम की मधुर मूरत देखते ही देह-गेह की चिंता से ऊपर और सभी प्रकार की आसक्तियों से मुक्त विदेह सदेह हो गए, ज्ञान की गरिमा गल गई औ वे ठगे से राम रूप को निहारते रह गए –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;मूरति मधुर मनोहर देखी। भयउ बिदेहु बिदेहु बिसेषी।।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;अनेक दिव्य गुणों के आश्रय निधान राम में रम गए –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;रमन्तेयोगि यस्मिन् दिन्यानेक गुणाश्रये।&lt;br /&gt;स्वयं यद् रमते तेषु रामस्तेन प्रयुज्यते।।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;यह विशेष विदेहत्व क्या था ? वह था ब्रह्मानंद को भी फी का कर देने वाला रामानन्द। नये किस्म का लोकानन्द, गृहस्थ धर्म का रस, जिसका पर्याय बनकर रूप धरकर राम जनकपुर में पधारे थे। यही कारण था कि विरागी जनक राम रूप को निहारते ही हागी हो गए। ब्रह्म सुख को भूल गए। बार-बार देखते रहे हैं। पुलकित हो रहे हैं –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;इन्हहिं बिलोकत अति अनुरागा।&lt;br /&gt;बरबस ब्रह्म सुखहिं मन त्यागा।।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;पुनि-पुनी प्रभुहि चत नर-नाहू। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;पुलक गात उर अधिक उछाहू।।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;दर असल जब से जानकी जी प्रकट हुई, तभी से जनक को विशेष विदेहत्व प्राप्त होने लगा। उनका ज्ञान नेह-छोह से नहाने लगा। योग प्रेम से सिक्त होकर पुलकित होने लगा, तर होने लगा। ज्ञान जन्य सूखापन-जड़ता नष्ट होने लगे। ज्ञान साधना सूखेपन को विराग को विरसता को निमंत्रित करना है। वेद ज्ञान का पर्याय है। मजाक में ही सही, संस्कृत पंडित वैदिक को जड़ और वैयाकरण को ‘खसूची’ कहकर मजाक करते हैं। (वैदिको जड़ः) मानों महाज्ञान की सीमा जनक को राग की, प्रेम की धन्यता से भरने के लिए ही सीता जी बेटी बनकर अवतरित हुई थी। तभी तो ज्ञानी जनक को एक साधारण बाप की तरह बेटी-ब्याह कि चिंता सताने लगी थी। धनुष न टूटते देखर उनका धैर्य छूटने लगा था।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;मन टूटने लगा, निराशा भरने लगी –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;तजहु आस निज-निज गृह जाहू।&lt;br /&gt;लिखा न बिधि वैदेही बिबाहू।।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;इतना ही नहीं इस उदासी ने उनके विवेक और वाणी पर भी संयम नहीं रहने दिया –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;अब जनि कोउ माखै भट मानी।&lt;br /&gt;बीर बिहीन मही मैं जानी।।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;यह आक्रोश समूचे समाज और देशकाल के लिए भी चुनौतीथी। वीरता का अपमान था। पौरुष के लिए ललकार थी।यही कारण था कि लखन लाल उबल पड़े। क्षुब्ध हो उठे। उन्हें अपना अपमान नहीं लगा।देश-काल की चुनौतियों को मुँहतोड़ जवाब देनेआयेराम के पौरुष का अपमान लगा। समस्त भारतवासी की वीरता का अनादर लगा और शालीनता के साथ उन्हें कहना पड़ा कि श्री राम की आज्ञा हो, तो मैं गें की तरह ब्रह्माण्ड को उछाल दूँ।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;जनक सीताराम के नेह से ऐसे विदेह हो गए, ऐसे बेसुध हो गए कि ज्ञानी से जड़ कहला गए, ज्ञान की जड़ता की चादर में ढँक जाने दिया। सीता स्वयंवर में शिव-धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने की शर्त रखकर परशुराम जी से तो जड़ता का विशेषण मिला ही (कहु जड़ जनक धनुष केहि तोरा) पुरवासियों ने भी जड़ता के दोष से मुक्त नहीं किया। राम जानकी की छवि को एकटक निहारते हुए पुरवासी नर-नारी विदेह से हो गए। वे भूल गए उनके राजा जनक ज्ञानी हैं। वे विधि को गोहराने लगे कि वह जनक जी जड़ता हर लें। हमारी जैसी मति उनमें संचार करतें, ताकि वे प्रतिज्ञा भूल कर सीता का राम केसाथ विवाह कर दें और जनकपुरवासियों की लालसा पूरी होने दें –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;हरुबिधि बेगि जनक जड़ताई।&lt;br /&gt;मति हमारि असि देहि सुराई।।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;बिनु बिचार पनु तजि।&lt;br /&gt;सीय राम कर करै बिबाहू।।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;सीता विवाह के लिए धनुष भंजन जैसा प्रण रखा जाना उचित विवेक का काम कम लगताहै। मंगल-मोद की घड़ी में तोड़-फोड़ जैसा कार्य उचित नहीं लगता। विवाह का मुहूर्त मिलन-महोत्सव का होता है। व्यक्ति,परिवार और समाज के बीच गँठजोड़ और ने-चोह जोड़ का अवसर होता है, फिर वह शिव धनुष था, पूज्य था। उसे धरोहर के रूप में रखने् के लिए शिव की सलाह से परशुराम जी ने जनकराज देवरातको दिया था, तोड़वाने के लिए नहीं। धनुष-बाण वैसे बी वीरताके प्रतीक हैं। राम की पहचान हैं। उसे ही तोड़ना – अपनी पहचान को खंडित करना, विवेक के औचित्य को प्रमाणित नहीं करता। परशुराम जी का प्रकटीकरण शायद अनौचित्य के विरोध के लिए ही हुआ था।&lt;br /&gt;वस्तुतः ज्ञान प्रेम के बिना अधूरा होता है – भक्ति के बिना अनुष्ठान की तरह,&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;सोह न राम प्रेम बिनु ज्ञानू।&lt;br /&gt;करनधार बिनु जिमि जलजानू।।&lt;br /&gt;जोग कुजोग ग्यान अज्ञानू।&lt;br /&gt;जँह नहिं राम प्रेम परधानू।।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;भगवत प्रीतिके बिना ज्ञान तथा निष्काम भाव भी विभूषित नहीं होते हैं न गन्तव्य तक पहुँचा पाते हैं। जिस भोग में भाव न हो वह भोग भगवान को रुचता नहीं,दुर्योधनके छप्पन पकवान की तरह। जिस स्मरण में राग न हो, वह स्मरणीय को बाँध नहीं पाता – तोता रटन्तराम-राम की भाँति। नारद जी ने विशाल बुद्धि व्यासको अपने महाभारत जैसे महान रचना से, इस विश्वास के बाद भी कि जो महाभारत ेमं वह अन्यत्र है और जो यहाँ नहीं वह कहीं नहीं – कृत्कृत्यता बोध से वंचित देखकर साफ-साफ कहा कि व्यास जी निर्मल ज्ञान हो या यज्ञादि पावन कर्म, यदि वे अच्युत को अर्पित नहीं पाते, भक्ति भाव से वर्जित होते हैं, तो वह व्यक्ति को कृत्कृत्य नहीं कर पाते –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;नैष्कर्म्यमप्यच्युत भाववर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम्।&lt;br /&gt;कुतः पुनः शश्वदभद्रमीश्वरे न चार्पतं कर्मयदप्यकारणम्।।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;व्यास जी को नारद मुनि की सार बात समझ में आ गयी और उन्होंने भक्ति भाव में भींग भागवत की रचना की। चिरंजीवी होने के नाते आज भी जहाँ-तहाँ हो रही भागवत कथा को देखकर वे अघा रहे होंगे। इसीतरह की तृप्ति तीर्थता की अनुभूति राम की मधुर मूर्ति प्रेम भाव को देखकर जनक के ज्ञान ध्यान की हुई होगी। खास किस्म के विदेहत्व से वह पगा होगा। राग विराग साधना और सिद्धि की भूमि मिथिला का राग पक्ष उनके भीतर जागा होगा। वह अभागा ही तो होगा, जो समस्त ज्ञान और योग, अनुष्ठान के निधान तथा फलश्रुति राम को स्वयं द्वार आये देखकर भी मुग्ध नहीं होगा।ललक पुलक तथा प्रेम से भर न उठेगा।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;दरअसल विदेह की विदेहता का अधूरापन सीता अवतरण से आरंभ होकर बेटी-विवाह और विदाई तक जाकर दूर हुआ। वैसे पुत्र-पुत्री के माता-पिता होने के बाद गृहस्थी की पूर्ण अनुभूति हो पाती है।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;श्रीराम भी भाव भूमि विदेह नगरी में विदेह होने ही तो आये थे। वे लीला संगिनी सीता को लेने आये थे अवश्य, परन्तु न वे दहेज में ज्ञान लेने आये थे न मर्यादा का पाठ पढ़ाने। वेतो मिथइलावासियों के सील सनेह से तर होने आये थे। और आये थे विदेह के ज्ञान में सनेह घोलने और अपनी मर्यादा को मधुमय बनाने।साक्षी है जनक की वाटिका जहाँ राम का रघवंशी मन मर्यादा को किनारे रखकर सीता के सनेह सने सौन्दर्य पर मुग्ध हो गया था। उसे वैदेही की सुन्दरता के लिए उपमा नहीं मिल रही थी। उमड़े भाव को उनकी मर्यादा नहीं रोक पाई और लखन लाल से बोल पड़ी –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;सिय सोभा हियँ बरनि प्रभु आपनि दसा बिचारि।&lt;br /&gt;बोले सुचि मन अनुज सन बचन समय अनुहारि।।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;मिथिला की माटी की महक से, उसके सनेह शील से लालित-पालित होने के नाते कहा जा सकता है कि यह भूमि राग विराग को एक साथ जीती है। इसकी दार्शनिकता ऐसी है कि देह-गेह की चिंता से वह दूर ले चजाती ैह और संस्कृति-शील, नाते-नेह ऐसे कि घर आये पहुना को महीना भर बिलमाने वाले। आज भी नव विवाहित दूल्हे दस बीस दिन ससुराल में रहकर स्वर्गीय आनन्द में मगन हो जाते हैं – ‘श्वसुर गृह निवासी स्वर्ग तुल्यो नराणाम्।’ यह कहावत मिथिला के लिए खास रूप से प्रचलित है। श्री राम भी वहाँ मन भर रहे और प्रेम से सराबोर होते रहे। विवाह की गालियाँ खा-खाकर गदगद होते। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;यहीं से प्रेम की पूँजी, जो राम ले गए उसी के बल पर जीवन भर संघर्ष करते रहे। जब भी रावण से संघर्ष करते-करते राम मन हताशा घेर लेती तो वह पृथ्वी तनयासीता की वाटिका छवि का स्मरण करता, प्रीति भरी चितवन कासुमिरन करता और निराशाके अंधकार को पार कर जाता था। नई प्रेरणा पा जाता था। गवाह है निरालाकृत राम की शक्ति पूजा –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;ऐसे क्षण अंधकार घन में जैसे विद्युत&lt;br /&gt;जागी पृथ्वी तनया कुमारीका छवि अच्युत।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;देते हुए निष्पलक, याद आया उपवन&lt;br /&gt;विदेह काप्रथमस्नेह का लतान्तराल मिलन।।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;बेटी सीता और जमाता राम के सनेह में विदेह ऐसे सराबोर होते चले गए कि कन्यादान करने के बाद उनके नयनों से आँसू छलक उठे। उन्हें लगा कि आज सेमेथिली मेरी नहीं रही। परगोत्रा हो गई, वंश से बाहर की हो गई। मिथिला में कन्यादान के समय यह लोकगीत प्रायः गाया जाता है जो स्मृति को जगा जाता है, कन्याके पिता के अश्रु को आज भी ढलका जाता है। ऐसे अश्रु को छलकतेमैंने देखा है –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;कन्यादान कय उठला जनक ऋषि&lt;br /&gt;मोती जकाँ झहरनि नोर (अश्रु)&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;एतेक दिन छली सीता कुल के बेटी&lt;br /&gt;आजु तेजल कुल मोर।।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;जनक जी को इसलोक गीत में ऋषि कहा गया है। यह साभिप्राय कथन है।इसका आशय है कि ऋषि की तरह ज्ञानी होकर भी बेटी के बाप होने के नाते जनक आँसू को रोक नहीं पाये। बेटी विदा के समय तो विरागी बाप के ऊपर राग का रंग ऐसा चढ़ा कि धीरता भाग खड़ी हुई। ज्ञान की मर्यादा मिट गई। कण्व ऋषि भी तो शकुन्तला की विदा की बेला में रोये थे –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;सीय बिलोकि धीरता भागी। रहे कहावत परम बिरागी।।&lt;br /&gt;लीन्ही रायँ उर लाई जानकी। मिटी महामरजाद ग्यान की।।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;चित्रकूट में पहुँचकर तो चित्त की विचित्र दशा हो गई। ज्ञान, धैर्य और लाज सभी पल्ला झाड़कर किनारे हो गये। विदेह की दशा देखकर सुर सिद्द योगी मुनि सभी विदेह प्रेम में डूबने उतराने लगे। वसिष्ठजी को धैर्य बँधानापड़ा। राम-जानकी के प्रेम में डूब रहे जनक जी को उपदेश से किनारे लगाना पड़ा। उस समय उन्हें अपना ज्ञानी होना भारी लगे लगा, जब उनसे कहा गया कि राम वन में रहें या अयोध्या लौटें, आप ही इस दुविधा से सबको उबारने की कृपा करें, क्योंकि आब ज्ञानी और धर्मधीर हैं। तब उन्हें लगा कि बहुत ज्ञानी होना भई ठीक नहीं। यहाँ आकर उन्होंने अच्छा नहीं किया। दशरथ जी ने तो राम को वन भेजकर प्राण त्याग दिये, परन्तु हम हैं कि इन्हें इस वन से उस वन में भेजकर विवेक की पड़ाई लेकर लौट जायेंगे।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;सिथिल सनेह गुनत मन माहीं। आये यहाँ कीन्ह भल नाहीं।।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;वस्तुतः श्रीराम को जिन-जिन ने देखा, उनके प्रेम रस का पान किया, वे सब के सब विदेह से होते यले गये। कौसल्या दशरथ ने दर्शन किया विदेह हुए –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;दशरथ पुत्रजन्म सुनि काना। मानहूँ ब्रह्मानंद समाना।।&lt;br /&gt;प्रेम मगन कौसल्या निसि दिन जात न जान।।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;विश्वामित्र ने दर्शन पाया विभोर हुए, अहिल्या धन्य हुईं। केंवट, निषाद, शबरी जिन-जिनने देखा वे गदगद होए, नहीं हुए तो रावण जैसे राक्षस धर्मी लोग। निर्गुण निराकार ईश्वर जीव मात्रको रमाने, लीला सुख बाँटने, प्रेम में भिगोने के लिए प्रकट हुआ करते हं, सीख और आचरण देने के लिए देह धारण करते हैं, परन्तु चित्त-वृत्ति की कलुषता के कारण अभागे लोग राम मे रम नहीं पाते, उनकी लीलाओं से सबक नहीं लेपाते, इसलिए कंस जैसे लोग कृष्ण को काल रूप में देखते हैं। विदेह होने के बदले विद्वेष करत हैं। वे ईर्ष्या द्वेष, शंका, लोभ-मोह से संकुचित कलुषित दृष्टि के कारण सुंदर शुभ वस्तुओं में भी अशुभ को देखते हैं। आशंकित होते हैं। गोपी विषयक कृष्ण प्रेम सगुण ब्रह्म का ब्रजबनिताओँ के बहाने जीन के प्रतिअतिशय कृपा का उपहार है। सहस्रों गोपियों का पतित्व स्वीकार करके कृष्ण ने लोक समस्या के निदान और समाज सेवा के आयामों के महनीय संदेश दिये हैं।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;लोगों को संदेश देने के लिए भगवान लीला रचते हैं, वरना अनीह ईश को अभाव कैसा ? राग-रोष कैसा ?&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;यद्यपि सम नहिं राग न रोषू। गहहिं न पाप न पुनु गुन दोषू।।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;परन्तु प्रभु प्रेम प्रकट करने से प्रकट होते हैं।लोकको सदभाव, सदाचार को तर करने के लिए लौकिक लीला का वरण करते हैं। दुष्टों का वध और सज्ज्नों की रक्षा मात्र अवतार का उद्देश्य नहीं। उनका मर्त्यलोक में प्रकट होना मर्त्यलोकवासियों के शिक्षण-आचरण के लिए होता है –&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;मर्त्यावतारः खलु मर्त्यशिक्षणे।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;रक्षोवधायैव न केवलं विभोः।।&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#33cc00;"&gt;- पुराण विमर्श पृष्ठ 165&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;जनक जी के विशेष विदेहत्व का कदाचित यहाँ संदेश है कि व्यक्ति चाहे कितना ज्ञानी-ध्यानी और मानी हो प्रेम के बिना सब बेमानी है। लौकिक जीवन को कृत्कृत्य करने के लिए देह-गेह प्रेम के साथ ही राम का सनेह आवश्यक है। समाज में समरसता और परिवार में प्रेम जरूरी है। तीव्र गति से बढ़ती बुद्धि और समृद्धि नेह-नातों के अभाव में आज किस कदर समाज और परिवार को विखण्डित कर रही है, दाम्पत्य जीवन को अशांत कर रही हैं वह किसी से छिपा नहीं है। ज्यादा ज्ञानी लोगों के दाम्पत्य जीवन ज्यादातर तलाक के हवाले हो रहे हैं। तनावग्रस्त हैं। विवाह का पावन बंधन पाबंदी या समझौता समझआ जा रहा है। और इन सबके भयावह परिणामों के भोक्ता हमारे परिवार और राज-समाज बनते जा रहे हैं। बिगड़ती सिथितियों से बचने-बचाने के लिए अवतार अवतरित होते हैं। रामावतार और उनके पात्रों-विपात्रों के चरितों का यही सब संदेश है।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;प्रस्तुतिः &lt;/span&gt;&lt;a href="http://www.srijansamman.com"&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;जयप्रकाश मानस, सृजन-सम्मान&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/33768350-115799994025677408?l=lalitnibandha1.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lalitnibandha1.blogspot.com/feeds/115799994025677408/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=33768350&amp;postID=115799994025677408' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/33768350/posts/default/115799994025677408'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/33768350/posts/default/115799994025677408'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lalitnibandha1.blogspot.com/2006/09/5.html' title='5. ‘भयउ बिदेहु बिदेहु  बिसेषी’'/><author><name>जयप्रकाश मानस</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-33768350.post-115799931743760878</id><published>2006-09-11T11:19:00.000-07:00</published><updated>2006-09-11T11:28:37.550-07:00</updated><title type='text'>4. आषाढ़स्य प्रथम दिवसे</title><content type='html'>&lt;span style="font-family:Times New Roman;font-size:130%;color:#3333ff;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;a href="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/1600/images.0.jpg"&gt;&lt;img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 212px; CURSOR: hand; HEIGHT: 142px; TEXT-ALIGN: center" height="121" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/320/images.0.jpg" width="165" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;आषाढ़ का स्नेहगाढ़ प्रधम दिवस हो अथवा एक दूसरे में समा जाने वाला प्रथम माधवी क्षण, प्रथम तो प्रथम ही होता है। औव्वल। लाजवाब। अछूता। अनाघात। अपरुब। चू लेने वाली। स्मृति में छप जाने वाली। बेजोड़ घड़ी। सबके जीवन में ऐसी घड़ी आती है, पर इसे तरबदार और तड़पदार लोग पकड़ पाते हैं। रामगिरी के यक्ष को ऐसी ही घड़ी ने पकड़ लिया था। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;&lt;?xml:namespace prefix = o ns = "urn:schemas-microsoft-com:office:office" /&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;आषाढ़ का पहला दिन था। रामगिरी की चोटियों पर बादल उतर आये थे &lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;–&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt; संतप्त को तृप्त करने, पोर-पोर भिगोने, तर करने। यक्ष की घनीभूत पीड़ा को जगाने, साथ-साथ बरसने के लिए याद दिलाने। शिखर-शिखर पर मंद-मंद पवन तार पर तैरते बादलों को देखकर विरह दग्ध यक्ष का मन विकल हो उथा था और चित्त चंचल। बदली को घिय आये देखकर आबाल वृद्ध अपने-अपने स्तर से खुशी का इज़हार करने लगते हैं। धरती बूँद पाते ही उच्छवसित हो उठती है। अपनी सोंधी उच्छवास को रोक नहीं पाती। दादुर डहकने लगते हैं और मेंढक चहकने। प्रीति का इज़हार करने लगते हैं। सुखी जीव और जड़ जीव का जब यह हाल होता है तो विरही जन का तो कहना ही क्या &lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;?&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt; उसके लिए सदा वसन्त बना रहता है &lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;–&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;मेघालोके भवति सुखिनो&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-SIZE: 16pt; FONT-FAMILY: 'Eras Light ITC'font-family:GIST-DVOTMaya;font-size:12;"  &gt;s&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Eras Light ITC'font-family:'Eras Light ITC';font-size:16;"  &gt;प्यन्यथावृत्तिचेतः।&lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-SIZE: 16pt; FONT-FAMILY: 'Eras Light ITC'font-family:GIST-DVOTMaya;font-size:12;"  &gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Eras Light ITC'font-family:'Eras Light ITC';font-size:16;"  &gt;कण्ठाश्लेषप्रणयिनि जने किं पुनर्दूर संस्थे ।। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Eras Light ITC'font-family:'Eras Light ITC';font-size:16;"  &gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Eras Light ITC'font-family:'Eras Light ITC';font-size:16;"  &gt;- मेघदूत, श्लोक 3&lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-SIZE: 16pt; FONT-FAMILY: 'Eras Light ITC'font-family:GIST-DVOTMaya;font-size:12;"  &gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Eras Light ITC'font-family:'Eras Light ITC';font-size:16;"  &gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Eras Light ITC'font-family:'Eras Light ITC';font-size:16;"  &gt;मेघ दर्शन से सुखी लोगों का भी चित्त चंचल हो जाता है तो प्रेमि को प्रिया की दूरी सतायेगी ही।&lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-SIZE: 16pt; FONT-FAMILY: 'Eras Light ITC'font-family:GIST-DVOTMaya;font-size:12;"  &gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Eras Light ITC'font-family:'Eras Light ITC';font-size:16;"  &gt;हो सकता है विरह-विरह की बात आधुनिक युग को बेमानी लगे। जो युग मनुष्य को माल और मशीन बनाने में लगा हो, हाँफते ही रहना जिसकी नियति बन चुकी हो, अनापसनाप तृष्णा ही जिसका मकसद हो, उसके लिए क्या आषाढ़ का पहला दिन और क्या सावन की रिमझिम &lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;? &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;क्या वर्षा, क्या वसन्त &lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;?&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt; सब बेमतलब।मतलबी के लिए मतलब की चीज ही मतलब की होती है, बाकी सब बेमायने की। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;दरअसल इन्द्रियों में श्रेष्ठ मन ही जिसका मर गया हो, महघट बन गया हो, संवेदनाशून्य हो चुका हो,उसे आषाढ़ का प्रथम दिवस तो दूर, जगत की कोई गति नहीं व्यापती। ब्दल बरस-बरस के रीत जाये, रीते लोग रीझ नहीं पाते, भी ंग नहीं पाते। कोयल बोल-बोल कर थक जाये, सिर पटक ले, पर सब बेमतलब। लोभी के सामने उदारता का बखान भैंस के आगे बीन बजाना है और औंधे घड़े पर रिमझिम की बौछार जैसी है। रीझ-बूझ रहित ठूँठ और बिरस लोगों के लिए आषाढ़ का प्रथम&lt;span style="mso-spacerun: yes"&gt; &lt;/span&gt;दिवस क्या और क्या फागुन की पूर्णिमा &lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;!&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt; तीसों दिवस और बारहो महीने उनके लिए एक जैसे होते हैं। रोजमर्रा का अंग। न मन में तरंग न अंग में उमंग। परन्तु वियोगी यक्ष का पोर-पोर प्रेम की अंतर तरंग से तरंगित था, पगा था। विरह रस में डूबा था। रीझ रिस रही थी। तभी तो वह प्रिया के प्रथम प्रेम को पाकर इतना बेसुध हो गयाथा कि उसे अपने स्वामी कुबेर को पूजा पुष्प पहुँचाने की सुध नहीं रही और हृदयहीन स्वामी के आदेश का वह दंड भुगत रहा था रामगिरी पर्वत पर। चारों ओर पहाड़ और बीच में पछाड़ खाता विरही यक्ष। पर्वत की तरह तपता मन आषाढ़ के पहले बादल को देखकर उमड़ पड़ा। उसके भीतर मेघ उतर आया। उसकी घनीभूत पीड़ा बरसने के लिए आतुर हो उठी। आठ मास तक रुका अन्तर्वाष्प आत्मीय मेघ को देखते ही सहस्रधार हो उठा। मेघ बनकर दूत बन गया।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;निश्चय ही पहला कवि वियोगी रहा होगा। तभी तो क्रौंच मिथुन के वियोग जनित करुणा सेविगलित होकर उसका पहला छंद फूटा था जो आदि काव्य का स्रोत बन गया।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;वस्तुतः वियोग से संयोग पुष्ट होता है। राग गाढ़ होता है। श्रृंगार रस राज बनता है। प्रियका अभाव ही वियोग है।अभाव ही वस्तु या व्यक्ति के असली भाव की महत्ता का बोध कराता है तभी जानकी हरण के समय राम इतने विकल हो गये थे िक वाल्मीकि रामायणभींग गई।उत्तर चरित में ही राम ने अपने चरित से असली साक्षात्कार कियाथा। पत्थरो को रोते देखा था। करुणा द्रवित होते देखा था।जब राम का यह हाल था तो रामगिरी के यक्ष कातो बुरा हाल होना ही था। आषाढ़ का पहला बादल, वियोग पर पहला प्रहार। दुर्बल पर दो आषाढ़ है। तड़प उठा विरही मन।&lt;span style="mso-spacerun: yes"&gt; &lt;/span&gt;इस तड़ में शामिल हो गयाथा कालिदास का बेहद संवेदनशील समूह मन। यक्ष मेघ को संदेश देता रहा और कालिदास का की कमल तार में तार मिलाकर पाती &lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;‘&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;मेघदूत&lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;’&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt; रचती रही।&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt; &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;यक्ष के बहाने अपने अन्तर से साक्षाात्कार करती-कराती रही। पात्र और घटनाएँ अपने को ही खोलने के वास्तविक बहाने होते हैं। जिस रावण को तुलसीदास खलनायक के रूप में चित्रित करते हैं उसे माइकेल मधुसूदन दत्त नायकके रूप में प्रस्तुत करते हैं। यह अपने भीतर को खोलने का खूबसूरत बहाना है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;वैसे तो सैकड़ों-हजारों दिन जीवन में दाखिल होते हैं और बिना कुछ खास दर्ज कराये गुज़र जाते हैं। छाप नहीं छोड़ पाते। गिनती में नहीं आते। अनामिका नहीं बन पाते। रोजनामचा बनकरबीत जातेहैं, परन्तु कुछ पल-धिन ऐसे आतेहैं जो देह प्राण से गुज़रकर गीत बन जाते हैं, &lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;‘&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;मेघदूत&lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;’&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt; बन जाते हैं और बन जाते हैं इतिहास। &lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;‘&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;मेघदूत&lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;’&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt; के छंद कुछ ऐसे ही हैं। प्रथम दिवस औस वयस के वाष्प भी भींगे क्षणों का छंद। मंद-मंद पवन संग तैरने वाले मेघों का मन्दाक्रान्ता छंद। मधुर मिलन का क्षण &lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;–&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;मन्दं मन्दं नुदति पवनश्चानुकूलो यथा त्वां&lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;वामश्चायं नदति मुर चातकस्ते सगन्धः।&lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;गर्भाधानक्षण परियान्नूमाबद्धमालाः&lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;सेविष्यन्ते नयन सुभगं खे भवन्तं बलाकाः।।&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#33cc00;"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;- मेघदूतम् &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#33cc00;"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;प्रधम दिवस की बाते, मुलाकातें और रातें सभी प्रधम होती हैं &lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;–&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt; सर्वोत्तम।यह विष्णु-दिवस जो ठहरा। विष्णुके शयन उत्थान की एकादशी तिथि &lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;–&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;‘&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;प्रथमो प्रख्यातो विष्णु दिवसः, प्रथमे एकादशी इत्यर्थः - मल्लीनाथ&lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;’&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;। उत्सवी दिवस। यक्ष का पक्ष जाने भी दें और पुरुषोत्तम राम को ही देखें। जब पहली बार वे जनक वाटिका में गये थे और जानकी उनके नयन की अतिथि बनी थी, चक्षु राग के सहारे एक दूसरे के भीतर समा गये थे, तो वह प्रथम दिवस अविस्मरणीय बन गया था। मर्यादा भू ल गये थे। बार-बार गर्दन घुमा-घुमा कर ताकने लगे थे। अकबका गये थे। नयन के मीठे मसागम से रघुवंशी मनडोल उठा था &lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;–&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;अस कहि फिरि चितए तेहि ओरा।&lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;सिय मुख ससि भय नयन चकोरा।।&lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;देखि सीय सोभा सुख पावा।&lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;हृदय सराहत बचनु न आवा।।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;यह प्रथम वाटिका राग ऐसा महाराग बन गया, अविस्मरणीय क्षण बन गया कि निराला के राम का मन युद्ध भूमि में भी हताशा से बचने के लिए स्मरण करता है &lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;–&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;ऐसे क्षण अंधकार घन में जैसे विद्युत&lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;जाकी पृथ्वी तनया कुमारिका-छवि अच्युत&lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;देखते हुए निष्पलक, याद आया उपवन&lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;विदेह का-प्रथम स्नेह का लतान्तराल मिलन&lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;ज्योति प्रपात स्वर्गीय-ज्ञात छवि प्रथम स्वीय&lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;जानकी-नयन-कमनीयप्रथमकम्पन तुरीय&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#33cc00;"&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;–&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt; राम की शक्ति पूजा&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#33cc00;"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;font-size:130%;color:#3333ff;"&gt;यक्ष बेचारा तो युद्ध भूमि में नहीं था। वह वनवास में था। विरह भूमि में। वह आषाढ़ केप्रथम दिवसीय मेघमाला को देखते ही आकुल हो उछा था। प्रिया के प्रथम मिलन से उठे प्रथमतुरीय कम्पन की सम्ृति ने उसे हिला दिया था। चेतनाचेतनके विवेक को बुला दिया था और स्मृति धूम-ज्योति-सलिल सन्निपात मेघ को दूत बनाने के लिए विवश कर गई थी। यह क्षण ही विवशता का होता है, विवेक का नहीं। आइए उसकीविवशता से आत्मीयता जो़ड़ें और आषाढ़ की प्रथम दिवसीय साझा अनुभूति में हम सब अपने-अपने प्रथम दिवस का स्मरण करें।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;font-size:130%;color:#3333ff;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;font-size:130%;color:#3333ff;"&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;प्रस्तुतिः &lt;a href="http://www.srijangatha.com"&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;जयप्रकाश मानस, सृजन-सम्मान&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;a href="http://www.srijangatha.com"&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;,&lt;/span&gt; &lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: GIST-DVOTMaya; mso-ascii-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';" &gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;font-size:130%;color:#3333ff;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0cm 0cm 0pt; TEXT-INDENT: 36pt; TEXT-ALIGN: justify" align="justify"&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Times New Roman';font-family:GIST-DVOTMaya;" &gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/33768350-115799931743760878?l=lalitnibandha1.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lalitnibandha1.blogspot.com/feeds/115799931743760878/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=33768350&amp;postID=115799931743760878' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/33768350/posts/default/115799931743760878'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/33768350/posts/default/115799931743760878'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lalitnibandha1.blogspot.com/2006/09/4.html' title='4. आषाढ़स्य प्रथम दिवसे'/><author><name>जयप्रकाश मानस</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-33768350.post-115723433226818804</id><published>2006-09-02T14:51:00.000-07:00</published><updated>2006-09-02T14:58:52.276-07:00</updated><title type='text'>3. नई परम्परा के कवि भवभूति</title><content type='html'>&lt;a href="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/1600/kalidas.jpg"&gt;&lt;img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/320/kalidas.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;डॉ. शोभाकांत झा&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;वाल्मीकि के पश्चात करुण रस को मानवीय करुणा को साहित्य और समाज के सोच के केन्द्र में प्रतिष्ठित कर देने वाले संभवतः भवभूति हैं। उनका कथन है कि एक करुणरस ही है जो विभिन्न राग मुद्रा के संयोग से अनेक रूपों में परिभाषित होता रहता है – पानी के बुलबुले की तरह, तरंग की तरह, भँवर की भाँति, फेन के माफिक –&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;एको रसः करुण एव निमित्तभेदा&lt;br /&gt;द्भिन्न पृथक पृथगिव श्रयते विवर्तान्।&lt;br /&gt;आवर्त बुदबुदतरङमयान्विकारान्&lt;br /&gt;नम्मो यथा सलिलमेव तु तत्समग्रम्।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- उत्तर चरित 3/47&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कवि की इस प्रस्थापना की तह में जाकर विचार करें तो बड़बोलापन या नई बात कहकर साहित्य जगत को चौंका देने की मंशा नहीं है, अपितु श्रीराम के उत्तर चरित से उपजी संवेदना है – करुणा है। उसी का आवर्त है। परम्परा से रसराज की पदवी श्रृंगार को प्राप्त है। इस परम्परा के आगे बिना प्रश्न चिन्ह लगाये कवि ने करुणा को उसके आगे कर दिया। एक नई सोच दी। रस सोच के ही औरस पुत्र हैं। तरह-तरह की मानवीय चिन्ता – संवेदना साहित्य संसार में रस-राग के आकार-प्रकार में छवि धारणकर प्रकट होते रहते हैं – जलधर की भाँति भिगोने के लिए, तर करने के लिए, मानव होने के लिए। क्रौंचवध से उपजी पीड़ा – सोच ने आदि कवि को तरह-तरह के रस से युक्त आदि महाकाव्य रामायण रचने की प्रेरणा दी। मानों वही करुणा विविध रसों की भंगिमा में काव्यान बन गई। इसी परम्परा को मानों बढ़ाते हुए घनीभूत पीड़ा को भवभूति ने स्मृति से उतारकर ‘उत्तर रामचरितम्’ नाटक में करुण रस वाली नई अवधारणा की है। जैसे घनीभूत वाष्प कभी धारासार वर्षा में तो कभी बादल के फट पड़ने की और उसमें पर्वतों के धसक जाने की स्थिति निर्मित होती है, वैसे ही ‘उत्तररामचरित’ की करुणा - सीता-राम की पीड़ा ने पत्थर तक को अपने संग रोने के लिए – फट पड़ने के लिए विवश-सा कर दिया है – जो शेक्सपियर की त्रासदी नहीं कर सकी। सीता के वियोग से विकल जनस्थान के रोते हुए पत्थर और फटते हुए वज्रहृदय की गहराई को पश्चिमी त्रासदी कदाचित नहीं छू सकी है –&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;जनस्थाने शून्ये विकलकरणैरार्य चरितै&lt;br /&gt;रपिग्रावा रोदित्यपि दलति वज्रस्य हृदयम्।। 1 /28&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वास्तव में करुणा यद्यपि दुखात्मक प्रकृति वाली है, परन्तु अन्य मौलिक प्रवृत्तियों की अपेक्षा यह त्वरित प्रतिक्रिया वाली है। यह अन्य प्रवृत्तियों को प्रतिक्रिया के लिए उकसाती है – कभी उत्साह को तो कभी क्रोध को, कभी घृणा को तो कभी शाँति-प्रेम को। करुणा की इसी व्यापक और सुखदुखात्मक प्रकृति को पहचानकर भवभूति ने अपनी प्रतिभा की भूति का प्रमाण दिया है। इसी से प्रभावित होकर उन्होंने आँचल में दूध और आँखों में आँसू समेटे स्त्री समजा के प्रति अपनी सहानुभूति विशेष रूप से अभिव्यक्त की है। सीता के विरह में राम को बार-बार रुलाया है। मूर्च्छित होने दिया है। करुण रस की भट्ठी में तपस्या है – (“पुटपाक प्रतिकाशो रामस्य करुणो रसः”) और उन्हें जन अदालत के कठघरे में खड़ा किया है – अपराध स्वीकारने के लिए। न्यायाधीश के द्वारा अपराधी करार दिये जाने पर अपराधबोध में वह प्रायश्चित का भाव नहीं रहता जो व्यक्ति के द्वारा स्वयं सबके सामने बिना किसी बाहरी दबाव के स्वीकारे जाने पर। राम ने स्वीकारा है कि एक तो रावण वध के बाद अग्नि परीक्षा लेना अन्याय था और उस पर से यह लोकापवाद के भय से निर्वासन दंड दिया जाना तो ‘अपूर्व चाण्डाल कर्म’ है। प्रेम से पाली गई चिड़िया को छल से बहेलिये के हाथ सौंप देना है –&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;“अपूर्वकर्मचाण्डालमयि मुग्धे विमु़ञ्चमाम्।&lt;br /&gt;श्रितासि चन्दनभ्रान्त्या दुर्विपाकं विषद्रुमम्।।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;– उत्तर चरित 1/46&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;‘अपूर्वकर्मचाण्डाल’ राम को कहने का साहस या तो स्वयं राम ही कर सकते थे या भवभूति की कलम ही कर सकती थी। उनकी कलम स्त्री विषयक अनेक भ्रान्त धारणाओं और रुढ़ियों पर प्रहार करती है। मालतीमाधव नाटक में परम्परा से हटकर मालती और माधव के प्रेम परिणय के बाधक समाज को एक प्रकार से कालापिक करार दिया गया है। कापालिक अघोरघंट यदि मालती को बलि देने के लिए उद्यत है तो पिता भी मंत्री होकर भी राजा के बूढ़े नर्मसचिव नंदन से उसका ब्याह कर देने की स्वीकृति देकर कापालिक कर तरह बलि देने का ही मानो उपक्रम करते हैं – “निर्व्यूढ़ च निष्करुणतया तातस्य कापालिकत्वम्।” प्रोफेसर राधावल्लभ त्रिपाठी ने ठीक ही कहा है कि “सामंतीय समाज में स्त्री को एक उपभोग की वस्तु बना दिये जाने के विरुद्ध प्रतिक्रिया कालिदास और भवभूति दोनों ने बड़े प्रखर रूप में दी है।... कवि के मन में स्त्री की छवि और समाज में उसकी चिन्त्य स्थिति दोनों को एक साथ विडंबना की शैली में भवभूति ने राम के मुख से व्यक्त किया है”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;(दूसरी परम्परा के नाटककार भवभूति पृष्ठ 9) –&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;br /&gt;“त्यवा जगन्ति पुण्यानि त्वययपुण्या जनोक्तयः&lt;br /&gt;नाथवन्त स्त्वया लोकास्त्वमनाथा विपत्स्यते।।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;– उत्तर चरित 1/43&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रचनाकार चाहे जिस वर्ग या संस्कार को लेकर सरस्वती के मंदिर में आये, वह मानवता, समता, समस्त के प्रति प्रेम और सदभाव संजोये रहता है – संतों की तरह। खासकर दबे, दलित, शोषित, पीड़ित के प्रति प्रार्थना, निवेदन लेकर आता है। उसके निवेदन में आक्रोश-आकांक्षा, रीझ-खीझ होते हैं – समष्टि के कल्याण के लिए भवभूति का स्वर जरा ज्यादा ही ऊँचा-तीखा है – कबीर की भाँति। कालिदास तुलसीदास की सामाजिक राजनीतिक नजरिये में बदलाव लाने का प्रयास करते हैं तो भवभूति कबीर की तरह। सड़े-गले मुल्यों एवं समयातीत सोच, परम्पराओं पर दोनों प्रहार करते हैं। स्त्री के लिए राज-समाज को प्रेरित करते हैं। वे व्यक्ति के सम्मान की योग्यता गुण को मानते हैं – जाति, लिंग, वय आदि को नहीं –&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;“न धर्मवृद्धेषु वयः समीक्षते” – कालिदास कुमारसंभव&lt;br /&gt;“गुणाः पूजास्थानं गुणिषु न च लिङग न च वयः।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;– भवभूति उत्तर चरित 251&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्याहता स्त्री के परित्याग व प्रसंग शाकुन्तलम् नाटक में भी है और उत्तर रामचरित में भी। दोनों नाटकों में दोनों नाटककारों ने राज-समाज की ओछी मनोवृत्तियों पर टिप्पणी की है, किंतु कालिदास की टिप्पणी उतनी तीखी नहीं है जितनी भवभूति की है। निर्वासन के अनौचित्य पर जनक कहते हैं कि यह तो सीता और मेरा भी अपमान है, तो कुरूपत्नी अरुंधती अग्निपरीक्षा को ही अनुचित ठहराती है। वे सीता को वंदनीय चरित्र मानकर उसे अग्नि से ज्यादा पवित्र मानती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तरह-तरह से कवि ने रुढ़ियों को तोड़ने की कोशिश की है। जोखिम उठाया है। अपने को घर के भीतर और बाहर भी अवज्ञा का पात्र बनाया है। स्त्री और शूद्र वेद पढ़ने के अधिकारी हैं। आत्रेयी नाम की तापसी वेद पढ़ने के लिए वाल्मीकि आश्रम में अतिथियों के कारण स्वाध्याय में बाधा पड़ते देख अगस्त्य ऋषि के आश्रम में जाती है। ‘मालतीमाधव’ की कामंदकी देवरात के साथ न्याय विद्या पढ़ती थी। देवरात बाद में अपने पुत्र माधव को उसके पास विद्या अध्ययन के लिए भेजता है। इसी तरह जनक जी के वाल्मीकि आश्रम में आगमन पर मधुपर्क कराया जाता है और वशिष्ठ ऋषि के आने पर बेचारी बछिया मारी जाती है। आतिथ्य का यह विधान वहाँ के आश्रमवासी छात्रों को उचित नहीं लगता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मालती-माधव के प्रेम की मान्यता, धर्म की विकृति के प्रतीक कापालिक अघोरघंट का वध, शम्बूकवध हृदयहीन रूढ़ व्यवस्था के प्रति जनक माता कौसल्या आदि के आक्रोश की अभिव्यंजना भवभूति को क्रांतिकारी कवि प्रमाणित करने के पर्याप्त प्रमाण हैं। उन्होंने रामायणी कथा में बहुत कुछ परिवर्तन करते हुए साहस का परिचय दिया है यह साहस चमत्कार या नवता के व्यामोह में पड़कर नहीं किया गया है, अपितु उनके मन के अंदर उमड़-घुमड़ रही वह विचार वाष्प है जो मानवीय संवेदना के विविध रूपो में नाटकीयता के अनुरूप बरस पड़ती है, फूट पड़ती है – ज्वालामुखी की तरह। अन्तर्दाह से दग्ध होता राम मन भवभूति का पीड़ा तापित मन लगता है, जो श्लोक में परिणत हो गया है, जो अपने राम को न जीने देता है न मरने –&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;दलति हृदयं गाढोद्वेगं द्विधा तु न मिद्यते&lt;br /&gt;वहर्ति विकलः कायो मोहं न मुञ्जति चेतनाम् ।।&lt;br /&gt;ज्वलयति तनुमन्तर्दाहः करोति न भस्मसात्।&lt;br /&gt;प्रहरति विधिर्मर्मच्छेदी न कृन्तति जीवितम्।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- उत्तर रामचरित&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;अर्थात् सीता विरह में राम कहते हैं कि गाढ़ोद्वेग हृदय को दल-सा रहा है, तथापि वह दो भागों में फट नहीं रहा है। विकल काया बार-बार मूर्च्छित होकर भी चेतना छोड़ नहीं रही है, अर्थात मूर्च्छा की अवस्था में भी पीड़ा का अहसास चैन नहीं लेने देता। अन्तर्दाह शरीर को जलाकर भस्म नहीं बना रहा है, ताकि दाह से मुक्ति मिले। दैव ने मेरे मर्म पर प्रहार किया है, परन्तु जीवन को समाप्त नहीं किया है, ताकि वह भोगता रहे। त्रासदी के नाटककार शेक्सपियर से तुलना करते हुए डॉ. रामविलास शर्मा ने कहा है – “प्रसार-यथार्थ की विविधता मनोवैज्ञानिक सूझ-बूझ, चरित्र निर्माण की वास्तविकता – में यद्यपि शेक्सपियर आगे हैं, तथा गहराई – शोकानुभूति की तीव्रता, करुण रस ही नहीं, वात्सल्य आदि सुकुमार भावों की पराकाष्ठा – में भवभूति आगे हैं।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;– परम्परा का मूल्यांकन पृष्ठ 43&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जैसे यथार्थ से साक्षात्कार प्रसाद भी करते हैं और निराला भी, परन्तु प्रसाद या प्रेमचन्द उस यथार्थ को प्रायः आदर्शोन्मुख बना देते हैं, जबकि निराला करुणोन्मुख वैसे ही कालिदास और भवभूति की काव्यानुभूति है। कालिदास दण्डकारण्य की सीताहरण घटना की स्मृति को रघुवंश में (14/25) सुखात्मक अनुभूति बना देते हैं तो भवभूति उत्तर रामचरित में चित्रदर्शन से उपजी स्मृति को दुखद। यह स्मृति लक्ष्मण को भी कचोटती है, तो राम को भी टीसती है। यह टीस “ते हि नो दिवसा गताः” - के रूप में राम मुख से प्रकट होती है। राम उसे भुला नहीं पाते। यह यथार्थ एक मुहावरा-सा बनकर संस्कृत में प्रचलित हो गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सार्ववर्णिक वेद नाटक को भवभूति सर्वसंवेदना सहानुभूति से करुण बनाते हुए भावात्मक एवं शिल्प शैली के स्तर पर भी नई पम्परा का प्रवर्तन करते हैं। उनके तीनों नाटक विदूषकविहीन हैं। हास्यव्यंग्य पात्रहीन इन नाटकों में धार्मिक सामाजिक विडम्बना और विसंगति पर प्रहार या व्यंग्य संस्कृत का रूढ़ पात्र विदूषक राजा या नायक का मुँहलगा बनकर करता रहा है, हास्य के बहाने करता रहा है, किन्तु भवभूति के नाटकों में यह कार्य बच्चों और छात्रों से कराया गया है। लव और चन्द्रकेतु के बीच अश्वमेघ के घोड़े को रोक लेने के कारण जो संवाद हैं, वह सामंती व्यवस्था पर कड़ा प्रहार है। वासंती का सीधा-सीधा राग विषयक उपालम्भ भी इसके उदाहरण हैं। संभवतः भवभूति की करुणा ने गंभीरता के बीच विदूषकीय हल्कापन को टालने के लिए ऐसा किया हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भाषा और भाव दोनों स्तर पर भवभूति नाटकीय द्वन्द्व सृजन में निपुण हैं। एक ही श्लोक में अनेक विरोधी अनुरोधी भावों की व्यंजना जगह-जगह छूती है – बिहारी के दोहे की तरह। नाटकीय द्वन्द्व विधान के लिए कहीं रामायण की कथा में, कहीं भाषा में, रंगमंच की शैली में परिवर्तन किया गया है। डॉ. राधावल्लभ त्रिपाठी का मन्तव्य है कि “सामाजिक शक्तियों की द्वन्द्वात्मकता भवभूति के तीनों नाटकों की अन्तर्वस्तु कही जा सकती है।... महावीर चरित में राम कथा के क्षेत्रों में एक प्रवर्तक नाटक है। भवभूति ने साहस करके राम कथा के रंगमंचीय रूप का जो पैमाना बना दिया, उसका प्रतिरूप लेकर राजशेखर (बालरामायण), मुरारि (अनर्घराघव), जयदेव (प्रसन्नराघव) आदि ने रामायण की विषयवस्तु पर नाटक लिखे।”&lt;/span&gt; &lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;– दूसरी पम्परा के नाटककार भवभूति पृष्ठ 13&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भवभूति की तरह से अपनी प्रतिभा विभूति के द्वारा परम्परा की रेखाओं को मिटा मिटाये, उनके आगे नई परम्परा की रेखा खींचते हैं। “उन्होंने अपने शास्त्र ज्ञान और पाण्डित्य का खाद की तरह उपयोग करते हुए कविता की अपनी धरती पर उसके अपने दर्शन का पौधा रोपा और खड़ा किया।” (राधावल्लभ त्रिपाठी) कालिदास जो संस्कृत के कृतकृत्यता समृद्ध नाटककार हैं, अपने नाटकों में विवाहेतर प्रेम संबंध को प्रेम के आदर्श से, उसकी सामाजिकता से जोड़ा तो भवभूति ने वैवाहिक जीवन के प्रेम को आदर्श स्थिति का दर्शन रचा है। समन्वित जीवन का दर्शन। अद्वैत का दर्शन। अनन्यता का राग। तारामैत्रकम या चक्षुराग का गाढानुबंध कालिदास का तारामैत्रकम् शकुन्तला दुष्यन्त के प्रेम के रूप में उतनी ऊँचाई पर नहीं पहुँच पाता, जितनी ऊँचाई पर भवभूति के मालती-माधव का। एक के रम्यवीक्षण-श्रवण स्मृतिपटल को ही कुरेदकर चुक जाते हैं तो दूसरे के जोड़ते हैं, राग सूत्र में बाँधते हैं –&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;br /&gt;रम्याणि वीक्ष्य मधुरांश्च निशम्य शब्दान्&lt;br /&gt;पर्युत्स्की भवति यत्सुखितोsपि जन्तुः।&lt;br /&gt;तच्चनसा स्मरति नूनमबोधपूर्वं&lt;br /&gt;भावस्थिराणि जननान्तर सौहृदानि।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- कालिदास, शाकुन्तलम&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;व्यतिषजति पदार्थान्तरः कोsपि हेतु&lt;br /&gt;ने खलु बहुरुपाधीन पर्तयः संश्रयन्ते।&lt;br /&gt;विकसति हि पातङगस्योदये पुण्डरीकं&lt;br /&gt;द्रवति य हिमरश्मावदगते चन्द्रकान्तः।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- उत्तर रामचरित 6/12&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“वेदान्त के ब्रह्म, बौद्धों के शून्य तथा मीमांसकों के अदृष्ट को भवभूति ने अपनी कविता में अन्ततः प्रेम तत्व के द्वारा विस्थापित कर दिया है। प्रेम का एक सर्वव्यापी सत्ता के रूप में उसकी अपार और अप्रत्याशित संभावनाओं के अनुभव के साथ वे जो निर्वचन देते हैं, वह किसी दर्शन के प्रस्थान में परम सत्ता का ही निर्वचन हो सकता है।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी, दूसरी परम्परा के नाटककार भवभूति पृष्ठ 25&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘उत्तररामचरितम्’ नाटक भवभूति के विलक्षण प्रतिभा वैभव का विलक्षण प्रसाद है। उनके वेद, उपनिषद, साँख्य आदि दर्शन, ज्ञान, लोक-लगाव और नाटक धर्म से सीधे जुड़ावों का मधु मिश्रण है। उनकी प्रतिभा प्रयोगधर्मी है। वह दर्शन-वर्णन, परम्परा और प्रयोग को नाटकीय अनुरोध की शर्त पर दूध-पानी की तरह घुलाती हैं। परम्परा के आगे नई रेखा खींचती है। पूर्व रंग, नान्दी, रस, भाषा, मंच विधान, कथा-विन्यास, प्रकृति चित्रण प्रेम अभिव्यंजना सभी स्तर पर कवि ने लीक से हटकर नई लीक बनाई है। वाल्मीकि की करुणा को परिपूर्णता दी है। राम भगवान से उतारकर महावीर रूप में अवतरित कराया है। प्रकृति के कोमल-कठोर, सुखद और त्रासद रूपों का एकत्र दर्शन कराकर जीवन के तिक्त, अम्ल-मधुर भावों का रस चरवाया है। लोकजीवन की सच्ची अनुभूति से नाटक को केवल मनोरंजन का माध्यम न बनाकर जागरण का हेतु भी बनाया है। संवेदनाशून्य शास्त्र और नपुंसक परिणामरहित करुणा – ‘आह-ओह’ को नकारा है। इस नकार का प्रतिफलन रामायण कथा के नव साक्षात्कार नाट्य रंग के विधान तथा भाव-भाषा में देखा जा सकता है। निश्चय ही कालिदास के बाद भवभूति संस्कृत की विलक्षण भूति हैं। भारतसावित्री की विभूति हैं। इस स्मरणीय विभूति को बारंबार प्रकट में संजोये रहेगी –&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;br /&gt;या देवी सर्वभूतेषु स्मृतिरुपेण संस्थिता&lt;br /&gt;नमस्तस्मै नमस्तस्मै नमस्तस्मै नमोनमः।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- दुर्गा सप्तशती&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;***********&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://srijansamman.blogspot.com/"&gt;&lt;span style="font-size:85%;color:#cc33cc;"&gt;प्रस्तुतिः जयप्रकाश मानस&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-size:85%;color:#cc33cc;"&gt; (&lt;/span&gt;&lt;a href="http://www.srijangatha.com/"&gt;&lt;span style="font-size:85%;color:#cc33cc;"&gt;सृजनगाथा&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-size:85%;color:#cc33cc;"&gt;)&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/33768350-115723433226818804?l=lalitnibandha1.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lalitnibandha1.blogspot.com/feeds/115723433226818804/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=33768350&amp;postID=115723433226818804' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/33768350/posts/default/115723433226818804'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/33768350/posts/default/115723433226818804'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lalitnibandha1.blogspot.com/2006/09/3.html' title='3. नई परम्परा के कवि भवभूति'/><author><name>जयप्रकाश मानस</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-33768350.post-115723347456562363</id><published>2006-09-02T14:37:00.000-07:00</published><updated>2006-09-02T14:51:08.510-07:00</updated><title type='text'>2. रामकाज</title><content type='html'>&lt;a href="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/1600/ramkaj.jpg"&gt;&lt;img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/320/ramkaj.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;&lt;strong&gt;डॉ. शोभाकांत झा&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;राम और उनके काज इतने व्यापक हैं कि विचार करते रहिये विराम नहीं मिलेगा। उनमेंरमते रहिए अघा नहीं पायेंगे। उनके कार्य करते जाइये विश्राम नहीं मिलेगा –&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राम काज कीन्हें बीना मोहि कहाँ विसराम। हनुमान जी रामजी के काज करते चले गए – एक के बाद एक सँवारते चले गए पर क्या उन्हें विश्राम मिल पाया ? नहीं, वे अब भी उनके कार्यों को सँवार रहे हैं, क्योंकि अजर अमर भक्त जो हैं। विश्वास बढ़ाने के लिए मंगल मूरती मारुति नंदन के भक्तों से पूछ लीजिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वास्तव में जन-जन और कण-कण में रमे राम के कार्य जन-जन के कार्य हैं। जीवमात्र के कार्य हैं। उनके कार्यों के न कोई ओर है न छोर। सामान्यतः सीता-खोज को प्रमुख रामकाज माना जाता है। जिसके लिए राम ने सुग्रीव को राज्य में प्रतिष्ठित करते हुए कहा था कि अब हे सुग्रीव ! आप अंगद के साथ मिलकर राज करें, किंतु मेरे कार्य सम्पादन का धान हृदय में हमेशा रखें –&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;अंगद सहित करहु तुम राजू।&lt;br /&gt;सतत हृदय धरेहु मम काजू।। - 4/12/9&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;अब विचार करें कि सीता खोज का सतत चिंतन क्या है ? ुस्तुतः सीता खोज तो शांति, भक्ति, शक्ति, मुक्ति की तलाश है। शंकराचार्य ने सीता को शांति रूप में नमन किया है –&lt;br /&gt;शान्ति सीता समाहिता आत्मारामो विराजते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शांति की तलाश तरह-तरह की उठती समस्याओं के निदान की खोज है। व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक और राजनैतिक समस्याएँ उठ-उठकर शांति पर प्रहार करती हैं, दबोचती हैं, व्यक्ति, राज-समाज – सब को अशांत करत ीहै, आकुल करती हैं, संघर्ष को न्यौता देती हैं और अंत में महाभारत जैसे महाविनाश के जिम्मे जिंदगी को झोंक देती हैं। मनुष्य क ोसदियों के एक अर्जित मान-मूल्यों को मिट्टी में मिला देती हैं, अतः शांती- सीता की खोज एक व्यापक अवधारणा है। खो गई धरती की बेटी की खोज है। जमीनी सच्ई की तलाश है। सीता कृषि संस्कृति का प्रतीक है। लंका की औद्योगिक सभ्यता, जो हर जगह कृषि संस्कृति और उससे जुड़े मान-मुल्यों कोलील रही है, हमें अशांत बना रही है, सबूत है, इसीलिए गांधी ने इसे चाण्डाल सभ्यताकहा था। इन्हीं सब अर्थों में सीताखोज को देखा जाना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सीता करुणानिधान श्रीराम को अतिशय प्रिय तो थी ही,भारतीय नारी का आदर्श भी थी। सीता की खोज यदि राम की व्यक्तिगत समस्या मात्र होती तो राम स्वयं समर्थ थे – सर्व समर्थ। किसी की सहायती की जरूरत नहीं थी। तुलीस तो राम को ऐश्वर्य, वीर्य, यश, श्री और वैराग्य के सपुंज भगवान मानते ही हैं, वाल्मीकि भी उन्हें अपने युग का सर्व समर्थ महानायक मानते हैं। इस महानायक के सेवक हनुमान की सर्व समर्थ सेवकाई में भी किसी तरह के संशय की कोई गुंजाइश नहीं है। हनुमान की शक्ति पर जबसीता को संशय हुआ तो पनवसुत ने पर्वताकार रूप का विस्तार करतेहुए कहा था माँ ! आप अधीर न हों। शपथ राम की ! यदि उनका आदेश मिला होता तो मैं अभी आपको यहाँ से लिवा ले जाता –&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;अबहिं मातु मैं जाऊँ लनाई।&lt;br /&gt;प्रभु आयसु नहि राम दोहाई।। - सुंदरकांड 16/2&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;हनुमान जी बुद्धि-विवेक के निधान हैं। वे और उनके राम सीता काउस रूप में वापसी चाहते हैं, जिससे पृथ्वी पर मर्यादा प्रतिष्ठित हो। शईल संयम की शिक्षा लोक प्राप्त करे। अत्याचार बंद हो। लोक को रुलाने वाले रावण जैस लोगों पर अंकुश लगे। मूल्यों की प्रतिष्ठा हो –&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं।&lt;br /&gt;तिहुंपुर नारदादि जसु गैहहिं।। - सुंदरकांड 12/3&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निश्चय ही हनुमानजी सीता-खोज और उनकी सही ढंग से वापसी के द्वारा तीनों लोक को सबक देना चाहते थे। युग को संदेश देना चाहते थे कि मर्यादा की सीमा लांघने वाला व्यक्ति राम-कोप का भाजन है। राम का कोप लोक कोप का पर्याय है। देवराज इन्द्र हों या असुरराज रावण। यदि वे अहंकार और आतंक से लोक को आकुलकरेंगे तो राम-कोप से बच नहीं पायेंगे। सीता का अपहरण करेंगे तो सीता रूपी प्रजा की आह से जलकर खाक हो जायेगी उनकी स्वर्णमयी लंका – शीत निशा मे ंकोमल वन की तरह। मंदोदरी तीखे शब्दों में सचाई समझाती हुई रावण से कहती है –&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;तब कुल कमल बिपिन दुखदाई।&lt;br /&gt;सीता सीत निसा सम आई।।&lt;br /&gt;सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें।&lt;br /&gt;हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें।। &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;- सुंदरकांड 36/4&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;मंदोदरी न मंद मति है न भीरु। उसकी सुमति दूर तक साफ-साफ देख रही है – द्वार आये खतरे को। जब सेसीता लंका लाई गई तब से अपशकुन एक के बाद एक आकर आने वाले अनिष्ट की सूचना दे रहे हैं। उसका विवेक मानता है कि सीता यद्यपि सर्वश्रेयस्करी है – सर्वमंगला है, परन्तु श्रेयस और शांति को कोई बलात अपने अधिकार में करना चाहेगा तो वह श्रेयस उसके लिए अमंगलकारी बन जायेगा। शांति अशांति बन जायेगी। मंगला लक्ष्मी जब चौर्य, छीन-झपट और गलत तरीके से अर्जित की जाती है तो वह अर्जनकर्ता के लिए अशांति और आपदा बन जाती है, इसलिए मंदोदरी सीता को लंका रूपी कमल वन के लिए शीत निशा समझती है – कमल वन को जला सी देती है। शीतल होकर भी ताप देती है। लंका का जलना स्पष्ट प्रमाण है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सीता खोज के बहुत सारे आशय हैं। निर्मल मति से सोचें तो इस खोज के बहाने ढेर सारे संदेश राम और उनके सेवक, सखा, सहायक संसार को देना चाहते हैं, क्योंकि अवतार के कार्य मात्र दुष्टों कादमन या वध और सज्जनों का रक्षण ही नहीं होता। तरह-तरह की लीलाओं के द्वारा मर्त्यों को शिक्षा देना, धर्माचरण का संस्कार देना अवतार के विशद् प्रयोजन होते हैं –&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;मर्त्यावतारः खलु मर्त्य शिक्षो।&lt;br /&gt;रक्षोवधायैव व केवलं विभोः।। &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;- पुराण विमर्श पृ. 165&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जरा विचार किजिए कि -&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;“तिहुंपुर नारदादि जसु गैहहिं”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;अर्थात् सीता को जब भगवान राम लंका से वापस ले जाएंगे, तो इसमें राम की कौन-सी यशगाथा निहित होगी कि तीनों लोक गायेगा ? यह लांक्षण गाथा क्या गाने योग्य है ? क्या राम-सीता इससे मिले लोकापवाद से जिंदगी भर तपते नहीं रहे ? सीता तो पाताल में ही समा गई। फिर तुलसी ने ऐसा क्यों लिखा, जबकि उनकी कलम में स्खलन का अवसर कम ही होता है। मेरे वीचार से सीता की वापसी से समस्त आसुरी शक्ति का शमन, शांति और व्यवस्था की स्थापना और लोकरंजन का साध्य सधने वाला है। दैहिक, दैविक और भौतिक ताप से निजात मिलने की संभावना है – राम राज्य के द्वारा। महि भार उतारने और देवों को भी भयमुक्त करने के लिए राम अवतरित जो रुए थे। इन आशयों का संकेत स्वयं रावण को दी गई सलाह में है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;गो द्विज धेनु देवहितकारी। कृपासिंधु मानुष तनु धारी।।&lt;br /&gt;जनरंजन भंजन खलब्राता। बेद धर्मरच्छक सुनु भ्राता।।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;- सुंदरकांड 39&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;यदि सीता का पता लागाना ही राम काज होता, तो हनुमान सीता से मिलकर लौट आते। रावण के दरबार में जाकर उसे विनम्र और विवेकमय सिखावन नहीं देते। वे उसे सर्वनाशी अहंकार और सर्वग्रसी मोह से बचाकर युद्ध में निर्दोष जनता का खून बहाने से रोकना चाहते थे। उन्होंने जाते ही उसे चुनौती नहीं दी, न खरी-खोटी सुनाई। वे रुद्रावतार थे और रावण रूद्र भक्त, अतः वे अप्रत्यक्ष रूप से भक्त को आपदा से बचाना चाहते थे –&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;मोह मूल बहु सूल प्रद त्यागहुँ तम अभिमान।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;भजहुँ राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- सुंदरकांड 23&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;साफ है कि रामकाज जीव के बाहर-भीतर की सफाई है। अहंकार और मोह-लोभ, जो बढ़िया से बढ़िया व्यक्ति को पतन का पात्र बना देतेहैं, अच्छे कार्यों पर पानी फेर देते हैं, उनको दूर करना और सुर दुर्लभ मानव जीवन को कृतार्थ करना रामकाज के वृहत् आशय हैं। रावण महाज्ञानी और कुलीन होकर भी अपने दुर्गुणों के कारण नष्ट हुआ। वह तो राक्षस था या अपने कृत्य से असुर बन गया किंतु नारद तो मुनि थे। वे भी साधना के अहंकार और मोह में फँसकर मुनि से वानर बन गए – विरूप हो गए, इसलिए तुलसी काकभुशुंडि के माध्यम से मानस रोग और उसके निदान का बखान करते हैं। और यह भी रामकाज से असंदर्भित नहीं है। नर वानर न बन जाये, यह भी रामकाज का उद्देश्य है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रामकाज के विशद् संदर्भों की आख्या करते हुए पंडित रामकिंकर उपाध्याय कहते हैं कि “वेदान्तियों की दृष्टि में सीता शांति हैं, भक्तों की दृष्टि में वे भक्ति हैं, कर्मयोगी की दृष्टि में वे शक्ति हैं और तुलसीदास जैसे अपने आप को दीन मानने वालों की दृष्टि में वे माँ हैं। ... सीता के खोजने का मतलब है शांतिका खो जाना, भक्ति का खो जाना, शक्ति का खो जाना, माँ का खो जाना।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;– पंडित रामकिंकर उपाध्याय श्री हनुमत चरित्र, पृ. 124&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;स्पष्ट है कि इन सब की खोज और उपलब्धि रामकाज और फलश्रुति हैं। ये सारे जीवन के संग्राह्य संदर्भ हैं। इनके बिना सब कुछ व्यर्थ है। आप भी सोचिये जीवन में सब कुछ हो, पर शांति न हो – आधुनिक समृद्ध आदमी की तरह तो समृद्धि कैसी ? अशांत को सुख कहाँ ? केवल भागमभाग हो, तनाव हो, लगावरहित यांत्रिक जिंदगी हो, तो सुख कैसा ? प्रतीति न हो तो अकूत सम्पदा के स्वामी से मिलकर देख लीजिए।इसी तरह भक्तिभाव रहित जिंदगी दरिद्र मानी जानी चाहिए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;राम विमुख प्रभुताई।&lt;br /&gt;जाई रही पाई बिनु पाई।।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;- सुंदरकांड 23&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहाँ भक्ति का तात्पर्य केवल राम या ईश्वर भक्ति से नहीं है। न नाम रटन से है, न पूजा पाठ से, अपितु उन मूल्यों के प्रति आदर-आचरण से है, जिनके राम प्रतीक हैं। राम को जो-जो प्रिय हैं – प्रेम, सत्य,शील, मर्यादा, सदाचार,परोपकार आदि की ओर उन्मुखता होने से ही रामभक्ति है। भक्ति प्रेम और श्रद्धा का समवाय है। जीवन में प्रेम न हो, श्रद्धा न हो, राग-रस न हो तो जीवन मात्र साँसों का मेला बन जाता है। इसी श्रद्धा-प्रेम के अभाव में दुर्योधन कृष्ण की नारायणी सेना तो पा गया, पर वह उन्हें नहीं पा सका। परिणामस्वरूप वह विजयश्री से वंचित रहा। स्वयं नष्ट हुआ और वह तत्कालीन राज-समाज के लिए अभिशाप बन गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शक्ति का आभाव व्यक्ति को शव रूप में बदल देता है। माँ की ममता के अभाव में मानुष अधूरा, अतृप्त, असंतुलित बन कर रह जाताहै। अतएव सीता की खोज इन सब जीवन मूल्य रत्नों की खोज है, प्राप्ति का अनुष्ठान है। समूचापन की चाहत है। रामायण या मानस की कथा का सार दो पंक्तियों में बताया जाता है कि राम कथा का आरंभ राम वन गमन से होता है। राम स्वर्ण मृग के पीछे भागते हैं। सीता का रहण हुआ। जटायु रक्षा करते मारे गए। सुग्रीव से मैत्री हुई। बालि मारा गया। हनुमान सागर पार गए। लंका जली। कुम्भकर्ण और रावण का वध हुआ। यही रामायण है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;आदौ राम तपोवनादि गमनं हत्वा मृगं काञ्चनं।&lt;br /&gt;वैदेही हरणं जटायु मरणं सुग्रीव सम्भाषणं।।&lt;br /&gt;बालीनिग्रहणं समुद्रतरणं लंका पूरी दाहनं&lt;br /&gt;पश्चात् रावण-कुम्भकर्ण हननं एतदि रामायण्।।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जरा ठहरकर सोचिये कि क्या यही है ? क्या इतनी-सी ही कथा वस्तु रामायण के चौबीस हजार श्लोकों में निबद्ध है ? क्या रामकथा का यही अभिप्राय है ? फिर तुलसी का लक्ष्य रामकथा को दुहराना भर है ? राम भक्ति भर प्रकट करना है ? क्या नानापुराण निगमागम और अन्यत के ये अन्यतम हैं ? नहीं, मात्र इतने ही तात्पर्य रामायण के होते तो न यह आदि काव्य अमर होता, न रामकथा को लेकर मानस जैसे बहुत सारे राम काव्य लिखे जाते। न राम काव्य परम्परा का विकास होता न राम अब तक पूजे जाते। अब तक काल के गाल में समा गये होते। देश की सीमा में सिमटकर महज पोथी पुराण की जिल्दों में लिपटकर रह गये होते। परन्तु अपने काज और चरित के द्वारा राम देश और कालजयी बन गये। विश्वव्यापी बनी रामकथा आज भी सूरीनाम, मॉरीशस, मलाया आदि देशों में रामकाज सम्पादित कर रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल पूरी रामकथा के भीतर रामकाज समाहित है – माटी के अंदर की गंध की तरह, पवन के भीतर सुगंध की भाँति। सारी घटनाएँ, सारे पात्र और समस्त प्रसंग रामकाज सूत्र से आबद्ध हैं। सारे तागों को बटोरकर रामकाज पूरी खूँटे से बाँध दिया गया है। सीता का अन्वेषण तो एक तात्कालिक महत्वपूर्ण काज था। नहीं तो हनुमान के बल-बुद्धि की परीक्षा लेने गई नाग-माता सुरसा उन्हें यह आशीर्वाद नहीं देती कि तुम सारे राम काज को सम्पन्न करोगे –&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;रामकाज सबु करिहहु, तुम्ह बल बुद्धि निधान।&lt;br /&gt;आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान।।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;- सुंदरकांड 2&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चलिए एक श्लोकी रामायण पर ही विचार करें। तपोवन गमन से आरंभ राम जीवन-यात्रा विभिन्न पड़ावों को पार करती है और अंत में राज्य की स्थापना के साथ पूर्ण विराम लेती है। इसके एक-एक पड़ाव पर अटक कर यदि राम काज का आकलन करें तो तुलसी जैसे सामर्थ्यवान कवि अब भी अनेक रामचरित मानस, उप मानस लिख सकते हैं। राम के सम्पूर्ण चरित – आचरण ही राम काज का पर्याय हैं। यदि सीता-खोज ही प्रमुख घटना या कार्य होता तो मानस का शीर्षक रामकाज रामायण कदाचित रखा जाता। राम का प्रतिद्वन्द्वी रावण स्वयं भीतर से स्वीकारता है कि शायद सुर काज साधने और पृथ्वी के भार को उतारने के लिए राम अवतरित हुए हैं। मुझे भी राक्षसवृत्ति से मुक्ति मिलेगी। इस तामस शरीर से भजन-भाव तो होने से रहा –&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;“सुर रंजन भंजन महिमारा।”&lt;br /&gt;“होइहि भजन न तामस देहा।&lt;br /&gt;मन क्रम बचन मंत्र दृढ़ एहा।।”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;– अरण्य कांड 3/23/3,5&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;वास्तव में लोकाराधन राम-लीला का लक्ष्य था।लोक उनकी आराधना करता है और वे लोक की। अतिशय प्रिय जानकी को भी लोकाराधन के लिए उन्होंने भेंट चढ़ा दिया – “आराधनाय हि लोकस्य मुञ्चतो नास्ति में व्यथा” – (उत्तर रामचरित – भवभूति)। देव और मनुज का पारस्परिक भावन भाव विश्व को महाभाव से भर देता है – “परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यतः” – गीता। जनाराधन के लिए जनार्दन ने सेवा, त्याग, प्रेम, दया और मर्यादा के जो-जो प्रतिमान स्थापित किए वे आज भी लोक में अमिट हैं। उनकी लीला से लोक संस्कारित है। भारतीय लोग चाहे वे किसी धर्म के उपासक हों, घर-घर के बड़े भाई राम और छोटे लखनलाल होते हैं। हम और आप यदि बड़े होकर जन्मे हैं तो थोड़ा बहुत ही सही, जरूर इस भाव को जी रहे होंगे अथवा दूसरे को जीते देख रहे होंगे, क्यों राम हममें रमे हैं और हम राम में रमते रहेंगे। “लोग कहते हैं कि हनुमान राम की शक्ति से सब कुछ करते हैं। और राम मेरी दृष्टि में लोक की शक्ति करते हैं।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;– डॉ. युगेश्वर – तुलसी का प्रतिपक्ष, पृष्ठ 53&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राम की तरुणाई ने विश्वामित्र को निर्भय किया, जनक परिताप को मेटा, ऋषि-मुनियों को भयविहीन बनाते हुए जन-जन को अभयता दी। स्वतंत्रता भयमुक्तता का नाम है। जो स्वाधीनता भयमोचिनि होती है वह अर्थवती होती है। जो आजादी आतंक, अराजकता, अन्याय, अभाव, व्याधि के भय से मुक्ति नहीं दिला पाती, वह कागजी होती है। जिस शासन तंत्र में मंत्रणा देने वाले सचिव-सयाने सही सलाह देने में खौफ खाते हों, उचित कहने लिखने वाले के लिए सिर कलम कर दिया जाने का फतवा दिया जाता हो, देश का पहरेदार चोर और नेतृत्व निष्ठाहीन हो, उस देश की स्वतंत्रता बेमानी हो जाती है। और तो और घर की मंदोदरी भी मात्र भोग की वस्तु समझी जाय और उचित कहने के कारण सगा भाई लतियाया जाय – भयग्रस्त हो, उस लंका का स्वर्ण सुख किस काम का? वह तो डराता है, आकुल ही करता है – विभीषण से पूछ लीजिए –&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;“सुनहु पवन सुत रहनि हमारी।&lt;br /&gt;जिमि दसनन्ही मँह जीभ बिचारी।।&lt;br /&gt;अब मैं कुशल मिटे भय भारे।&lt;br /&gt;देखि रामपद कमल तुम्हारे।।”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;राम का पद सुग्रीव को भी भयमुक्त करता हुआ आया था ौर लंका विजय के बाद उसने सब को भयमुक्तताके लिए आश्वस्त किया –&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;निज निज गृह अब तुम सब जाहू।&lt;br /&gt;सुमिरेहु मोही डरपहु जनि काहू।।”&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;राम के सुमिरन में सामंती अहंकार की बात नहीं है। नीति, न्याय, सुव्यवस्था, शांति की बात है।&lt;br /&gt;तात्पर्य यह कि राम काज एक व्यापक अवधारणा है। पूरी रामायण रामकाज की चौहद्दी है। राम और उनके सखा-सहाय, सेवक के सारे मर्यादित कार्य के विविध रुप हैं और प्रतिपल प्रतिपक्षी पात्रों के अकार्य में राम कार्य के पृष्ठपोषक हैं – प्रकाश के पृष्ठपोषक अंधकार की भाँति, नायक के गुणों के प्रकाश, खलनायक की तरह, अच्छाइयों की महत्ता बढ़ाने वाली बुराइयों के समान। सियाराममय जगत के सारे हित साधक प्रयोजन और लोकमंगल राम के काज हैं। वे अनन्त की तरह अनन्त हैं, इसलिए हनुमानजी को राम काज से आज तक विश्राम नहीं मिल पाता है, न मिल पायेगा और न वे ऐसा कभी चाहेंगे।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;********&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://srijansamman.blogspot.com/"&gt;&lt;span style="font-size:85%;color:#ff6600;"&gt;प्रस्तुतिः जयप्रकाश मानस&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-size:85%;color:#ff6600;"&gt; (&lt;/span&gt;&lt;a href="http://www.srijangatha.com/"&gt;&lt;span style="font-size:85%;color:#ff6600;"&gt;सृजनगाथा&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-size:85%;color:#ff6600;"&gt;)&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/33768350-115723347456562363?l=lalitnibandha1.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lalitnibandha1.blogspot.com/feeds/115723347456562363/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=33768350&amp;postID=115723347456562363' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/33768350/posts/default/115723347456562363'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/33768350/posts/default/115723347456562363'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lalitnibandha1.blogspot.com/2006/09/2.html' title='2. रामकाज'/><author><name>जयप्रकाश मानस</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-33768350.post-115723298085987303</id><published>2006-09-02T14:29:00.000-07:00</published><updated>2006-09-02T14:36:20.873-07:00</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;a href="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/1600/22209600.jpg"&gt;&lt;img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/3622/2073/320/22209600.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#ff6600;"&gt;1. रोजमर्रा&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;डॉ. शोभाकांत झा&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;“रोजमर्रा” रोज-रोज जने का कर्म-धर्म है। बिना किसी नागा-खाता के करते-धरते रहने की क्रिया है; जो जीते रहने के लिए अनिवार्य है। इसे हिंदी में दैनिकी और अंग्रेजी में ‘डेली रूटीन’ कहा जाता है। दैनिकी शब्द तो श्रुति प्रिय है, किन्तु रोजमर्रा कर्णकटु है – मरहास दुकलहा, लतेलू, भकुरा आदि नामों की तरह। यह अर्थप्रिय भी नहीं है – छात्रों के लिए पढञाई की तरह। ऐसा लगता है कि रोजृरोज मारने वाला कार्यव्यापार रोजमर्रा हो, जो सूर्य के साथ ही एक दिन की आयु लेकर डूब जाता हो – विराम लेता हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल शब्द हो या भाव, वस्तु हो या व्यक्ति उसे देखने का नजरिया महत्वपूर्ण होता है। उसे जीने का ढंग ज्यादा मायने रखता है। भिन्न-भिन्न नजरिया से देखने से एक ही वस्तु या व्यक्ति सुघद और दुखद दोनों लग सकता है – गोपी और कंस के लिए कृष्ण की तरह, संयोगी-वियोगी के लिए चन्द्रमा की भाँति।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोजमर्रा भी रोज-रोज मरने-जीने का जरिया उस नजरिया के कारण से बन जाता है, जब हम उसे कोल्हू के बैल की तरह जीने लगते हैं; जिन्दगी को रोजमर्रे की मशीन बना लेदे हैं। खूँटे से बँध जाते हैं। तब हम तिल-तिल मरने लगते हैं, छीजने लगते हैं। रोज-रोज मरने-जीने लगते हैं। सुबह-शाम की सीमा में दौड़ते रहना नियति बन जाती है। लीक से हटकर चलने-करने की प्रवृत्ति मर जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच तो यह है कि दैनिकी देहधारी की नियति है, धर्म है। इससे न योगी बच सकता है, न योगेश्वर कृष्ण। धर्म-क्रर्म तो करना ही चाहिए। इससे बचना पलायन है, परजीिता है, पाप है। कृष्ण-लीला का सफल मंचन है। उदाहरण है – संदेश है – अपनी-अपनी लीला के सफल मंचन के लिए, लीला का रस लेते हुए जीवन जीने के लिए। लीक से हटकर चलकर कभी-कभी सुख-दुख का जायका लेना चाहिए। दैनिकी सीमा से बाहर निकलकर खुले 
